सपनों का धार्मिक पहलू,स्वप्न विद्या के भारतीय सिद्धान्त

                                                                                                    -कामेश्वर उपाध्याय

विश्व में जहाँ कहीं मनोविज्ञान की पढ़ाई होती है वहाँ स्वप्नका पाश्चात्य सिद्धान्तअवश्य पढ़ायाजाता है। १९९३ में काशी हिंदूविश्वविद्यालय की प्रोफेसर शशिकला जी ने मुझ से कहा- डॉ उपाध्याय क्या स्वप्नपर भारतीय आचार्यों ने कुछ विशेष काम किया है? हम लोग केवल फ्रायड और जूंग जैसों को ही पढ़ाते रहते हैं। सारे स्वप्न केवल कामज ही कैसे हो सकते हैं। मैं ने तभी निर्णय लिया कि इस विषय पर काम अवश्य करूंगा। दो वर्ष के श्रम से “स्वप्नविद्या” पूरी हुई।
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स्वप्न के भारतीय सिद्धान्त को ऋषियों ने इतनी सूक्ष्मता से प्रतिपादित किया है कि यह स्वप्नभी ऋषिभय से भीत हो उठता है। अतः काम हमने वेदों में स्वप्न से आरम्भ किया।  इसी क्रम में मुझे स्वतःएक स्वतंत्र ग्रंथ “स्वप्नकमलाकर:” हाथ लग गया। यह कार्य थोड़ा जटिल था क्योंकि इसका विषय आगम से बहुत जुड़ा हुआ था।  स्वप्न और मनुष्य का सम्बन्ध सृष्टि के आरम्भ से है। ऋग्वेद में दुःस्वप्न नाश के लिए प्रथम मण्डल के १२० वें सूक्त के १२ वें मन्त्र तथा द्वितीय मण्डल के २८ वें सूक्त के १० वें मन्त्र मेंविधि दी हुई है।

स्वप्न के प्रकार–भारतीय आचार्यों ने स्वप्न के चार प्रकार माने हैं–दैविक स्वप्न, शुभ स्वप्न, अशुभ स्वप्न,तथा मिश्र स्वप्न। इनमें दैविक स्वप्न उच्च कोटि का होता है। इसे भविष्य निर्देशक स्वप्न मानकर काम किया जाता है,जैसे त्रिजटा ने सीता माता को अपना स्वप्न बतलाया और कहा यह अवश्य सत्य होगा, संदेह नहीं। इसी स्वप्न को आधार मान कर हनुमानजी
ने लंका जला डाली।

स्वप्नउत्पत्तिके नौ कारण-१-श्रुत २-अनुभूत ३-दृष्ट ४ चिंता ५-प्रकृति ६-विकृति ७-देव ८-पुण्य ९-पाप। इनमें दैवीय स्वप्न वात, पित्त,कफ दोष से रहित पवित्र आचरण वाले व्यक्ति को ही आते हैं। साधना की सिद्धि हेतु साधक इन स्वप्नों का प्रयोग करता है। प्रकृति और विकृति में कामज स्वप्न आते हैं। देव, पुण्य और पाप भाव वाले स्वप्न अवश्य फलीभूत होते हैं। मैथुन, हास्य, शोक, भय, मूत्रमल और चोरी के भाव से उत्पन्न स्वप्न प्रायः व्यर्थ होते हैं–

रते:हासाच्च शोकाच्च भयान् मूत्रपुरीषयोः।
प्रनष्टवस्तु चिन्तातो जातः स्वप्न:वृथा भवेत्। ।

जब मन सहित एकादश इन्द्रियाँ सो जाती हैं तब स्वप्न आता है। यह जरूरी नहीं कि जो चीज हम जागते में देख चुके हैं वही स्वप्न में आये। दृश्य रहित आवाजें भी स्वप्न कोटि में ही आती हैं।  दिन के स्वप्न-ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है कि जिस विषय की बहुत अधिक चिंता करते हुए व्यक्ति दिन में सो जाता है और उस विषय का उसे स्वप्न आजाये तो वह स्वप्न सत्य सिद्ध होता है – दिने मनसि यत् दृष्टम्। ७७/७।

प्रायशः दिन में देखे स्वप्न विफल होते हैं।

रात्रि के स्वप्न–रात्रि को चार खण्ड में बाटने से एक खण्ड तीन घण्टे का होता है। सूर्यास्त से तीन घण्टे के अंदर देखा स्वप्न एक वर्ष के अंदर फल देता है। आधीरात्रि से तीन घण्टा पूर्व तक में देखा स्वप्न छः मासके भीतर अपना फल देता है। आधी रात्रिसे लेकर तीन घण्टे बाद तक के समय में देखा हुआ स्वप्न तीन मास के भीतर अपना फल देता है। ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सूर्योदय से तीन घण्टा पूर्व से लेकर सूर्योदय काल के भीतर देखा स्वप्न तत्काल से लेकर एक माह के भीतर अपना फल दे देता है।

