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क्या इन हालातों में भारत का भला होगा ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 25 Jul

सार

प्रतिदिन,  राकेश दुबे- हम फिर उसी काल खंड की और जाते दिख रहे है, जिसमें देश का विभाजन हुआ था| इस विभाजनकारी मानसिकता को दोनों तरफ से हवा दी जा रही है| सरकार, जिसकी यह सब रोकना प्राथमिक जिम्मेदारी है पता नहीं क्यों चुप है ?

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विस्तार

प्रतिदिन  राकेश दुबे                                                                             

देश में इन दिनों जो कुछ घट रहा है, उससे किसी का लाभ हो या न हो देश का नुकसान होना निश्चित है| हम फिर उसी काल खंड की और जाते दिख रहे है, जिसमें देश का विभाजन हुआ था| इस विभाजनकारी मानसिकता को दोनों तरफ से हवा दी जा रही है| सरकार, जिसकी यह सब रोकना प्राथमिक जिम्मेदारी है पता नहीं क्यों चुप है ?

हाल ही में पृथ्वीराज चौहान पर एक फिल्म आई, जिसने इतिहास और मिथ का फर्क मिटाने की कोशिश की है। दर्शकों को यह सिखाने की जगह कि चंद बरदाई एक दरबारी कवि थे, कोई इतिहासकार नहीं| फिल्म कवि द्वारा गढ़े गए मिथकों को इतिहास की तरह पेश करती है और भोला दर्शक उसे इसी रूप में स्वीकार करने लगता है। इस तरह का मिथकीय इतिहास देश का क्षैतिज विभाजन ही करता है। इसके पहले “कश्मीर फाईल्स” और उसे मिले सरकारी प्रश्रय ने भी विभाजन को हवा दी थी|

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि इतिहास एक दोधारी तलवार होता है। कभी वह हमें अपनी जड़ों से जोड़कर अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानने की शक्ति प्रदान करता है, तो कई बार हमारे शरीर से लिपटे भारी पत्थर की तरह हमें पाताल की अतल गहराइयों की तरफ ले जाता है। देश के गृह मंत्री अमित शाह  इतिहास के पुनर्लेखन  की बात कह रहे हैं| सही इतिहास देश को मालूम होना चाहिए, इसके साथ यह भी हम पर निर्भर है कि हम इतिहास को किस रूप में लेते हैं। पिछले दिनों जिस तरह हमने इतिहास के पुनर्लेखन का प्रयास किया है, उससे लगता है कि हम एक ऐसे राष्ट्र में तब्दील हो रहे हैं, जो इतिहास से सबक नहीं लेते।

फिल्मों से लेकर पाठ्य सामग्री के पुनर्निर्माण तक हम ऐसी सारी गलतियां कर रहे हैं, जिनके चलते नकारात्मक अर्थों में कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है। देश में वर्तमान तनाव का दौर वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग की कथित खोज से शुरू हुआ है। इसके बाद अलग-अलग ऐतिहासिक इमारतों में शिवलिंग की खोज का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसे देख खुद आरएसएस प्रमुख को कहना पड़ा कि यह उत्साह उचित नहीं है। वास्तव में उनके हस्तक्षेप की जरूरत ही नहीं थी, अगर हम देश के संविधान व कानूनों का सम्मान करना सीख जाएं। यह गंभीर  चिंता और चिंतन का विषय है जब देश के संविधान और कानून को ही असांविधानिक घोषित कराने के प्रयास में एक वर्ग आमादा दिखे|

टीवी चैनलों  पर चल रही बहस तनाव के इस माहौल को और भड़काने का काम कर रही हैं। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी सीमाओं पर नई तरह की बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों तक में दोनों पक्षों ने संयम खोकर बहस कर रहे हैं  और सरकार चुप है| इसो सब का नतीजा १० जून को जुमे की नमाज के बाद देश के कई दर्जन शहरों में वर्ग विशेष के लोग सड़कों पर निकल आए, उनके पथराव तथा आगजनी के बाद पुलिस को लाठी गोली चलानी पड़ी। दो लोग मारे भी गए।

आज आप यह सोचकर निश्चिंत नहीं बैठ सकते कि कोई प्रसंग किसी देश का नितांत अंदरूनी मसला हो सकता है और बाकी दुनिया पर उसका कोई असर नहीं पडे़गा। इसलिए जैसे ही नूपुर शर्मा की टिप्पणी वायरल हुई, पूरी दुनिया, खास तौर से मुस्लिम बहुल मुल्कों में उसको लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई। सिर्फ इस्लामी ब्लॉक में ही विरोध के स्वर सुनाई देते, तब भी उसे नजरंदाज करना मुश्किल था, यहां तो संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन जैसे मानवाधिकारों को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देने वाले देशों से भी विरोध के स्वर सुनाई दिए।

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षा भी अपनी एक विश्वव्यापी छवि बनाने की है। उन्हें शुरू में कुछ सफलता मिली भी थी। पाकिस्तान की मुखालिफत के बाद भी कुछ अरब देशों ने अपने सर्वोच्च सम्मान से उन्हें नवाजा था। अब यह आम राय बनाने की कोशिश हो रही है कि भारत में मुसलमानों के साथ न्याय नहीं हो रहा है| सोचिये, देश की छबि कैसी बन रही है?

नूपुर शर्मा से ज्यादा कठोर और विवादास्पद बयान तो एक्स मुस्लिम नाम से चलने वाले कई दर्जन यू ट्यूब चैनलों से रोज सुनाई दे रहे हैं, पर उन्हें लेकर सड़कों पर किसी तरह हंगामा नहीं हो रहा , सरकार चुप है| क्योंकि इन चैनलो चलाने वाले भारत, पाकिस्तान या उत्तरी अमेरिका के रहने वाले  वर्ग विशेष के वे लोग हैं, जिनका दावा है कि उन्होंने इस्लाम छोड़ दिया है।

नूपुर शर्मा को डैमेज कंट्रोल के नाम पर पार्टी से निकाल जरूर दिया गया, पर कई मुस्लिम नेताओं व आतंकी संगठनों ने उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी देने की मांग की है, देश में कानून का राज्य बचा है या नहीं  । स्वाभाविक है कि इस बर्बर इच्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। नूपुर शर्मा को दंडित करने का अधिकार सिर्फ भारतीय राज्य को है और हर ऐसी हरकत के विरुद्ध संविधान और कानून-कायदे के तहत कार्रवाई होना चाहिए।

आज बड़ा और गहरा  सवाल है ,क्या हम उन अंधकार भरे दिनों की तरफ लौट रहे हैं, जिनसे विभाजन के दिनों में गुजरे थे? या क्या हम मन्दिर मस्जिद से जुड़ी घटनाएं दोहराना चाहते हैं? जुमे की नमाज के बाद भड़काकर पथराव या आगजनी कराकर हम देश का कितना भला कर पाएंगे?