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बिना मुलायम असंभव थी राम मंदिर आंदोलन की सफलता 

सार

समाजवादी राजनीति के आख़िरी स्तंभ मुलायम सिंह यादव हमारे बीच नहीं रहे। समाजवाद के जीवंत प्रतीक मुलायम सिंह का निधन उनकी राजनीतिक विचारधारा को भी गहरा आघात है। मुलायम सिंह के फैसले कभी मुलायम नहीं होते थे, सियासत का इतिहास बदलने और बनाने वाले मुलायम सिंह सख्त फैसलों और कदम के लिए हमेशा जाने जाएंगे। मुलायम जैसी सख्त शख्सियत सियासत के लिए जरूरी है लेकिन अब तो नाम कठोर सिंह लेकिन लुंज-पुंज व्यक्तित्व राजनीति की मुख्यधारा बन गई है। 

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विस्तार

सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस राजनेताओं में लगातार कम होता जा रहा है। इसके विपरीत मुलायम सिंह जैसा सोचते थे वैसा ही बोलते थे। जैसे अंदर थे वैसे ही बाहर दिखते थे। बनावटीपन और दिखावा शायद उन्हें नहीं आता था। कठोर हिंदू और सनातन जीवन लेकिन मुल्ला मुलायम की राजनीतिक पहचान। 

भारत की राजनीति में शोषित-पीड़ित और समाज के पिछड़े लोगों के साथ ही अल्पसंख्यकों की आवाज मुखर करने वाले मुलायम सिंह ने राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को हमेशा घुटने टेकने के लिए मजबूर किया। उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की आज जो दुर्गति है उसकी आधारशिला मुलायम सिंह यादव ने ही रखी थी। कांग्रेस की सरकार को ही हटा कर पहली बार मुलायम सिंह 1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। गरीबों के प्रति उनकी कट्टरता जहां कांग्रेस का जनाधार समाप्त करने के लिए लाभदायक रही, वहीं मुस्लिमों के लिए उनकी कट्टरता से हिंदुत्व की राजनीति को एक नया आयाम मिला। भाजपा का राम मंदिर आंदोलन और उसकी सफलता मुलायम सिंह यादव के बिना क्या संभव हो सकती थी?

राम मंदिर आंदोलन के दौरान वर्ष 1990 में अयोध्या में  कारसेवकों पर गोली चालन हुआ था। मुलायम सिंह ने ही गोली चालन का आदेश दिया था। यह गोली चालन नहीं हुआ होता तो शायद आज राम मंदिर का निर्माण नहीं हो रहा होता। कारसेवकों का जो खून बहा था उसने पूरे देश में राम मंदिर के लिए एकजुटता पैदा की थी और फिर यह लड़ाई कानूनी अदालत में जीती गई। आज राम मंदिर का निर्माण हो रहा है। कोई भी क्रिया तभी सफल होती है जब उसी ताकत के साथ प्रतिक्रिया होती है। कारसेवकों पर अगर मुलायम ने कट्टर प्रतिक्रिया नहीं दिखाई होती तो आज के हालात शायद ये नहीं होते। 

भारतीय राजनीति आज नरम-गरम, उदार और चरम के बीच द्वन्द में उलझी हुई है तो इन परिस्थितियों को यहां तक पहुंचाने में जाने अनजाने मुलायम सिंह की बड़ी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। मुलायम की मुस्लिम कट्टरता ने भाजपा को सफलता का अध्याय लिखने में सहयोग पहुंचाया है। 

मुलायम सिंह के निधन पर शोक संवेदनाओं में भाजपा की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा दिखाई पड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के अपने दौरे में एक सार्वजनिक सभा में मुलायम सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि मुलायम सिंह का आशीर्वाद उनके लिए अमानत है। प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि 2019 में मुलायम ने उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री बनने का आशीर्वाद देते हुए कहा था कि सबका साथ लेकर विकास की रणनीति पर चलने से सफलता मिलेगी। भाजपा के दूसरे कद्दावर नेता अमित शाह ने तो निधन की सूचना के तुरंत बाद अस्पताल पहुंचकर ही श्रद्धांजलि दी। मुलायम सिंह के अंतिम संस्कार में भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहुंचने वाले हैं। उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने 3 दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। 

राजनीति में न कोई दोस्त होता है ना कोई दुश्मन होता है। परिस्थितियां दोस्त और दुश्मन का आभास देती हैं। मुलायम सिंह ने यूपी चुनाव के समय भी चुप्पी साध ली थी। अपने बच्चों के साथ रह रहे मुलायम सिंह की दूसरी बहू अपर्णा यादव ने तो मुलायम सिंह के घर से जाकर ही बीजेपी ज्वाइन कर ली थी। बिना मुलायम सिंह को बताए बिना उनका आशीर्वाद लिए उनकी दूसरी बहू बीजेपी में कैसे जा सकती है? प्रधानमंत्री मोदी और मुलायम सिंह की मुलाकात बहुत चर्चा में रही थी। 

