कई जगह मुंह की खाई थी त्रिलोक विजेता रावण ने- दिनेश मालवीय

कई जगह मुंह की खाई थी त्रिलोक विजेता रावण ने

-दिनेश मालवीय

कोई कितना भी बलशाली हो, लेकिन उसे घमंड नहीं करना चाहिए. बलशाली होना बुरा नहीं है, लेकिन बल का घमंड उसे बार-बार अपमानित करवा देता है. उसे ऐसे लोगों से या इस तरह लज्जित होना पड़ता है, कि जिसकी उसने कल्पना तक न की होती है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण त्रेता युग का सबसे शक्तिशाली और आततायी रावण है. उसे अपने जीवन में पाँच बार बहुत बुरी तरह पराजित और लज्जित होना पड़ा. यहाँ तक कि एक बार तो उसे बच्चों ने ही खिलौने की तरह पकड़ कर पीटा.

आइये सुनते हैं ख़ुद को त्रैलोक्य विजेता कहते न थकने वाले इस बड़बोले महाबली की शिकस्तों की कहानियाँ. अपनी ताकत के घमंड में रावण इतना उन्मत्त हो गया कि दो-दो हाथ करने के लिए हर जगह अपने समान योद्धा ढूँढने लगा. उसका बल ही ऐसा था की सातों द्वीप, नवखंड, आकाश, सातों पाताल, पृथ्वी सभी उसके नाम से थर्राने लगे.

एक बार रास्ते में उसे देवर्षि नारद मिले. उसने व्यंग्य से हँसते हुए उनसे पूछा –“हे मुनि! देवता कहाँ हैं? नारदजी को यह बात अच्छी नहीं लगी. उन्होंने क्रोधित होकर उसे तत्काल श्वेतद्वीप भेज दिया. वहाँ पहुँच कर उसने बहुत-सी स्त्रियों को देखा. उसने कहा कि तुम अपने पतियों के पास जाओ और उनसे कहो कि राक्षसराज रावण आया है. मैं उन्हें संग्राम में जीतकर तुम सबको अपने साथ ले जाऊँगा.

बूढ़ी औरत से हारा

यह सुनकर एक बूढ़ी स्त्री को क्रोध आ गया और वह रावण पर झपट पड़ी. वह  रावण का पैर पकड़ पकड़ कर आकाश में उड़ गयी . वह उसे बहुत दूर ले गयी और पकड़-पकड़ कर बहुत झटके दिए. इसके बाद उसे समुद्र में फैंक दिया. इस तरह हमारे यह महाबली एक बूढ़ी स्त्री के हाथों हार गये.

बलि के सामने लज्जित

अचेत होकर रावण पाताल चला गया. वहाँ उसने गर्जन किया. रावण सम्पूर्ण नागों के नगर जीतकर फिर राजा बलि के लोक में गया. बलि ने उसका बहुत आदर
किया. रावण ने कहा कि चलो, अपने दुश्मन को पकड़ लो और पृथ्वी पर राज करो. बलि ने कहा जीतने की बात छोडो, पहले हमारे पितामह के गहने और यह आभूषण तो उठा कर उन्हें पहन लो. तुम्हारे सब दुःख दूर हो जायेंगे.

रावण इस आभूषणों को उठा तक नहीं सका. तब बलि ने कहा कि इसी पुरुषार्थ से जय की इच्छा करते हो. जो योद्धा इन आभूषणों को पहनते थे, वे भी क्षणभर
में मारे गये. इससे अच्छा है कि तुम अपनी जान बचाकर घर चले जाओ. लज्जित होकर रावण वहाँ से चल दिया.  रास्ते में वामन भगवान् ने उसे आते देखा तो, उन्हें उसके द्वारा नारदजी को कहे गये अभिमानपूर्ण वचन याद आ गये.

