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किसका रोष-किसका दोष, अति जोश में खोता होश

सार

आक्रोश, रोष, खीझ, क्रोध क्या कोई पैदा कर सकता है? आक्रोश तो प्रतिक्रिया से पैदा होता है, बिना किसी कारण भी कई बार कुछ चीजें प्रतिक्रिया में आक्रोश पैदा करती हैं. कांग्रेस की जनाक्रोश यात्रा बीजेपी के खिलाफ कथित रूप से व्याप्त आक्रोश की खाई को चौड़ा कर चुनाव में लाभ लेने के लक्ष्य के साथ शुरू की जा रही है.

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विस्तार

आक्रोश की दरार को बढ़ाने के लिए कांग्रेस ने इन यात्राओं के नेतृत्व के लिए जिन चेहरों को चुना है, उनमें से कई चेहरे तो राज्य कांग्रेस और उसके नेतृत्व के खिलाफ ही आक्रोश व्यक्त कर चुके हैं. लगता है कि कांग्रेस संगठन में रणनीति और प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया में संभावित आक्रोश की संभावनाओं को कमजोर करने के लिए जनाक्रोश यात्राओं के लिए नेताओं का चयन किया गया है.

जिन नेताओं ने समय-समय पर पीसीसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे, उनके आक्रोश को नियोजित करने के लिए यात्राओं के कार्यक्रम तैयार कर दिए गए हैं. इन यात्राओं के लिए प्रदेश को सात रूटों में विभाजित किया गया है. सुरेश पचौरी, डॉक्टर गोविंद सिंह, कांतिलाल भूरिया, अजय सिंह, कमलेश्वर पटेल, जीतू पटवारी और अरुण यादव इन रूटों पर यात्रा का नेतृत्व करेंगे. गोविंद सिंह तो नेता प्रतिपक्ष हैं. कमलेश्वर पटेल,जीतू पटवारी  और कांतिलाल भूरिया विधायक हैं. अरुण यादव को खंडवा उपचुनाव में प्रत्याशी के लिए पार्टी ने उपयुक्त नहीं पाया था और अब उन्हें बुंदेलखंड और भोपाल-विदिशा जिले में जाने वाली यात्रा का दायित्व दिया गया है.

सुरेश पचौरी गांधी परिवार के करीबी वरिष्ठ समन्वय वाले नेताओं में शामिल हैं. कांग्रेस की ठाकुर ब्राह्मण राजनीति में हमेशा सुरेश पचौरी को किनारे किया जाता है. यात्रा के प्रभारी नेताओं में जितने विधायक हैं, वह सभी चुनाव मैदान में उतरेंगे ही. अजय सिंह का भी चुरहट से चुनाव मैदान में उतरना सुनिश्चित है. अरुण यादव के छोटे भाई सचिन यादव भी विधानसभा चुनाव में उनकी परंपरागत सीट से प्रत्याशी बनाए जाएंगे.

जनाक्रोश यात्रा के नेताओं में सुरेश पचौरी अकेले वरिष्ठ नेता हैं जिनके चुनाव लड़ने पर संशय बना हुआ है. जनाक्रोश यात्रा के लिए प्रभारी नेताओं के कंपोजीशन को अगर आधार माना जाए तो यह कहा जा सकता है कि सुरेश पचौरी भी पार्टी की ओर से चुनाव मैदान में उतारे जा सकते हैं.

नकारात्मक राजनीति आज ज्यादा प्रभावी मानी जाती है. पहले राजनीतिक दल अपने सकारात्मक एजेंडे के साथ जनता के बीच में जाते थे. अब नकारात्मक एजेंडा सकारात्मक एजेंडे को पीछे छोड़ रहा है. जब भी कोई यात्रा होती है तो उसमें सामान्य रूप से राज्य का सबसे प्रमुख नेता जनता के बीच रथ यात्रा में जाता है ताकि जनता को यह स्पष्ट हो जाए कि चुनाव में कौन से प्रमुख चेहरे हैं जिनके बीच में सरकार के गठन के लिए उन्हें जनादेश देना है. कांग्रेस में चेहरे के रूप में निर्विवाद रूप से कमलनाथ ही हैं.  

विंध्य प्रदेश से जनाक्रोश यात्रा की समीक्षा की जाए तो यह पूरा इलाका ब्राह्मण और ठाकुरों की राजनीति का गढ़ कहा जाता है. अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी परंपरागत रूप से दोनों वर्गों की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते थे. विंध्य प्रदेश में अजय सिंह लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में जनाक्रोश का शिकार हो चुके हैं. जिस चेहरे पर ही विश्वास का जनादेश नहीं दिया गया हो उसी चेहरे को पूरे अंचल में किसके खिलाफ जनाक्रोश की खाई को बढ़ाने के लिए यात्रा में उतारा गया है?

