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मील का पत्थर उखाड़ने से नहीं मिलती मंजिल

सार

भले ही 2024 अभी दूर है लेकिन प्रधानमंत्री पद के हरण के लिए नेताओं की सभा जुटने लगी है। परिवारवाद, पुत्र मोह और पदमोह का वीभत्स दृश्य फिर से दिखाई देने लगा है। जिनके बाजुओं में बल नहीं है, वे भी पटना से दिल्ली आकर जोर आजमाइश कर रहे हैं। 72 साल के नीतीश कुमार 52 साल के राहुल गांधी को एकता के लिए मनाने उनके दरवाजे पर जा पहुंचे हैं। उनकी चाहत है कि 2024 के महाभारत में सारे विपक्ष को जोड़कर राजपथ पर पहुंचा जाए। एक तरफ राजपथ और दूसरी तरफ कर्तव्यपथ है। आज लड़ाई कौरवों के राजपथ और पांडवों के कर्तव्यपथ के बीच है। 

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विस्तार

विपक्षी एकता के कारण आज तक इस देश में कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बना है। मोदी से पहले ऐसा कभी भी देश में नहीं हुआ था, जब कोई भी नेता चाहे वह किसी भी पार्टी का हो प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में जनता के बीच गया हो और जनादेश से प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचा हो। नरेंद्र मोदी जनादेश से बनने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। बाकी सारे प्रधानमंत्री परिस्थितियों के कारण बने थे और बाद में प्रधानमंत्री के रूप में जनता के बीच गए। 

दूसरी ऐसी स्थिति थी जब किसी दल को बहुमत नहीं था और विपक्षी दलों ने इकट्ठे होकर गठबंधन में प्रधानमंत्री बनाया। कांग्रेस की ओर से देश के पहले प्रधानमंत्री भी जनादेश से नहीं बने थे। ऐसे ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी परिस्थितियों के कारण पहले प्रधानमंत्री बने थे। फिर चुनाव में जनता के सामने गए थे। इसके अलावा जितने भी प्रधानमंत्री रहे वह सब परिस्थितियों की उपज थे। प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के लिए उनके पक्ष में जनता का जनादेश नहीं था। यह सब ऐतिहासिक तथ्य है।  

साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी को सीधे जनता द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में चुना है। 2024 में भी जनता ही सीधे प्रधानमंत्री को चुनेगी। सीधे निर्वाचन में नरेंद्र मोदी के मुकाबले में विपक्ष के किसी भी दल के पास कोई भी नेता नहीं है, जो दूर-दूर तक ठहर सके। देश की जनता राजनीतिक रूप से जागरुक हो गई है। वह राज्य और केंद्र के लिए चुनाव के समय अलग-अलग जनादेश देती रही है। अभी भी कई राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार काम कर रही हैं लेकिन वहां लोकसभा में केंद्र सरकार के लिए भाजपा को समर्थन मिला है। 

जहां तक विपक्षी दलों की एकता का सवाल है, नीति विचारधारा और नेतृत्व के बिना ये संभव नहीं है। कांग्रेस सहित सभी क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी सोच, नीति और विचारधारा है। अधिकांश क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस का राज्य स्तर पर मुकाबला होता है। यह बात अलग है कि कई राज्यों में कांग्रेस अब काफी पीछे चली गई है। ममता बनर्जी कांग्रेस और कम्युनिस्ट के साथ किसी विपक्षी गठबंधन में जाएंगी जबकि बंगाल में उनका इन्हीं दलों से मुकाबला होता है। इसी प्रकार दक्षिण भारत के राज्यों में जितने भी क्षेत्रीय दल हैं वह भी कांग्रेस के साथ गठबंधन में जाने से बचेंगे क्योंकि राज्य स्तर पर कांग्रेस उनकी प्रतिद्वंदी है।  

देश में विपक्ष की एकता और विभाजन के इतिहास पर नजर डाली जाए तो विपक्षी दलों को तोड़ने और छिन्न-भिन्न करने का काम हमेशा कांग्रेस ने किया है। विपक्षी नेता भारत के इतिहास को भूले नहीं होंगे तो उन्हें याद होगा कि कैसे कांग्रेस गठबंधन कर विपक्ष के नेताओं को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाती थी और फिर उन्हें पद से उतारकर अपने राजनीतिक हित साध लेती थी। 

