द्वार-द्वार पर राम के दूत

द्वार-द्वार पर राम के दूत
विजय मनोहर तिवारी
कुछ बातें कल्पना के परे होती हैं। लेकिन होती हैं। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए समर्पण निधि जुटाने के लिए टोलियां गांवों-गलियों में निकली हुई हैं। शब्दों का अपना महत्व है। इस धन संग्रह को उन्होंने चंदा या दान नहीं कहा है। आए दिन कथा, प्रवचनों, शोभायात्राओं, कवि सम्मेलनों और मुशायरों के लिए होने वाली चंदे बाजी ने इस शब्द का भुर्ता बना दिया है। और दान की महिमा के क्या कहने? 

एक पत्थर पर दस नाम दर्ज हैं और हजारों मंदिर की दीवारों पर चिपके ऐसे लाखों पत्थर हैं। न दान है, न दान का मान है। इसलिए समर्पण निधि कहा। जैसे स्वाध्याय परिवार के प्रणेता पांडुरंग शास्त्री आठवले ने श्रमदान को श्रमभक्ति कहा। श्रम के माध्यम से ईश्वर की भक्ति! राम हमारे दान के मोहताज नहीं हो सकते। उन्हें क्या कोई चंदा देगा?

दो सज्जन मेरे यहां भी आए। बीसेक दिन हो गए हैं। किस्से गजब के हैं। एक कवर्ड कैम्पस में गंज बासौदा का एक परिवार किराए से रहने कुछ ही महीनों पहले आया। वे यह तलाश ही रहे थे कि कोई राम मंदिर की टोली इधर आई कि नहीं। एक दिन पांच लोग वहां पहुंचे। भीतर आहट हुई कि कोई आए हैं। पहले 1500 रुपए के कूपन ले लिए। फिर एक महिला बाहर आई। टोली वालों को चाय पर आमंत्रित कर लिया और खुश होकर कहा कि हमारा कुछ संकल्प भी था। फिर तीन नामों से 11, 5-5 हजार की रसीदें और ले लीं। कहा-हम कब से आपके इंतजार में थे?

एक मल्टी स्टोरी में एक दूसरी टोली ने दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला तो एक साहब ने मुस्कुराकर स्वागत किया। भीतर बैठाया। अपना परिचय देकर दोहरी मुस्कान बिखेरी। वे कोई मियां साहब निकले। उज्जैन के रहने वाले थे। टोली वालों को कुछ नहीं सूझा तो यहां-वहां की बातें शुरू कर दीं। लेकिन वे साहब अंदर गए। पांच सौ रुपए लेकर आए और बोले-‘भाईजान, आप यहां आए हैं। हम आपको खाली नहीं जाने देंगे। अयोध्या केवल आपकी नहीं है।’ लगे हाथों एक शुभ समाचार यह भी दे दिया कि जनाब, उज्जैन में हमारे समाज के लोगों ने चांदी की ईंट अयोध्या भेजी है!


एक कॉलोनी के प्रवेश द्वार पर संकल्प निधि के बारे में एक परचा चिपका हुआ है। किसी ने ध्यान दिया कि उस पर कोई संपर्क सूत्र नहीं है। न कोई फोन नंबर है, जिस पर कोई संपर्क करे। एक बुजुर्ग सज्जन ने सुरक्षा प्रहरियों से पूछताछ की। उसने बताया कि राेज शाम को कुछ लोग स्वयं संपर्क के लिए घर-घर जाते हैं। दो-तीन बार आ चुके हैं। आप तक भी आ ही जाएंगे।

एक टोली उसी शाम को उनके घर के बाहर नजर आई। एक युवक बाहर निकला और पांच सौ रुपए के कूपन ले लिए। घर की छत पर बुजुर्ग दंपत्ति ने यह देखा। वे तेज कदमों से सीढ़ियां उतरकर आए। तुरंत टोली वालों को भीतर बुलाया गया। वे बुजुर्ग एक पोटली लेकर आए। उसमें कुछ मुड़े-तुड़े नोट और सिक्के थे। पोटली उन्हें थमाकर बोले-हमने यही जमा किया है। गिनने में दिक्कत होगी? टोली वालों ने उस जमापूंजी को व्यवस्थित किया। पूरे 21 सौ रुपए निकले। दोनों बुजुर्ग ऐसे प्रसन्न थे, जैसे भव्य राम मंदिर के भीतर गर्भगृह में जारी पहली पूजा को निहार रहे हों। वे बोले कि हम गेट पर कई बार गए। आपने परचे में कोई नंबर तक नहीं लिखा था। लेकिन हमें विश्वास था कि आप आएंगे! राम ने आपको भेज दिया!

एक शानदार डुप्लैक्स के बाहर भारी-भरकम लोहे के आलीशान दरवाजे से एक टोली के एक सज्जन बड़ी आशा से भीतर दाखिल हुए। एक लंबी चमचमाती के कार के पीछे दूसरी लंबी चमचमाती कार खड़ी थी। रौनकदार लॉन में हरी ताजा घास कालीन की तरह बिछी थी। यह एक मालदार आदमी का आशियाना है, जिसके ऊंचे पैकेज के बच्चे विदेश में हैं। घंटी बजी तो एक साहब गहरे रंग का गाउन पहने गेट खोल रहे थे। बताया गया कि राम मंदिर के लिए संकल्प निधि की आशा से आए हैं। 

उन साहब ने यहां-वहां टटोलकर दस रुपए का नोट निकाला और बेफिक्री से उन्हें दे दिया। टोली के सज्जन ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन वे ऐसे भाव में नजर आए जैसे पैरों तले जमीन खिसकने जैसा कुछ हुआ हो। बहुत आदरपूर्वक वे बोले कि सड़क के कॉर्नर पर एक पंचर-टायर वाले ने 1100 रुपए दिए और सारे कूपन ले लिए। वह उसका संकल्प था। इसलिए अभी दस रुपए के कूपन नहीं हैं। कल आकर आपका अंश लेंगे। अपनी रईसी रिहाइश में वह आदमी अपनी हथेली पर दस रुपए का नोट लिए भौंचक खड़ा सड़क के उस कॉर्नर को देख रहा था, जहां एक पंचर-टायर वाला आदमी मजे से टायर में हवा भर रहा था!