विंध्य क्षेत्र में अगर ठाकुर नेतृत्व को आगे किया जा रहा है तो फिर संतुलन के लिए कांग्रेस को किसी न किसी ब्राह्मण चेहरे को भी लाना होगा. इसके बाद ही इस अंचल की राजनीति को संतुलित किया जा सकेगा. विंध्य प्रदेश से कांग्रेस को बहुत उम्मीदें हो सकती हैं पिछले चुनाव में विंध्य प्रदेश ने बीजेपी का साथ दिया था. ब्राम्हण नेता राजेंद्र शुक्ला को मंत्रीपद की शपथ दिलाकर भाजपा ने अपनी पुरानी गलती को ठीक कर ब्राह्मणों में फिर सकारात्मक संदेश दिया है.

अरुण यादव को बुंदेलखंड की जनाक्रोश यात्रा का नेतृत्व दिया गया है. अरुण यादव का प्रभाव क्षेत्र मालवा-निमाड़ माना जाता है. खरगोन से ही वह सांसद रहे हैं. इसी अंचल से अगले चुनाव में भी वह अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं. अजय सिंह राहुल को उनके गृह अंचल में यात्रा का नेतृत्व दिया गया है तो अरुण यादव को उनके प्रभाव वाले क्षेत्र से अलग बुंदेलखंड में यात्रा करने के लिए अवसर क्यों दिया गया है? यह बात समझ नहीं आ रही है.

बुंदेलखंड में वैसे भी बीजेपी की कई बड़े वजनदार नेता मैदान में है. बुंदेलखंड के स्थानीय नेताओं को यात्रा में दरकिनार करने के पीछे आंतरिक असंतोष की संभावनाएं खत्म करने की रणनीति हो सकती है. किसी ऐसे नेता की रथ यात्रा का पार्टी को क्या लाभ होगा जिसका उस इलाके में बहुत ज्यादा जनाधार ही नहीं माना जाता है.

सुरेश पचौरी को यात्रा के जिस रूट का नेतृत्व दिया गया है उसमें छिंदवाड़ा भी शामिल है. सुरेश पचौरी को समन्वय वाला नेता माना जाता है. उन्हें कमलनाथ के भी करीबी के रूप में पार्टी में देखा जाता है. ठाकुर राजनेताओं के साथ सुरेश पचौरी की टकराहट और कड़वाहट लंबे समय से चली आ रही है. कमलनाथ हमेशा छिंदवाड़ा को बीजेपी मुक्त कहते हैं तो फिर यहाँ आक्रोश किसके खिलाफ है?

पचौरी गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं. चुनावी राजनीति में रणनीतिकार के रूप में उन्होंने हमेशा अपनी भूमिका निभाई है. हालांकि जनादेश में हर बार उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा है. दो-तीन चुनाव हारने वाले कई नेताओं को पार्टी विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी के रूप में उतार रही है. पचौरी ने कभी संगठन के खिलाफ या पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ सार्वजनिक रूप से तो प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की है लेकिन उनको समझने वाले सूत्रों पर विश्वास किया जाए तो पार्टी की कार्यप्रणाली से वे भी बहुत खुश नहीं बताए जा रहे हैं.

विंध्यप्रदेश के पटेल नेता कमलेश्वर पटेल कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में अचानक उभर कर सामने आए हैं. मध्यप्रदेश से दिग्विजय सिंह के अलावा वह दूसरे नेता हैं जिन्हें कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल किया गया है. सीधी जिले की राजनीति में कमलेश्वर पटेल के पिता इंद्रजीत पटेल कभी अर्जुन सिंह के सबसे करीबी नेता हुआ करते थे लेकिन अब अजय सिंह और पटेल परिवार के बीच राजनीतिक मनमुटाव की खबरें आम हैं. चुरहट में अजय सिंह की पराजय के पीछे भी पटेल मतदाताओं की भूमिका मानी जाती है. कमलेश्वर पटेल को जिस रूट का प्रभारी बनाया गया है वहां भी उनका प्रभाव ना के बराबर ही कहा जा सकता है.

