हिन्दू धर्म का सामाजिक जीवन में महत्व एवं कार्य (Importance and Functions of Hindu Religion in Social Life)

हिन्दू धर्म का सामाजिक जीवन में महत्व एवं कार्य (Importance and Functions of Hindu Religion in Social Life)

 हिन्दू धर्म एक सैद्धान्तिक एवं विस्तारवादी धर्म नहीं है यह व्यवहार परक है। यह व्यक्ति, समुदाय और समाज के व्यापक कल्याण से जुड़ा धर्म है। वर्ण, आश्रम, संस्कार, पुरुषार्थ आदि से जुड़ी व्यवस्थाएँ इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं। हिन्दू धर्म के सामाजिक महत्व को हम निम्नानुसार प्रगट कर सकते हैं -



1. चारित्रिक व नैतिक गुणों का विकास (To inculcate character and Morality) : सामान्य धर्म और विशिष्ट धर्म के स्वरूपों का अध्ययन यः स्पष्ट करता है कि हिन्दू धर्म का प्रमुख लक्ष्य प्रत्येक व्यक्ति में चारित्रिक और नैतिक गुणों का विकास करना है।

2 व्यक्तित्व का विकास (Personality Development): व्यक्तित्व का विकास सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप होता है व्यक्तित्व के विकास में सामाजिक वातावरण का योगदान व प्रभाव रहता है। अतः धर्म के माध्यम से ऐसे वातावरण का विकास करने में सहायता मिलती है, जिससे कि उत्तम व्यक्तित्व का विकास हो सके।

3 आवश्यकताओं की पूर्ति (Satisfaction of Needs) : सामान्य धर्म के माध्यम से जहाँ चारित्रिक व नैतिक गुणों का विकास करने में सहायता मिली, वहीं व्यक्ति को कर्म (कार्य) करने के लिए प्रेरणा मिली है विशिष्ट धर्म के माध्यम से व्यक्ति को स्वयं अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थितियों आदि के अनुकूल आचरण करने का निर्देश दिया गया है। धर्म द्वारा विकसित व्यवस्था ने समाज के सभी सदस्यों को अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने का अवसर दिया।

4. व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करना (To provide security to individuals): धर्म द्वारा निर्धारित आचरणों को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त रहती है। अतः प्रत्येक व्यक्ति उसका पालन कर समाज में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करता है।

5. समानता का विकास (To develop equality): सामान्य धर्म ने समाज के सभी सदस्यों में समानता को विकसित करने में सहायता पहुँचाई है। 

6. पारस्परिक निर्भरता का विकास (To Develop interdependence): विशिष्ट धर्म के अन्तर्गत प्रत्येक वर्ण के व्यक्ति को अपने-अपने वर्ण धर्म का पालन करने के लिए कहा गया इसका परिणाम यह हुआ कि समाज के सदस्यों में आवश्यकताओं को पूर्ण करने की दृष्टि से एक-दूसरे पर निर्भरता बनी रही। 

7. सामाजिक संगठन व भाईचारे का विकास (To develop Social organization and Strengthen Social harmony) :  धर्म के कारण विकसित समानता ने सामाजिक संगठनों को मजबूत किया है उनमें परस्पर सहयोग, सहिष्णुता और भाईचारे को भी बढ़ावा दिया।

8. सामाजिक कल्याण (Social Welfare): धर्म द्वारा निर्धारित आचरणों से जहाँ व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति हुई वहीं समाज के संगठन, व्यवस्था, शांति और सुरक्षा का भी विकास हुआ। इन दशाओं में सम्पूर्ण समाज का हित अर्थात् कल्याण भी हुआ है।

 9. सामाजिक दुष्प्रवृत्तियों का दमन (Suppression of anti-social evil tendencies): धर्म को न केवल सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है, बल्कि यह जीवन को सार्थक करने का माध्यम भी है। धर्म ने समाज के सभी सदस्यों को एक-दूसरे के साथ व्यवहार रूपी ताने-बाने में बुन रखा है यही कारण है कि कोई भी व्यक्ति सामान्य धर्म अथवा विशिष्ट धर्म का उल्लंघन करने का न तो अवसर पाता था और न साहस ही कर सकता है। इस प्रकार असामाजिक प्रवृत्तियों को रोकने में धर्म ने बहुत सहायता की है।

10. सामाजिक नियंत्रण में सहायक (Helpful in social control) : प्रथमतः धर्म ने व्यक्ति में पाई जाने वाली स्वार्थ प्रवृत्ति, असामाजिक आचरण, सहयोग की भावना, अहंकार, अकर्मण्यता आदि दोषों को दूर करने में सामाजिक संगठन के माध्यम से भूमिका निभाई और दूसरी ओर पुरुषार्थ, कर्म, पुनर्जन्म, पाण-पुण्य आदि की धारणाओं ने भी इन बुराइयों को रोकने में सहायता की है।

11. व्यक्ति के समाजीकरण में सहायक (Helpful in the solicitation of the individual): धर्म ने व्यक्ति के सम्मुख आचरण के श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किए। इसलिए धर्म के माध्यम से व्यक्ति का समाजीकरण करने में सहायता मिली।

12. संस्कृति की सुरक्षा व हस्तांतरण (Conservation & Transmission of Culture) : विदेशी आक्रमणों और अन्य धर्मावलंबियों के प्रयासों के बावजूद हिन्दू संस्कृति सुरक्षित बनी रही। इसका कारण यही है कि धर्म ने न केवल व्यक्ति-व्यक्ति को मजबूत सामाजिक सम्बन्धों में बाँधे रखा, बल्कि धर्म के आधार पर विकसित सामाजिक संगठन में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच प्रत्यक्ष संबंध होने से नियंत्रण में सहायता मिली। या नहीं, हिन्दू धर्म के व्यावहारिक होने के कारण भी संस्कृति सुरक्षित रही तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका हस्तांतरण होता रहा। 

13. परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करने की क्षमता (Helped in Social Adjustment) : परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को ढाल लेने की क्षमता के कारण 600 से अधिक वर्षों की गुलामी के बावजूद हिन्दू धर्म व संस्कृति आज भी जीवित है।


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