बालकों ने पीटा

उसी स्थान के पास ही नगर के बालक खेल रहे थे. भगवान् ने उन्हें अपना बल दिया. उन बालकों ने रावण को दौड़कर पकड़ा और नगर में ले आये, जिसका कौतुक नगर के सभी नर-नारी देखने आये. लोग सोचने लगे कि दस सिर और बीस भुजा वाला यह कौन-सा जीव है और कहाँ से आया है. बच्चे उसे बाँध कर बहुत खिझाते रहे. शर्म के मारे रावण ने अपना नाम नहीं बताया और मार खाता रहा. वामनजी को देखकर उसे बहुत शर्म आयी. तब कृपासागर भगवान ने उसे छुडवा लिया. इसके बाद भी उसने “एक हाथ कटी, सवा हाथ बढ़ी” वाली कहावत  को चरितार्थ किया. उसे ज़रा भी लाज नहीं आयी.

वानर राज बाली से शिकस्त

रावण जहाँ भी देवता, ब्राह्मणों को देखता, उन्हें बहुत सताता था. उसके आतंक से सभी आतंकित थे. इसी तरह फिरते-फिरते वह पम्पा सरोवर के किनारे आया. वहाँ वानर राज बाली ध्यान कर रहा था. रावण वहाँ जाकर उसके सामने बाहें ठोंक कर गर्जन करने लगा. उससे रावण ने कहा- “अरे बकध्यानी! मूर्ख कपि!  सुन मैं तेरा नाम सुनकर आया हूँ. कायरता छोड़कर मुझसे युद्ध कर. बाली ने हँसकर कहा-“ मैं भगवान् सूर्य की वंदना कर लूँ, फिर मुझे जीतकर जाना.

बाली ने रावण को बहुत समझाया, लेकिन युद्ध के उन्माद में उसने बाली की एक न सुनी. तब बाली ने गुस्स्से में आकर उसे अपनी कांख में दावा लिया. ऐसी ही स्थिति में उसने सूर्य को अंजली दी और आचमन-संध्या की. इतनी देर रावण उसकी कांख में दबा रहा. कांख में दबाए हुए ही बाली घर आ गया. बाली दिन में उसे कांख में दबा लेता था और रात को बांधकर रखता था. इस प्रकार छह महीने बीत गये. रावण को बहुत तकलीफ हुयी.

एक दिन जब बाली सूर्य को अंजलि दे रहा था तब रावण उसकी कांख से निकलकर भागने लगा. बाली ने उसे पकड़कर फिर बाँध लिया और अपने बेटे अंगद को खेलने के लिए ले आया. इस अजीबो-गरीब दिखने वाले जीव को अंगद ने जमकर लातें मारीं और किलकारी मारकर खूब हँसा.

बहरहाल, बाली की पत्नी तारा ने रावण को पहचान कर उसे छोड़ दिया. उसने रावण से कहा कि तुम तत्काल भाग जाओ, नहीं तो कपिराज तुम्हें फिर पकड़ लेंगे.

सहस्रबाहु से पराजय

रावण बलशाली और पराक्रमी होने के साथ ही जिद्दी भी था और “हम नहीं सुधरेंगे” की कहावत को चरितार्थ करता था. इस बार उसने सहस्रबाहु से पंगा ले लिया. सहस्रबाहु ने रेवा नदी के किनारे रास रचाया हुआ था. सभी स्त्रियाँ जलक्रीडा कर रहीं थीं. रावण उसके ऐश्वर्य को देखकर ईर्ष्या से भर उठा. वह जलक्रीड़ा वाले स्थान पर पहुँच गया.

रावण ने अपनी बीस भुजाओं के बल से जल प्रवाह को रोक लिया. इस पर सहस्रबाहु को बहुत क्रोध आया. उसने ललकार कर रावण को पकड़ लिया. सहस्रबाहु  ने रावण को कुछ दिन अपने घुड़साल में बाँध कर रखा. सब नर-नारी आकर देखते और उसे लात मार कर ताली बजाते हुए हँसते थे. सहस्रबाहु के बार-बार पूछने पर भी उसने संकोच के कारण अपना नाम नहीं बताया.  पुलस्त्य मुनि ने सहस्रबाहु से अनुरोध कर रावण को छुड़वाया.

उसकी उन सभी शिकस्तों और लज्जित होने के प्रसंगों को हनुमानजी के मुख से तुलसीदासजी ने बहुत रोचक रूप से कहालवाया है. इन्हें सुनकर रावण के खिसियाने का ‘सुन्दरकाण्ड’में बहुत सुंदर वर्णन है.

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