भगवान श्रीराम के हमेशा प्रासंगिक: पढ़िए उनके गुणों पर यह श्रंखला -दिनेश मालवीय

हारकर जीतने का आदर्श रखा भगवान राम ने

बड़प्पन की  अनूठी मिसाल

-दिनेश मालवीय

भगवान राम को युगों-युगों से भारत का मानव जीवन का सबसे बड़ा आदर्श माना गया है. उन्हें भगवान् विष्णु का मानव अवतार मानकर उनकी पुरुषोत्तम यानी मनुष्यों में सबसे श्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा की जाती है. उन्होंने अपने आचरण से जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों के साथ संबंधों में भी सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किये. यही कारण है कि उन्हें सभी लोग प्रेम करने के साथ-साथ उनका बहुत सम्मान भी करते थे. किसी महान व्यक्ति की महानता का सबसे बड़ा पैमाना यह है कि वह अपने से छोटों के साथ कैसा व्यवहार करता है. जो सचमुच बड़ा होता है, वह कभी अपने से छोटों को उनके छोटेपन का एहसास नहीं देता.

कभी उनका अपमान नहीं करता. एक छोटा-सा उदाहरण लें. राम के वनवास जाने के बाद भारत चित्रकूट में उनसे मिलने कर उन्हें वापस आने का आग्रह करने जाते हैं. तब उस सभा में वह ऋषि वशिष्ट के सामने राम के बड़प्पन की बात करते हुए कहते हैं कि “हारहिं खेल जितावहिं मोहिं”. यानी राम बचपन में भाइयों के साथ खेल खेलते हुए उनसे जीतते हुए भी जानबूझकर हार जाते थे. इसे उनके छोटे भाई भी समझ जाते थे. इसी बड़प्पन के कारण सभी भाई उनका इतना सम्मान करते थे कि उन्हें भगवान की तरह मानते थे.

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भरत कहते हैं कि भैया राम ने उनके यानी भरत के मन के भाव के विरुद्ध कभी कुछ नहीं किया. कभी उनका दिल नहीं तोड़ा. प्रेम की रीति भी यही होती है. आप जिससे प्रेम करते हैं, उसके हाथों हारकर जीतने का एहसास करते हैं.

इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण के विद्यार्थी जीवन की भी एक घटना सहज याद आ जाती है. उज्जैन में महर्षि संदीपनी के आश्रम में पढ़ाई करते हुए, बहुत गरीब घर का सहपाठी सुदामा उनका सबसे घनिष्ट मित्र बन जाता है. आश्रम में ऐसा नियम था कि जो विद्यार्थी पाठ याद नहीं कर पाते थे, उन्हें वन में लकड़ी लाने जाना पड़ता था. सुदामा पढ़ने में होशियार नहीं थे. वह अक्सर दिन में पढ़ा हुआ पाठ भूल जात्ते थे. इसके कारण उसे लकड़ी लेने अकेले जंगल जाना होता था.

लक्ष्मण जीवन भर अपने बड़े भाई राम के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे. हर दुःख-सुख में उन्होंने उनका साथ दिया. लेकिन जब कभी लक्ष्मण ने अपने उग्र स्वभाव के कारण कोई धृष्टता की तो, उन्होंने उन्हें इस तरह से रोका, कि वह अपमानित महसूस नहीं करें. जब लक्ष्मण ने अपने पिता दशरथ और माता कैकई के बारे में आपत्तिजनक बातें कहीं, तब राम ने उन्हें बहुत अच्छी तरह से ऐसा करने से रोका. जनक की सभा में जब लक्ष्मण ने भगवान परशुराम के
साथ धृष्टता की, तब भी प्रेमियों की यही रीति रही है. कवियों और शायरों ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा है.  वे अपने प्रेमी से हारकर आनंद पाते हैं. इसीलिए घर के बड़े लोग छोटे बच्चों के साथ खेलते हुए उनसे हारने का नाटक करते हैं. इस नकली हार में बच्चे को प्रसन्नता होती है और बड़ों को भी.
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भगवान राम की एक और सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने प्रति अपराध करने वालों को अपराध बोध से ग्रसित नहीं होने देते थे. माता कैकेई के कारण उन्हें वनवास जाना पड़ा था. लेकिन उनके मन में कैकेई के प्रति कभी दुराभाव नहीं रहा. चित्रकूट में भरतजी के साथ तीनों माताएँ राम को मनाने आयी थीं. भगवान सबसे पहले माता कैकेयी से मिले. वह उन्होंने कैकेयी के  अपराध बोध को समझ लिया. उनके मन से अपराध बोध दूर करने के लिए उन्होने यही कहा, कि माता जो कुछ भी हुआ, वह काल और कर्म की गति के कारण हुआ. विधाता का विधान यही था. आप मन में कोई ग्लानि या अपराध की भावना नहीं रखें.

