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ज़रूरत है, भारत में ”मोटापे” से युद्ध की

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 19 May

सार

ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लोगों को पता हो वो जिस चीज का वे सेवन कर रहे हैं उसका उनकी सेहत पर क्या असर होगा?

janmat

विस्तार

आज हमारे देश भारत की बड़ी आबादी तमाम बीमारियों की जड़ मोटापे से जूझ रही है, जिससे भारत में  बड़े ही नहीं, किशोरों व बच्चों तक में मधुमेह, थायराइड, उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां बढ़ी हैं।  यह महत्वपूर्ण बात है कि महामारी की तरह बढ़ते मोटापे को लेकर अब सरकार सोचने लगी है और सजग भी हुई है।भारत की नीति-नियंता संस्था नीति आयोग ने नागरिकों को मोटापे से मुक्त करने के लिये इसकी वृद्धि के प्रमुख कारकों मसलन चीनी, नमक व वसा की अधिकता वाले पदार्थों को चिन्हित करने और इन खाद्य पदार्थों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने की हाल में ही संस्तुति की है। इस प्रकाश में उत्पादों पर ‘फ्रंट ऑफ दि पैक लेबलिंग’ जैसे कदम उठाने की बात भी कही गई है, जिससे लोगों को मोटापे के खतरे से आगाह किया जा सके।उद्देश्य यही है कि लोग खाने की वस्तुएं चयन करते वक्त सावधानी बरतें और उन्हें यह साफ़-साफ़ पता हो कि उनके स्वास्थ्य के लिये क्या-क्या घातक है।

नीति आयोग के शोध संस्थान की वर्ष २०२१-२०२२की रिपोर्ट में सचेत किया गया है कि देश में बच्चों, किशोरों और महिलाओं में अधिक वजन व मोटापे की समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है। नीति आयोग देश के आर्थिक विकास संस्थान और भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर इस दिशा में कदम उठा रहा है। सर्व विदित है कि भारतीय भोजन में परंपरागत रूप से नमकीन, चिप्स, भुजिया आदि का प्रचलन तो रहा है, इसके साथ हाल के वर्षों में स्नैक्स के नाम पर ऐसे खाद्य पदार्थों का प्रचलन बढ़ा है जो सेहत के लिये हानिकारक हैं।  एक  अन्य संस्था राष्ट्रीय परिवार सेहत सर्वेक्षण से आई यह रिपोर्ट हमारी चिंता का विषय होना चाहिए कि राष्ट्रीय परिवार सेहत सर्वेक्षण के अनुसार देश में मोटापे से पीड़ित महिलाओं की संख्या चौबीस प्रतिशत हो गई है, जबकि पुरुषों का यह आंकड़ा २२।९ प्रतिशत है। ऐसे में सरकार का इस दिशा में कदम उठाना वक्त की जरूरत ही कहा और माना जाना चाहिए। वैसे, मोटापा तमाम बीमारियों की जड़ है और इससे होने वाले रोगों के चलते भारतीय चिकित्सा तंत्र भी भारी दबाव महसूस करता है।

वेसे तो कहीं न कहीं शहरी जीवन शैली व खानपान की आदतों में बदलाव के चलते मोटापे की समस्या चिंताजनक हुई है। इस समस्या के बाबत बात तो वर्षों से होती रही है, लेकिन इस दिशा में गंभीर पहल होती नजर नहीं आई। बाजार के मायाजाल के चलते देश में जंक फूड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का उपयोग बढ़ा। इसमें उत्पादकों ने बाजार तो तलाशा,लेकिन आम आदमी की सेहत की फिक्र नहीं की। विडंबना यह भी रही कि मोटापा बढ़ाने वाले कारकों का जिक्र तो हुआ मगर इन पर रोक की गंभीर कोशिश होती नजर नहीं आई। इन्हें रोकने को जो कदम उठाये गये वे महज प्रतीकात्मक ही रहे।

आज बाजार में ऐसे खाद्य पदार्थों का अंबार लगा है जो स्वाद में तो लुभाते हैं, लेकिन सेहत पर भारी हैं। इनका दीर्घकालिक हानिकारक असर सेहत पर होता है जिसके चलते मोटापा बढ़ता है और उसकी आड़ में मधुमेह से लेकर हृदय रोग तक की गंभीर बीमारियां पनपने लगती हैं। जो कालांतर अनदेखी के चलते भयावह रूप ले लेती हैं। आज़ वक्त की माँग है कि मोटापा पैदा करने वाले कारकों का सख्ती से नियमन किया जाये।

ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लोगों को पता हो वो जिस चीज का वे सेवन कर रहे हैं उसका उनकी सेहत पर क्या असर होगा? विकसित देशों की भाँति मोटापे की समस्या ने भारत में भी तेजी से पांव फैलाने शुरू कर दिये हैं। भारत में ऐसी समस्या इसलिये विकराल रूप धारण कर सकती है क्योंकि लोग वक्त रहते सचेत नहीं हैं ।हमें यह ध्यान नहीं रहता कि हम दैनिक जीवन में मोटापा बढ़ाने वाले कारक कब हिस्सा बन गये हैं। यह भी कि कौन से खाद्य पदार्थ वास्तव में मोटापा बढ़ाने वाले हैं। ऐसी लापरवाही के चलते शरीर कब जानलेवा बीमारियों का घर बन जाता है, व्यक्ति को अहसास ही नहीं होता।