कांतिलाल भूरिया को उनके आदिवासी अंचल की यात्रा का ही प्रभार दिया गया है. भूरिया कांग्रेस के बड़े आदिवासी नेता हैं. उन्हें राज्य स्तरीय चुनाव समिति का चेयरमैन बनाया गया है लेकिन लंबी आदिवासी राजनीति के चलते उनके खिलाफ आक्रोश भी पनपा है. उनके प्रभाव वाले लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विधानसभा जोबट की नेत्री सुलोचना रावत बीजेपी में शामिल हो चुकी हैं. कांतिलाल भूरिया और आदिवासी  नेता उमंग सिंगार के बीच भी राजनीतिक सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण नहीं कहे जा सकते. आदिवासी युवाओं द्वारा कांतिलाल भूरिया के खिलाफ परिवार की राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है.

जीतू पटवारी एक जुझारू नेता हैं. उन्हें यात्रा के जिस रूट का प्रभार दिया गया है वह भी उनका प्रभाव क्षेत्र नहीं माना जाता है. जीतू पटवारी को राहुल गांधी के करीबी नेता के रूप में देखा जाता है. उन्होंने कई बार यह कहा है कि प्रदेश में कोई भी मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है. चुनाव के बाद विधायकों द्वारा नेता चुना जाएगा. पिछले चुनाव में जीतू पटवारी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था. पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ ने उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष और मीडिया अध्यक्ष के पद से हटाया था. पार्टी संगठन की कार्यप्रणाली पर कई बार उनके द्वारा सवाल उठाए गए हैं.

जो चेहरे कांग्रेस में ही असंतोष और आक्रोश के प्रतीक बने हुए हैं उन चेहरों का जनता में व्याप्त आक्रोश की दरार को बढ़ाने में उपयोग किया जा रहा है या उनके आक्रोश को सीढ़ी पर चढ़ने उतरने की रणनीति के तहत कम करने का प्रयास किया जा रहा है? साथ ही जनाक्रोश यात्रा में महिलाओं और अल्पसंख्यकों को भी नज़रअंदाज़ किये जाने से आक्रोश की बात सामने आ रही है। 

नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर गोविंद सिंह वरिष्ठ नेता हैं. वह लगातार चुनाव जीतते रहे हैं. उनकी स्पष्टवादिता कई बार पार्टी को भारी पड़ती है. अभी हाल ही में उनके विधानसभा क्षेत्र में टीआई की पदस्थापना में ब्राह्मण और क्षत्रिय अधिकारियों को लेकर चुनाव आयोग में शिकायत की है. वे ग्वालियर चंबल में यात्रा का नेतृत्व करेंगे. इस इलाके में उनका पर्याप्त प्रभाव माना जाता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के विरोधी नेता के रूप में उनको स्वीकार किया जाता है.

ग्वालियर चंबल अंचल ठाकुर और ब्राह्मण राजनीति का केंद्र है. वहां पुलिस अधिकारियों की निचले स्तर पर पदस्थापना चुनाव को प्रभावित करने का बड़ा हथियार माना जाता है. डॉक्टर गोविंद सिंह ने सार्वजनिक रूप से ब्राह्मण अधिकारियों के खिलाफ स्टैंड लेकर पूरे अंचल में ब्राह्मण राजनीति को छेड़ दिया है. उनके नेतृत्व में जन आक्रोश यात्रा जनता में व्याप्त आक्रोश को उभारेगी या कांग्रेस के खिलाफ इससे आक्रोश उभर जाएगा इस पर पर्यवेक्षकों की नजर बनी हुई है.

कांग्रेस ने जनाक्रोश यात्रा के कार्यक्रम के प्रेस नोट में जोश बनाम आक्रोश के रूप में यात्रा के लक्ष्य बताए हैं. इससे  ऐसा लगता है कि सत्ता विरोधी रुझान से अति आत्मविश्वास में आई कांग्रेस जोश में होश खोती जा रही है. जनाक्रोश यात्राओं में प्रभारी महासचिव रणदीप सुरजेवाला और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के चित्र नहीं होने से भी विवाद पैदा हो गया है. सभी पार्टियों में ऐसे चेहरे होते हैं जो रणनीति में तो सफल माने जाते हैं लेकिन जनता में उनके चेहरे नुक़सान का सौदा साबित होते हैं.

आक्रोश, नीतियों-चेहरों और कार्यप्रणाली से पनपता है. कांग्रेस सरकार तो आक्रोश के कारण ही काल कवलित हुई है. आक्रोश के मोहरे पॉजिटिव और विजेता चेहरे हुआ करते हैं. प्रेम फैलाने से प्रेम मिलता है. आक्रोश फैलाने से तो आक्रोश ही मिलेगा. इतनी सहज बात समझ कर ही भविष्य उज्जवल बनाया जा सकता है.