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ये सरकार और इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 29 May

सार

गृह सचिव ने विज्ञान विभागों को सूचित किया है कि ‘पुरस्कार व्यवस्था में रूपांतरण करने के प्रधानमंत्री के निर्देशों के अनुरूप पुरस्कार और प्राप्तकर्ताओं की संख्या काफी सीमित करनी पड़ेगी..!

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विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

14/10/2022

देश ने आठ विज्ञान विभागों और मंत्रालयों द्वारा हर साल दिये जाने वाले लगभग तीन सौ पुरस्कार और फेलोशिप खत्म  किये जा रहे  हैं | बचे-खुचे पुरस्कारों में भटनागर पुरस्कार  एक है, यह जारी रहेगा अलबत्ता बदले स्वरूप में। हालांकि इस साल के विजेताओं को लेकर रहस्य अभी तक बरकरार है। यह छोटी खबर नहीं है , परन्तु  राजनीति को ही महत्व देने वाले मीडिया की नजरों से ओझल है | भारत की विज्ञान बिरादरी साल के इन दिनों में  विज्ञान पुरस्कारों की बात जोहती है | हर साल  सितंबर के अंत में भारतीय विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में बढ़िया कर दिखाने वाले और 45  वर्ष से कम उम्र के वैज्ञानिकों के लिए शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार की घोषणा करती है, लेकिन सीएसआईआर ने इस साल पुरस्कारों की घोषणा नहीं की, इसकी बजाय केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भटनागर पुरस्कार समेत अन्य कई विज्ञान पुरस्कार एवं अलंकरणों में बदलावों को लेकर हुई बैठक की  और कई पुरुस्कार और फेलोशिप समाप्त कर दी |

भारतीय यूनिवर्सिटियों और अनुसंधान प्रयोगशालाओं में खोजकर्ताओं का काम यथेष्ट अनुदान की कमी एवं अन्य कारकों की वजह से खुलकर नहीं हो पाता है और गृह मंत्रालय की इस बैठक में जो तय हुआ है, की विज्ञान विभाग अधिकांश पुरस्कार और फेलोशिप्स देना बंद  कर दी जाए | यदि ऐसा हुआ  तो यह वैज्ञानिक बिरादरी हतोत्साहित ही होगी । गृह सचिव ने विज्ञान विभागों को सूचित किया है कि ‘पुरस्कार व्यवस्था में रूपांतरण करने के प्रधानमंत्री के निर्देशों के अनुरूप पुरस्कार और प्राप्तकर्ताओं की संख्या काफी सीमित करनी पड़ेगी’।

सही अर्थों में  कई वैज्ञानिक पुरस्कार तार्किक भी हैं और रिवायत भी। 1958  में शुरू हुआ भटनागर पुरस्कार, युवा और प्रौढ़ वैज्ञानिकों की नई खोजों को सम्मान देकर उत्साह बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया था| सीएसआईआर की 1992  में जारी की सूची में 1958  से 1991 के बीच पुरस्कृत जिन वैज्ञानिकों के नाम हैं, वे भारतीय विज्ञान जगत की सिरमौर हस्तियां हैं। इनमें केएस कृष्णन, विक्रम साराभाई, राजा रामन्ना, वी. रामालिंगास्वामी, एमजीके मेनन, एमके वेणु बाप्पू, जीवी नार्लेकर, ओबेद सिद्दीकी, यूआर राव, वीएस अरुणाचलम, सीएनआर राव, आरए माशेलकर, माधव गाडगिल और समीर ब्रह्मचारी आदि शामिल  हैं।

वैसे तो सरकार की ओर से निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए भी पुरस्कार दिये जाते रहे हैं। 1990  के दशक में तकनीकी विकास बोर्ड द्वारा स्थापित राष्ट्रीय तकनीकी पुरस्कार के पहले दो विजेताओं में शांता बायोटेक और भारत बायोटेक थे– आज ये दोनों भारत की वैक्सीन शक्ति के प्रतीक हैं। जहां भटनागर पुरस्कार जारी रहेगा वहीं बायोमेडिकल अनुसंधान में श्रेष्ठता के लिए दिया जाने वाला बीआर अम्बेडकर पुरस्कार जोकि मेडिकल रिचर्स में 5  लाख रुपये वाला इनाम है, खत्म कर दिया गया है।

 जो अन्य पुरस्कार खत्म किए गए हैं, उनमें पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा स्थापित डॉ. अन्ना मणि पुरस्कार भी है , जो पृथ्वी विज्ञान में अनुसंधान में महिला वैज्ञानिकों के लिए था। इनकी स्थापना मौसम विज्ञान-उपकरण खोज में अतुलनीय काम करने वाली अन्ना मणि का नाम स्थाई रखने में मददगार रही । दर्जनों की गिनती में जिन निजी प्रतिभा व्याख्यान और फेलोशिप्स को बिना कारण बताए खत्म किया गया है, उनका भी प्रयोजन था : ‘उन लोगों की याद और कामों को जिंदा रखना जिन्होंने योगदान तो बहुत किया, किंतु लोग उन्हें ज्यादा नहीं जानते।’

ऐसे ही पुरस्कारों में छूत रोगों में उत्कृष्ट खोजियों के लिए मेजर जनरल साहिब सिंह सोखी पुरस्कार शायद एकमात्र इनाम है जो कि 20 वीं सदी के  एक अनजान चिकित्सा-नायक के नाम पर है। आईसीएमआर द्वारा दिया जाने वाला एक अन्य पुरस्कार टेस्ट ट्यूब बेबी के अग्रणी विशेषज्ञ डॉ. सुभाष मुखर्जी के नाम पर है। हाल ही में एक समारोह में प्रधानमंत्री मोदी ने रंज प्रकट किया था कि भारत अपने वैज्ञानिकों के योगदान का उचित गुणगान नहीं करता। इसके विपरीत  अब विज्ञान क्षेत्र की विभूतियों की याद को बनाए रखने वाले पुरस्कार खत्म कर देना  जरूरी माना  जा रहा है |

और तो और जिस  ढंग से गृह मंत्रालय ने विज्ञान विभाग का मूल्यांकन करने का निर्णय किया है वह चौंकाता है। यह भारत की सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थाओं की सार्वभौमिकता और निर्णय लेने वाले तंत्र पर हमला सा लगता है।  जो रवैया गृह मंत्रालय ने इस विषय पर बरता है और बैठक के अंत में जिस तरह गृह सचिव ने तमाम विज्ञान विभागों को ‘दस दिन के भीतर कार्रवाई की’ रिपोर्ट जमा करवाने को कहा है |उससे प्रतीत होता है मुख्य विज्ञान सलाहकार  स्वतंत्र निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।

पुरस्कार तो  विजेता भावी छात्रों और वैज्ञानिकों के लिए आदर्श होते हैं। इनाम और प्रोत्साहन नूतन विषयों में अनुसंधान करने को उत्साहित करता है और खोज कार्य में नज़रअंदाज हुए पड़े विषय भी ध्यानाकर्षक बन सकते हैं, पर सरकार का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होना  चाहिए |