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राज्यवार हाल और हालात अलग तो जीत का एक फार्मूला कैसे चलेगा?

सार

गुजरात में अभूतपूर्व जीत से उत्साहित बीजेपी में लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में गुजरात मॉडल लागू करने की चर्चा जोरों पर है। सभी राज्यों में स्थापित नेतृत्व भविष्य को लेकर चिंतित और सजग दिखाई पड़ रहे हैं। जिन-जिन राज्यों में लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभा चुनाव होने हैं वहां बीजेपी संगठन और सरकारों में नए सिरे से जमावट को लेकर राजनीतिक बादल उमड़ने घुमड़ने लगे हैं। मीडिया में कयासबाजियां चालू हो गई हैं।

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विस्तार

विधानसभा चुनाव राज्य में किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा? किस-किसको टिकट मिलने की संभावना है? कितने विधायकों के टिकट काटे जा सकते हैं? इस पर पतंग उड़ने लगी हैं। गुजरात में बीजेपी की जीत मोदी मैजिक, बीजेपी गवर्नमेंट के गवर्नेंस और पार्टी की लीडरशिप में बदलाव की रणनीति को माना जा रहा है। इन सब को मिलाकर ही देशव्यापी मीडिया ‘गुजरात मॉडल’ को बीजेपी की जीत की गारंटी बता रहा है। गुजरात के साथ ही हिमाचल प्रदेश में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। गुजरात मॉडल गुजरात में जीत के लिए जिम्मेदार है तो हिमाचल में हार के लिए भी बीजेपी को सटीक विश्लेषण करने की जरूरत है। 

बीजेपी के सामने नेशनल इलेक्शंस में इतनी चुनौती नहीं दिखाई पड़ती जितनी राज्यों में होने वाले चुनाव में दिखाई पड़ रही है। नेशनल लेवल पर नरेंद्र मोदी के मुकाबले विश्वसनीयता वाला कोई नेतृत्व उपलब्ध नहीं दिखाई पड़ रहा है। जिन राज्यों में चुनाव होना है उनमें कर्नाटक, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं। इन सभी राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला होने की संभावना है। इन राज्यों में आप की एंट्री भी राजनीतिक गणित में उलटफेर कर सकती है। गुजरात चुनाव नतीजे इस ओर इशारा कर रहे हैं। 

विधानसभा वाले राज्यों में बीजेपी को गुजरात मॉडल अपनाने की कितनी जरूरत है, इस पर हर राज्य के नजरिए से विचार करने की जरूरत है। जहां तक कर्नाटक का सवाल है वहां तो बीजेपी द्वारा नेतृत्व में परिवर्तन किया जा चुका है। राज्य के नए मुख्यमंत्री के कामकाज को लेकर जिस तरह के संदेश सामने आए हैं वह बहुत आशाजनक नहीं कहे जा सकते हैं। 

कर्नाटक में कांग्रेस का बीजेपी के साथ सीधा मुकाबला है। कांग्रेस की स्थिति वहां बीजेपी के साथ बराबरी की देखी जा सकती है। दोनों दलों में नेताओं के बीच संघर्ष और आंतरिक मतभेद स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ते हैं। कांग्रेस में डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया खेमे सक्रिय हैं। कांग्रेस के नए अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व संभालने के बाद उनके समर्थक भी विधानसभा चुनाव में अपनी भूमिका नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश में लगे हुए हैं। जहां तक बीजेपी का सवाल है वहां करप्शन की शिकायतें भी सामने आई हैं। सरकार के एक मंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में त्यागपत्र देना पड़ा है। येदुरप्पा को भी ऐसी शिकायतों के कारण बदला गया था। 

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता में है। बीजेपी वहां विपक्ष में है। अशोक गहलोत और सचिन पायलट की पूरी राजनीतिक लड़ाई के बीच परंपरागत रूप से अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सत्ता वापसी की संभावना देखी जा रही है। वहीं छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल का काम भी बोल रहा है। बघेल अब गांधी परिवार की आँख के तारे भी बने हुए हैं।

उत्तर भारत का महत्वपूर्ण राज्य मध्यप्रदेश है जहां बीजेपी सत्ता में है। यहां भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच में रहता है। दोनों दलों का जनाधार बराबरी के साथ देखा जाता है। मतों में मामूली अंतर के बाद ही सरकार में बदलाव का मध्यप्रदेश में इतिहास रहा है। 2018 में मामूली अंतर से शिवराज सिंह चौहान को सत्ता गंवानी पड़ी थी। तब कमलनाथ की सरकार बनी थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कमलनाथ की तकरार के बाद उनकी सरकार गिर गई थी।

इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की एक बार फिर सरकार बनी जो काम कर रही है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस उत्साहित है। भारत जोड़ो यात्रा के बाद आम कार्यकर्ताओं में सत्ता की ललक साफ देखी जा रही है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के खेमे यहां मुख्यतः सक्रिय हैं। कमलनाथ बुजुर्ग नेता हैं। प्लानिंग के मामले में उन्हें कमजोर नहीं माना जा सकता लेकिन जमीनी पकड़ उनके पक्ष में नहीं है। दिग्विजय सिंह प्रदेश में जमीनी जनाधार और कार्यकर्ताओं में लोकप्रियता रखने वाले सबसे बड़े नेता हैं। कांग्रेस में नए नेतृत्व की मध्यप्रदेश में जरूरत महसूस की जा रही है। युवा चेहरों को प्राथमिकता मिलने से कांग्रेस मुकाबले में मजबूती के साथ सामने आ सकती है। 

दूसरी ओर शिवराज सिंह चौहान बीजेपी में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। मध्यप्रदेश में गुजरात मॉडल की चर्चा शिवराज विरोधी लोगों की तरफ से तेजी से फैलाई जाती है। गुजरात और मध्यप्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। गुजरात में जिस तरह से चुनाव के एक साल पहले मुख्यमंत्री और संपूर्ण मंत्रिमंडल को बदलकर नए नेतृत्व को स्थापित किया गया था, वैसी परिस्थितियां मध्यप्रदेश में अपनाना बीजेपी के लिए संभव नहीं दिखता है। 

शिवराज के पहले मध्यप्रदेश में बीजेपी कभी 5 साल सरकार चलाने के बाद रिपीट नहीं हो सकी थी। यह रिकॉर्ड शिवराज सिंह के नेतृत्व में ही बनाया है कि तीन बार लगातार जनादेश प्राप्त कर बीजेपी ने सरकार बनाई। साल 2018 में बीजेपी जरूर सत्ता से बाहर हो गई थी लेकिन बहुत सम्मानजनक तरीके से और अगर जनाधार की दृष्टि से देखें तो बीजेपी के मत कांग्रेस से ज्यादा थे। राजनीति में अहम और टकराहट के कारण राजनीतिक दलों को हमेशा नुकसान होता है। शिवराज सिंह चौहान सामंजस्य वाले नेता हैं। उनकी जनता में मजबूत पकड़ है। 

बीजेपी को विधानसभा चुनाव में एंटी इनकंबेंसी से निपटने के लिए टिकट वितरण में बहुत अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है। निश्चित रूप से नए चेहरों और युवाओं को ज्यादा से ज्यादा मौका दिया जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी का चेहरा और शिवराज सिंह की लीडरशिप का मॉडल मध्यप्रदेश में पार्टी के विजय रथ को आगे ले जाने में सक्षम हो सकता है। गुजरात मॉडल का फार्मूला मध्यप्रदेश में शायद कारगर नहीं हो सकेगा। पार्टी संगठन के स्तर पर जरूर कसावट लाने की जरूरत लग रही है। 
 
राजनीति में सत्ता के लिए लगाए जाने वाले हर दांव की चोट जनता पर ही पड़ती है। राजनीतिक स्वार्थ मानव धर्म को भी पीछे धकेलने लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि भ्रष्ट तंत्र के जोर से कई बार प्रजातंत्र फेल होता दिखाई पड़ता है। सत्ता हासिल करने के लिए राजनीति ऐसे कुचक्र रचती हुई दिखाई पड़ती है, जिससे जनमानस में घृणा और लोभ का पाप बढ़ता जा रहा है। 

देश में राजनीति के नए मॉडल की जरूरत है। यह मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें कर्म की प्रधानता हो, जनमानस को बेहतर जीवन यापन के लिए बुनियादी सुविधाओं के विकास को प्राथमिकता मिले। राजनीतिक तंत्र न केवल ईमानदार रहे बल्कि उसका जीवन ईमानदार भी दिखे। राजनीति को लेकर देश में बढ़ रहे निराशा के भाव को मिटाना बहुत जरूरी है।