भारतीय स्वप्न विद्या की विशेषता–

१– दुष्ट स्वप्नों के दुष्ट फल को दूर करने के उपाय।

२–स्वप्न न आ पायें इसकी व्यवथा।

३– स्वप्न द्वारा सिद्धि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना।

४–प्रेत, दुष्ट ग्रह, मारकेशआदिसे उत्पन्न स्वप्न को हटाने के दिव्य उपाय। ये सभी चीजें पश्चिम के स्वप्न सिद्धान्त में अनुपलब्ध हैं। स्वप्न केवल आंख के ही विषय नहीं होते। ये कान और मन के भी विषय होते हैं। अतः वे धन्य हैं जो विश्व, राष्ट्र एवं मनुष्य के कल्याण के शुभ एवं सुमङ्गल स्वप्न देखते रहते हैं। जन हित, धर्म हित में जो जाग कर या सो कर भी स्वप्न देखते रहते हैं उन पुण्यशाली व्यक्तियों को निरन्तर नमन है।

सत्याचार्य के स्वप्न भेद–सत्याचार्य स्वप्न के सात भेद मानते हैं। ये ज्योतिष शास्त्र के विख्यात आचार्य हैं। आपके अनुसार स्वप्न १-दृष्ट २-श्रुत ३-अनुभूत ४-पार्थिव ५-कथित ६–भावित और दोषज होते हैं। आरम्भ के पाँच निष्फल होते हैं और भावित तथा दोषज का विचार कर इनकी शांति करानी चाहिए—

दृष्टश्रुतानुभूतं च पार्थितं कथितं तथा।
भावितं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः। ।

सत्याचार्य ने स्वप्न को राजस भाव से उत्पन्न माना है। मन का सर्वाधिक ठहराव राजसिक भाव में ही रहता है। इसी कारण भोग विलास के स्वप्न ज्यादातर लोग देखते हैं।

सफेद वस्तु का प्रभाव–स्वप्न में दृष्ट सफेद वस्तु ज्यादातर शुभ फल दायक होती हैं पर कपास,भस्म,भात और मठ्ठा अशुभ फल को व्यक्त करते हैं–

सर्वाणि शुक्लान्यति शोभनानि कार्प्पासभस्मोदनतक्रवर्ज्यम्।

काली वस्तु का प्रभाव— स्वप्न में दृष्ट काली वस्तु अशुभ फल देती है पर काली गाय, हाथी, काले देव, काला ब्राह्मण तथा काला घोड़ा हमेशा शुभ फल ही देते हैं– गो हस्ति देव द्विज वाजि वर्ज्यम्।

क्यों आते हैं दुःस्वप्न?—-

१- अपनी सम्पत्ति और गृहस्ती में असंतुष्ट को दुःस्वप्न आते हैं।

२– मानसिक पाप से दुःस्वप्न आते हैं।

३–पाप, हिंसा, निर्दयता से दुःस्वप्न आते हैं

४-खराब ग्रह की महादशा अंतर्दशा में दुःस्वप्न आते हैं।

पुण्यकारी तथा मोक्षकारी स्वप्न– सामवेद की कण्व शाखा में पुण्य और मोक्षकारी स्वप्नों का वर्णन आया है। ये बात ब्रह्मवैवर्त पुराण में कही गयी है

-केन स्वप्नेन किं पुण्यं केन मोक्षो भवेत् सुखम्।

स्वप्न में विष्णु,शिव,लक्ष्मी,पार्वती गायत्री का दिखना मोक्ष कारक होता है। स्फटिक की माला प्राप्त करने से पुण्य बढ़ता है।  दिव्य स्त्री स्वप्न में स्वामी बोले तो राज्यत्व की प्राप्ति होती है। इस प्रकार से ब्रह्मवैवर्त पुराण में आश्चर्यजनक स्वप्नों का वर्णन मिलता है जो अन्यत्र दुर्लभ है।

कक्षीवान दीर्घतमा का मन्त्र–एक मन्त्र में ऋषि कहते हैं, मैं घृणा करता हूँ प्रातःकाल के स्वप्न से और उन धनिकों से जो दान नहीं देते। ये दोनों नष्ट हो जाएं।

गृत्स्मद ऋषि का प्रख्यात दुःस्वप्न नाशक मन्त्र। इसे स्वप्न देखने के बाद स्नान कर पढ़ने से दुःस्वप्न का नाश हो जाता है–

