भगवान निराकार है या साकार? इश्वर द्वैत है या अद्वैत?

ATUL VINOD:-

भगवान निराकार या साकार? के लिए इमेज नतीजे

ईश्वर का वास्तविक  स्वरूप निर्गुण और निराकार है व्यक्ति जब परमात्मा के मूल स्वभाव और स्वरूप को जान जाता है तभी उसे परम ज्ञान कहा जाता है| इश्वर का निराकार स्वरुप समुद्र है और साकार स्वरुप समुद्र कि बूंद.... बूँद भी समुद्र का ही हिस्सा है| यह ब्रह्मांड ऊर्जा का महासागर है “ओसीन ऑफ एनर्जी” वेदांत दर्शन में उस परमपिता परमात्मा को पूर्ण कहा गया है, अद्वैत दर्शन में दृश्य और अदृश्य हर प्रकार की सत्ता को उस ईश्वर के ही विविध रूप  बताए गए हैं|

कृष्ण को ईश्वर की सोलह कलाओं से युक्त माना जाता है| कृष्ण बूँद रूप में साकार हैं लेकिन ब्रम्ह रूप में निराकार| कृष्ण परब्रह्म है क्योंकि कृष्ण यानी अंधकार, डार्कनेस| पूरे संसार को यदि आप बाहर से देख पाए तो हर जगह सिर्फ और सिर्फ अंधकार नज़र आएगा ,  यही डार्क मैटर कृष्ण है इसी को परम शिव कहा जाता है| निराकार से साकार पैदा होता है| अद्वैत से ही द्वैत पैदा होता है| दिखने वाली दुनिया निराकार अव्यक्त ब्रह्म की आंशिक अभिव्यक्ति है| जब अव्यक्त ब्रह्म प्रकृति और पुरुष के रूप में व्यक्त होता है तो सृष्टि का निर्माण करता है|

शिव आकार स्वरूप है लेकिन  महा शिव निराकार है हम सब उस निराकार ब्रह्म के ही साकार अंश हैं| पूरा समुद्र एक है अद्वैत लेकिन समुद्र में पानी है जीव हैं जंतु हैं आकार हैं प्रकार हैं उसके अंदर जो है वो द्वैत है| ऐसे ही ब्रम्ह सागर अद्वैत है लेकिन उसके अंदर दिखने वाले द्रश्य द्वैत की तरह भासित होते हैं|

कृष्ण कहते हैं " हे पांडव ! जो चराचर भूतों में व्याप्त है , अथवा उष्णता जैसे अग्नि में अभिन्न रहती है , वैसे ही जो अविनाशी रहता हुआ सूक्ष्म दशा से सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है , उसे ज्ञेय जानो | जो अंतरबाह्य एक है , जो समीप और दूर एक है , जिसमें एक के सिवाय दूसरी बात ही नहीं है , जैसे क्षीर - समुद्र की मधुरता बीचमें बहुत और तीर पर थोड़ी नहीं होती उसी प्रकार जो पूर्ण है , स्वेदज आदि अलग - अलग योनियों में जिसकी अखंड व्याप्ति है | हजारों अलग - अलग घटों में प्रतिबिम्बित हुई चन्द्रिका जैसे भिन्न नहीं होती , अथवा करोड़ों ईखों में जैसे एक ही मधुरता रहती है , वैसे ही अनेक प्राणीसमुदायों में जो एक ही व्याप्त है | इसलिए जहां से यह भूताकार उत्पन्न होता है वही जिसका आधार है , जैसे की समुद्र ही तरंगों का आधार होता है |

अद्वैत का शाब्दिक अर्थ होता है- दो नहीं, एक| मतलब ब्रह्म और जीव दो नहीं हैं| जैसे समुद्उर और बूँद दो नहीं,  इनकी सत्ता एक ही है|

शंकराचार्य कहते हैं

1. ब्रह्म- ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है| वह निर्गुण, निराकार, अनादि, निरंजन, अद्वितीय और सर्वव्यापक है| माया से संयुक्त होकर वह निर्गुण ब्रह्म ईश्वर बनता है और सृष्टि का कारण है| इस तरह ब्रह्म से अभिन्न है|

2. जीव- जीव और ब्रह्म एक ही हैं| अविद्या यानी माया से आवृत होने पर जीव अपने को ब्रह्म से पृथक समझने लगता है| अविद्या के नष्ट होने के बाद वह ब्रह्म से अपनी अभिन्नता समझ लेता है और मैं ब्रह्म ही हूँ अर्थात् मुझमें और ब्रह्म में कोई विभेद नहीं है, यह अनुभूति होने लगती है|

3. जगत्- शंकर के मत में जगत् मिथ्या है| यहाँ मिथ्या शब्द का प्रयोग उन्होंने विशिष्ट अर्थ में किया है| यह नामरूपात्मक जगत् इन्द्रियगोचर है, वह असत् नहीं| उसकी सत्ता एक सीमा ही है| वह ब्रह्म तत्व से साक्षात्कार हो जाता है, तब इस जगत् की सत्ता बाधित हो जाती है अर्थात् उसकी यथार्थता का ज्ञान हो जाता है| इसी कारण उसे मिथ्या कहा जाता है|

4. माया- यह नामरूपात्मक दृश्यात्मक जगत् ब्रह्म का विवर्त (विकार) है| तत्व में भ्रामक एवं असल परिवर्तन ही विवर्त है|


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