ऐसा लगता है कि आम इंसान की तरह वृद्धा अवस्था में धर्म और आस्था के प्रति बढ़ने वाली चाहत शायद मुलायम सिंह को भी पकड़ चुकी थी। राजनीतिक सक्रियता उन्होंने कम कर दी थी लेकिन जीवन के आत्म सुधार का रास्ता पकड़ लिया था। शायद उन्हें आख़िरी क्षणों में जीवन की सच्चाई का एहसास होने लगा था। 
 
वैसे तो मुलायम सिंह और बीजेपी का खुला विरोध सर्वविदित है लेकिन मुलायम सिंह ने राजनीति में जो जो किया उसका अपरोक्ष रूप से बीजेपी को फायदा हुआ। सोनिया गांधी जब प्रधानमंत्री बनने जा रही थीं उस समय मुलायम सिंह ने ही विरोध किया था। जिस उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के सभी प्रधानमंत्री बनते रहे थे उसी उत्तर प्रदेश में आज कांग्रेस पार्टी दो विधायक तक सीमित हो गई है। 

मुलायम सिंह यादव ने परिवारवाद की राजनीति को हमेशा बढ़ाया। उनके परिवार के न मालूम कितने सांसद-विधायक और राजनेता आज भी सक्रिय हैं। अखिलेश यादव उनकी चाहत और कमजोरी भी थे। पार्टी की कमान अखिलेश को देने में उन्होंने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग किया। परिवार के बीच में राजनीतिक मतभेद होने पर भी चुप रहकर अखिलेश यादव का ही मुलायम सिंह ने समर्थन किया। शिवपाल और अखिलेश यादव के बीच में राजनीतिक मनमुटाव हुआ तब भी मुलायम सिंह ने शांति बहाली के लिए कोशिश जरूर की लेकिन अखिलेश यादव को ही प्राथमिकता दी। 

मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में नए-नए प्रयोग किए। जातियों और समुदायों के आधार पर अपना राजनीतिक जनाधार खड़ा करने में उन्होंने सफलता हासिल की थी। फिल्म जगत के सितारों को भी उन्होंने राजनीति में आगे लाया था। राज बब्बर, जयाप्रदा जैसे फिल्मी सितारों को राजनीति में मुकाम दिया। बच्चन परिवार से भी उनकी निकटता रही। जया बच्चन आज भी राज्यसभा में सामाजवादी पार्टी की सांसद हैं। यह अलग बात है कि फ़िल्मी सितारों से उनके संबंध धीरे-धीरे बिगड़ते गए। अमर सिंह के साथ उनके दोस्ताना संबंध काफी लंबे समय रहे बाद में उनमें भी खटास आ गई थी। अब तो अमर सिंह भी इस दुनिया से चले गए हैं। 

मुलायम सिंह यादव कांग्रेस की सत्ता के समय विपक्षी राजनीति की धुरी हुआ करते थे। कांग्रेस के साथ कभी भी उनका कोई गठबंधन नहीं बन पाया था। अखिलेश यादव ने जब कांग्रेस के साथ गठजोड़ किया था तब भी मुलायम सिंह यादव मन मसोस कर रह गए थे। बीजेपी के राजनीति में उभार के बाद विपक्षी राजनीति मुलायम सिंह के इर्द-गिर्द घूमती रही। उन्होंने कभी भी विपक्षी एकता को परवान चढ़ाने में कोई विशेष भूमिका का निर्वहन नहीं किया। मोदी विरोधी विपक्षी दल फिर से एकजुटता की तरफ कदम बढ़ा रहे थे लेकिन मुलायम सिंह यादव ने इन गतिविधियों को भी अधिक महत्व नहीं दिया था। 

उत्तर प्रदेश के विरोधी दल के सहयोग के बिना देश में बीजेपी विरोधी मोर्चा कभी भी सफल नहीं हो सकता। मुलायम सिंह के रहते हुए तो बातें कुछ भी चलती रही हों लेकिन परिणाम कुछ भी नहीं निकलता था। मुलायम सिंह की राजनीतिक शैली पर यदि समाजवादी पार्टी आगे बढ़ती है तो भविष्य में भी विपक्षी एकता को परवान चढ़ने में मुश्किल ही आएगी। 

मुलायम सिंह गरीब घर से आते थे। वह किसी राजनीतिक परिवार की कोख से नहीं निकले थे। उन्होंने अपने संघर्ष और गरीबों की रहनुमाई कर अपना स्थान बनाया था। परिवारवाद की राजनीति के दौर में बिना पारिवारिक बैकग्राउंड के राजनीतिक आधार खड़ा करना कोई आसान काम नहीं है।   

मौत को तो एक मायने में नया जन्म कहा जाता है। शरीर मिट्टी में मिल जाता है केवल यंत्र बदल जाता है। चेतना तो दूसरा यंत्र ग्रहण कर लेती है। इसके बाद भी हर मौत मृत्युलोक में लगी मृत्यु की कतार कम करती है। हर व्यक्ति इस कतार में आगे बढ़ता जाता है। राजनीतिक व्यक्तित्व समाज के लीडर होते हैं इसलिए उनके दोष और उद्घोष समाज पर असर डालते हैं। मुलायम की कठोरता और सहजता का शोर लंबे समय तक सुनाई देता रहेगा।