किसी कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव एक साहब की मुश्किल अजीब निकली। उनका घर भोपाल में है। कंपनी के काम से आए दिन दूसरे शहरों में जाते हैं। उनसे हर शहर में टोलियां टकरा रही हैं। एक टोली उनके घर आई तो मजे से किस्से सुनाने लगे। कल इंदौर में था। ऑफिस में एक ऐसी ही टोली आई। पिछले हफ्ते जबलपुर में और उसके बाद ग्वालियर में भी बंधुवर मिल गए। इसलिए संकल्प निधि धारावाहिक में दे रहा हूं। श्रीमानजी, यह 11 सौ आप रखिए और हां, यह आखिरी एपिसोड नहीं है, क्योंकि कल मुझे उज्जैन भी जाना है! आप भी पुन: पधारें!

एक बहुमंजिला होटल के बगल में एक संकरी गली है, जिसके दोनों तरफ कुछ मजदूरों के कच्चे मकान बने हैं। एक शाम एक राम टोली इस गली में दाखिल हो गई। एक बूढ़ी काकी से राम-राम की और अपना परिचय दिया। पूरी गली में 23 मकान हैं। घर-घर में ऐसा हल्ला हो गया जैसे किसी के यहां कोई रिश्ते की बात पक्की हो रही हो। हर घर में जितने लोग थे, सबके हिस्से के दस-दस रुपए किसी ब्रेकिंग न्यूज की तरह आते रहे। ये दस रुपए रामदयाल के और ये राम प्रसाद के, ये रामकली के और ये रामबाई के!

देश भर में राम मंदिर संकल्प निधि की यह यात्रा निकली हुई है। लाखों टोलियों में करोड़ों कार्यकर्ता अपने दुकान-दफ्तर, खेत-खलिहानों से निपटकर कुछ घंटे इस कार्य में दे रहे हैं। चुपचाप किसी बस्ती, किसी कॉलोनी, किसी गली या किसी इमारत में जाना। अपना परिचय देना और आगे बढ़ना। उनके अनुभव दर्ज करने जैसे हैं। यह तीस साल पहले के अनुभवों से अलग हैं, जब लालकृष्ण आडवाणी की अयोध्या रथयात्रा के समय दुनिया भर के हिंदुओं को अांदोलित कर दिया था। अयोध्या के ध्वस्त वैभव को वापस लौटाने के लिए वह चार सौ साल से कसमसाते संसार के सबसे सहिष्णु हिंदू समाज की अंतिम लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति थी, जिसे 40 साल के आजाद भारत की सरकारों ने भी बुरी तरह नाउम्मीद कर दिया था।

पैंसठ साल की उम्र के एक कार्यकर्ता दूसरी बार जुटे हैं। उन्हें राम शिलाओं के समय की याद है, जब गांव-गांव से ईंटें अयोध्या ले जाई गई थीं। किसी गांव की मिट्‌टी, किसी गांव की ईंट, किसी नदी का जल। ये सब एक तरह के प्रतीक हैं। इन प्रतीकों में हमारी भावनाएं गुंथी होती हैं। हर किसी का योग एक बड़े काम में झलके, इसके प्रतीक। वे सज्जन आज हर दिन एक राम टोली का हिस्सा हैं। गहरे संतोष की रेखाएं उनके चेहरे पर हर शाम साफ देखी जा सकती हैं। वे कहते हैं-‘हमने सपनों में नहीं सोचा था कि हम मंदिर निर्माण अपने जीवनकाल में देख लेंगे। राम ने जीते-जी दूसरी बार अपने काम में लगा दिया।’ वे अपने 32 साल के बेटे के साथ इस अभियान में हैं और उसे राम रथयात्रा के ऊर्जा से भरे दिनों के किस्से सुनाते हैं।

इन टोलियों में ऐसी अनगिनत कहानियां बिखरी हुई हैं। जबलपुर के एक डॉक्टर भोपाल में हैं और राम टोली को अपने हिस्से का अंश समर्पित करते हुए वे यह याद करके भावुक हुए कि 1967 में जब वे छठवीं कक्षा में पढ़ते थे तब कन्याकुमारी में विवेकानंद स्मारक के लिए स्कूली बच्चों ने सवा रुपए संकलित करके दिए थे। एकनाथ रानाडे नाम के एक महान कार्यकर्ता ने भारत की आखिरी चट्‌टान से जुड़ी एक महान स्मृति को एक स्मारक की शक्ल देने में अपना जीवन लगा दिया था। उस चट्‌टान पर स्वामी विवेकानंद ने तीन दिन तक ध्यान किया था। वे वहीं से पश्चिम की दुनिया को भारत का एक नया परिचय देने के लिए संकल्पित होकर निकले थे। उनकी घोषणा थी-‘ऋषियों के धर्म को खोल से बाहर निकलने का समय आ गया है!’
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