चौदह वर्ष के वनवास से लौटने पर भी राम सबसे पहले माता कैकेयी से ही मिले. उन्हें पूरे सम्मान के साथ प्रणाम किया. अपनी सगी माता कौशल्या से वह बाद में मिले. इस प्रकार वह अपने प्रति अपराध करने वाले के लिए भी बहुत उदार रहे और उन्हें कभी अपराध बोध से ग्रसित नहीं होने दिया.

बाली वध के बाद जब सुग्रीव भोगविलास में डूबकर सीताजी के खोज में सहायता के अपने वचन को भूल जाता है, तो भगवान क्रोधित अवश्य होते हैं. लेकिन जब सुग्रीव उनके पास आकर अपनी गलती मानता है, तो वह उसे तुरंत क्षमा कर देते हैं. वह कहते हैं कि सुग्रीव तुम मुझे भाई भरत की तरह प्रिय हो.

वनवास के दौरान बहुत गरीब वनवासी उनसे मिलने आते थे. उन्होंने कभी किसीको उसके छोटेपन का एहसास नहीं होने दिया. अपना बड़ापन कभी नहीं जताया. केवट द्वारा पांव धोने की जिद को उन्होंने सहज भाव से पूरा किया. निषादराज से राजकुमार की तरह नहीं, बल्कि एक मित्र के समान ही व्यवहार किया. वानर, रीछ आदि उनके इसी गुण के कारण उनके इतने मुरीद हो गये, कि अपनी जान पर खेलकर रावण जैसे महाबली से भिड़ने पहुँच गये. भगवान राम ने वानर सेना के छोटे से छोटे सदस्य को भी पूरा सम्मान दिया. यही उनकी लीडरशिप क्वालिटी थी.

किसी भी युग में किसी भी दौर में हर व्यक्ति की एक बड़ी कामना यह रहती है, कि उसे मान-सम्मान मिले. लेकिन कहावत है कि respect is commanded, not dimaanded. यानी सम्मान माँगा नहीं अर्जित किया जाता है. भगवान राम ने यही आदर्श प्रस्तुत किया. उन्होंने कभी किसीसे सम्मान की अपेक्षा नहीं की और न कोई काम सम्मान पाने के मकसद से किया. यह उनका स्वभाव था. किसीके भी साथ उनका व्यवहार बनावटी नहीं होता था. वह स्वभाव से ही ऐसे थे.

दोस्तो! भगवान राम के यदि इस एक गुण को ही हम अपने जीवन में उतार लें तो हमें इसके चमत्कारी परिणाम मिल सकते हैं. अपने नौकर, मातहत कर्मचारी, ड्राइवर, प्यून, क्लर्क, घर में काम करने वाले नौकर-नौकरानियों के या किसी भी अपने से छोटे व्यक्ति को आप यदि due respect दें, तो वे पूरे दिल से आपके प्रति समर्पित होंगे. आइये, भगवान राम के इसी एक गुण को हम अपने जीवन में उतारकर देखें.

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Priyam Mishra



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