यो मे राजन् याज्यो वा सखा वा स्वप्नेभयं भीरवे मह्यमाह।
स्तेनो वा यदि दिप्सति नो वृको वा त्वं तस्माद् वरुण पाह्यस्मान्। ।

अनेक प्रकार के अन्यमन्त्र भी वेद एवं पुराणों में उपलब्ध हैं जिनके जप पाठ से दुःस्वप्न का भय समाप्त हो जाताहै। अग्निपुराण के २२९ वें अध्याय में ३१ श्लोकों में स्वप्नफल को कहा गया है। इसमें शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल दिए गए हैं।

अग्नि पुराण के कतिपय अशुभ स्वप्न —

१ अपने को नग्न देखना, २ मुंडित देखना, ३ उबटनलगाना, ४ कीचडमेंधसना, ५अपना विवाह देखना, ६ झूला झूलना, ७ ऊंचाई से गिरना, ८ सर्प मारना, ९ लाल पुष्प से लदे बृक्ष देखना १० स्वप्न में भैंसे, सुअर, गधे, ऊँट, कुत्ते पर चढ़ना, ११ मातृ उदर में प्रवेश करना, १२ चिता पर लेटना या दूसरे को लेटे देखना, १३ किसी देवता,राजा,गुरु को क्रोधित देखना, १४ नाचना,बाजा बजाना, १५ लाल वस्त्र पहनी महिला का आलिंगन करना, १६ समलैंगिक मैथुन देखना, १७ दक्षिण दिशा की ओर जाना, १८ तेल से स्नान करना मृत्युकारक या मरण तुल्य कष्टकारी होता है।

अशुभ स्वप्न देखकर पुनः सो जाना चाहिए या नींद न आये तो तिल से विधि,हरि,हर,गणेश,सूर्य हेतु हवन करना चाहिए–तिलै:होमो हरिब्रह्मशिवार्कगणपूजनम्। ।

पुरुष सूक्त का संकल्प पूर्वक पाठ करने से अशुभ स्वप्न का नाश होता है। ध्यान रखें १२ पाठ होना चाहिए केवल एक पाठ नहीं। एक रात में अनेक स्वप्न भी दिखलाई देते हैं। इनमें अंतिम स्वप्न फलता है। अरुणोदय काल का स्वप्न १० दिन के अंदर अपना फल दे देता है–दशाहादरुणोदये। (१७श्लोक) शुभ स्वप्न देख कर जाग जाना चाहिए।

१ अपना बाल पका देखना, २ सफेद माला पहनना, ३सफेद वस्त्र पहनना, ४ ध्वज फहराना, ५ ग्रह नक्षत्र को पकड़ना, ६ युद्ध जीतना, ७ मांस खाना, ८ मदिरा या सोम रस पीना, ९ मुख से पशु का दूध पीना शुभ कारी होता है।

मत्स्यपुरणोक्त अशुभ स्वप्न–१ शरीर में घास उगना, २ मस्तक पर शीशा टूटना, अपने को मुंडित-नग्न देखना, ३ पक्षीऔर मछली खाना, ४ गोबर कीचड़ के गढ़े में गिरना, ५ चिता पर चढ़ना, ६अपने अंगों की हानि देखना, ७ मकान को ढहते
देखना, ८ मकान की रंगाई देखना, ९ भूत प्रेत बंदर भालू के साथ क्रीड़ा करना, १० अशुभ महिलाओं के साथ क्रीड़ा करना जीवन संकट उत्पन्न करता है।

अशुभ स्वप्न निराकरण–

स्तुति च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्।
गजेन्द्रमोक्ष श्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्। ।

प्रातःस्नान,विष्णु पूजन और गजेंद्र मोक्ष के पाठ से अशुभ स्वप्न का नाश होता है।

मत्स्य में शुभ स्वप्न–१ पर्वत, हाथी, बैल, राजभवन पर चढ़ना शुभ होता है, २ ग्रह नक्षत्र को पोछना, ३ ध्वजको आलिंगन में लेना, ४ शत्रु को जीतना, ५ स्वप्न में मांस, खीर खाना और रक्त देखना शुभ होता है।
(अग्नि२२९/२४,मत्स्य२४२ २५-२६)