केजरीवाल को मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में आम आदमी पार्टी ने एक प्रकार से घोषित कर दिया है। दिल्ली में जिस तरह से भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीतिक विवाद चल रहे हैं उनके प्रतिउत्तर में आम आदमी पार्टी ऐलान कर रही है कि 2024 में मुकाबले से डर के कारण भाजपा केजरीवाल पर अनाप-शनाप आरोप लगा रही है। जो केजरीवाल, कांग्रेस की दिल्ली सरकार को अपदस्थ कर सत्ता में आए हैं अब कांग्रेस के साथ किस कीमत पर जाएंगे? अभी हाल ही में पंजाब में कांग्रेस की सरकार को आम आदमी पार्टी ने बुरी तरह से पराजित किया है। 

आम आदमी पार्टी जिस तरह से विभिन्न राज्यों में अपने विस्तार का प्रयास कर रही है, उससे यह साफ दिखाई पड़ रहा है कि कांग्रेस के मैदान पर ही आम आदमी पार्टी को जगह मिल सकती है। गोवा में भी इस पार्टी ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। आने वाले विधानसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी जो जनाधार प्राप्त कर सकती है। वह कांग्रेस के आधार से ही हासिल करेंगे। जिस पार्टी का मुकाबला कांग्रेस से है और जो पार्टी कांग्रेस को देश में भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार मानती है, वह उसके साथ गठबंधन में जाएगी, यह बात शंकास्पद है। 

शरद पवार भी विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण फैक्टर हैं। राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने भूमिका निभाई लेकिन उसमें भी विपक्षी एकता बिखर गई थी। उपराष्ट्रपति के प्रत्याशी चयन के बाद ममता बनर्जी ने ऐलान कर दिया था कि वह विपक्ष के प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेंगी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी विपक्षी एकता के लिए हाथ पैर  पटक रहे हैं। पहले उन्होंने महाराष्ट्र का दौरा कर उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। अब तो ठाकरे ही अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हुए हैं। अभी हाल ही में केसीआर बिहार जाकर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनाने के लिए विपक्षी एकता के हवा भर कर आए। हवा भरी जाए तो फूलना नेचुरल है। नीतीश कुमार उसके बाद दिल्ली पहुंच गए। 
 
एक दौर था जब कांग्रेस के विरुद्ध एकजुट होकर विपक्ष जनादेश के लिए जाता था और आज यह दौर है जब भाजपा वर्सेस विपक्ष हो गया है। जो कांग्रेस कभी देश की राजनीति की मुख्य धुरी होती थी वह आज विपक्ष की एकता में अपनी भूमिका तलाशने का संघर्ष कर रही है। नीतीश कुमार लंबे समय तक बिहार मुख्यमंत्री रहे हैं लेकिन अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा चुके हैं। अभी तो विपक्षी पार्टियों एक साथ आने का मंतव्य जाहिर कर रही हैं। 

राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं है। लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं तब तक नीतीश कुमार जैसे लोग अपनी महत्वाकांक्षा को पालते-पोसते रहेंगे।  मोतियाबिंद हो जाए तो दृष्टि कमजोर हो जाती है लेकिन विपक्ष के साथ तो ऐसा लग रहा है जैसे उसे मोदियाबिंद हो गया है और इसके कारण दृष्टिदोष पनप गया है। 
 
न्यूटन का सिद्धांत है. किसी वस्तु को जितनी तेज गति से उछालोगे, उतनी ही तेज गति से वह नीचे भी आएगी। लोकसभा निर्वाचन के लिए विपक्षी एकता की बात जिस तेज गति से चल रही है उसका उतनी ही तेज गति से उसका नीचे आना निश्चित है। 
 
मोदी का नेतृत्व विपक्षी एकता से नहीं बांधा जा सकता। मोदी का विश्वास जनता में और जनता का विश्वास मोदी में है। विपक्ष को लोकसभा चुनावों के लिए एकता से ज्यादा जनता के बीच विश्वास बढ़ाने की जरूरत है। गठबंधन और जमावट से केंद्रीय सत्ता हासिल करने का समय बीत चुका है। आने वाले वक्त में भारत में काफी लंबे समय तक मजबूत और स्पष्ट जनादेश ही मिलेगा। अब तो ऐसा लगने लगा है कि विपक्षी दल जिस ढंग से मोदी विरोध में जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं उससे विपक्ष को फायदा मिले या नहीं मिले लेकिन प्रतिक्रिया स्वरुप मोदी को जरूर इसका लाभ होगा।