किसी भी पशु के थन से मुख लगाकर दूध पीना अतिशुभ होता है। अपना कटा शिर देखना, राज्याभिषेक देखना, गाय, हथिनी, भैंसका प्रसव देखना राज्यप्रद होता है। जीवित राजा और मित्र को स्वप्न में देखना शुभ होता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में शुभ स्वप्न-१ मन्त्र या मूर्ति पाना, २ पुस्तक प्राप्त करना, ३ आठ वर्ष की कन्या द्वारा पढ़ाया जाना, ४ दही, अमृत, खीर खाना, ५ गोरोचन, हल्दी, धान प्राप्ति से राज्य लाभ, ६ वर्तन लिए गणिका का प्रवेश, ७ हाथी सूंढ से मस्तक पर बैठा ले, ८ गाय को पाना, ९ देवता ब्राह्मण-कन्या द्वारा फल प्राप्त करनेसे पुत्र लाभ, १० कमलपत्र पर भोजन
करने से राज्यलाभ, ११ सर्प के काटनेसे विपुल धन लाभ, १२ नदी समुद्र तैरने से राज्यलाभ, १३ फल से भरा बृक्ष देखना अति शुभकारी होता है। ।

ब्रह्मवैवर्त में अशुभ स्वप्न–१ टूटता दांत देखना – धन हानि, २ गधा, ऊँट, भैंस पर सवारी – मृत्यु सूचक, ३ लालमाला, वस्त्र पहनी स्त्री द्वारा आलिंगित होना – रोग की चपेट में आना, ४ भस्म, अंगार, भस्मवती महिला, मुंडित व्यक्ति को देखना मृत्युकारी होता है, ५ खतरनाक पशु द्वारा आक्रांत होना राजा से हानि को सूचित करता है, ६ घर की गाय वत्स के साथ भाग जाए तो दरिद्रता, ७ यमदूत म्लेच्छ द्वारा घसीटना मृत्यु की सूचना है।।

अशुभस्वप्न निवारण उपाय– मैं स्वयं करता हूँ तथा लोगों से करने को कहता हूँ- गो दूध से शिव जी को स्नान करा के कहे हमने जो स्वप्न देखा उसका अशुभ नष्टहो तथा शुभ की प्राप्ति हो। नामाष्टक का दश बार जप करनेसे अशुभ फल नष्ट हो जाता है-

अच्युतं केशवं विष्णुम् हरिम् सत्यं जनार्दनम्।
हंसं नारायणं चैव ह्येतन्नामाष्टकं शुभम्। ।

स्वप्नोत्पन्न रोग का निवारण– नीचे के मन्त्र का सौ पाठ करने से स्वप्न जनित रोग नष्ट हो जाता है—
“विष्णुम् नारायणं कृष्णम् माधवं मधुसूदनम्।
हरिम् नरहरिम् रामम् गोविन्दम् दधिवामनम्। । ”

स्वप्न सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारियाँ—
१- शवासन, सिद्धासन में सोने से स्वप्न नहीं आते।
२- विस्तर पर जूठा गिरने से दुःस्वप्न आते हैं।
३- छाती पर हाथ रख कर सोने से दुःस्वप्न आते हैं।
४- विस्तर को मन्त्र से बांधकर सोने से दुःस्वप्न नहीं आते।
५- उत्तर दिशा में सिर कर सोने से दुःस्वप्न आते हैं।
६- सूर्योपस्थान करने से स्वप्न नहीं आते।
७- शयन पूर्व मन्त्र पाठ करने से दुःस्वप्न नहीं आते।
८- स्वप्न न जीवित होता है न मृत।
९- स्वप्न यमराज का सहायक होता है-यमस्य करणः।
१०- निष्काम और निष्पाप को स्वप्न नहीं आते।
११- खंडहर,जंगल,वृक्ष के नीचे सोने से दुःस्वप्न आते हैं।
१२-अशुभ स्वप्न को नहीं बतलाया जाता।
१३- शुभ स्वप्न को गुरु,वृद्ध, शुभ व्यक्ति को बतलाते हैं।
१४- शुभ स्वप्न देखकर जाग जाना चाहिए।
१५- अशुभ स्वप्न देख कर सो जाना चाहिए।
१६- स्वप्न में दृष्ट काली वस्तुएं अशुभ होती हैं,गाय, हाथी, घोड़ा,ब्राह्मण,देवता को छोड़कर।
१७- स्वप्न में दृष्ट सफेद वस्तुएं शुभ होती हैं,भस्म,हड्डी, कपास को छोड़कर।

अति विशिष्ट स्वप्न–
१– स्वप्न में दाहिने हाथ में सफेद सर्प काटना–१० दिन के अंदर एक हजार स्वर्णमुद्रा तुल्य धन लाभ।
२–स्वप्न में बगुली, मुर्गी,क्रौंची को देखने से सुंदर भार्या की प्राप्ति।
३– स्वप्न में फेन युक्त दूध पीने से अनेक सुख की प्राप्ति होती है। इस प्रकार से स्वप्न से सम्बंधित समस्त जानकारी को स्वप्न विद्या नामक ग्रन्थ में मैंने एकत्रित कर रखा है। इसमें सात सौ सेअधिक स्वप्नों का संकलन है। इस प्रकरण को यहीं पूर्ण करते हैं।

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