ऋषि परम्परा 3-महर्षि भृगु

ऋषि परम्परा 3-महर्षि भृगु

भारत की ऋषि-परम्परा में इन महान ऋषि का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. यह ब्रह्माजी के मानसपुत्र हैं. चाक्षुष मनवंतर में इनकी गन्ना सप्तर्षियों में होती है. इन ऋषि ने अनेक महत्वपूर्ण यज्ञ करवाये. ये सावन और भादों माह में सूर्य भगवान् के रथ पर रहते हैं. लगभग सभी पुराणों में इनकी चर्चा रहती है. यह ज्योतिष शास्त्र के महान ग्रंथ “भृगु संहिता” के रचयिता हैं.



इस ऋषि के जीवन की महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख पुराणों में मिलता है. एक बार सरस्वती नदी के तट पर ऋषियों की बहुत पड़ी परिषद् बैठी थी. इसमें यह विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे बड़ा कौन है. जब कोई संतोषजनक समाधान नहीं निकला, तो इस बात का पता लगाने के लिए सर्वसम्मति से महर्षि भृगु को चुना गया. ये पहले ब्रह्मा की सभा में गये. इन्होंने अपने पिता को न तो नमस्कार किया और न उनकी स्तुति की. अपने पुत्र की इस अवहेलना को देखकर ब्रह्मा के मन में बड़ा क्रोध आया, लेकिन उन्होंने उन्हें क्षमा कर दिया. इसके बाद वे कैलाश पर्वत पर अपने बड़े भाई रुद्रदेव के पास पहुँच. अपने छोटे भाई को आते देख वह बहुत स्नेह से आगे बढ़े, लेकिन भृगु ने उनसे गले मिलने से इंकार कर दिया. कह कि तुम उन्मार्गगामी हो. उन्हें बहुत गुस्सा आया और वह त्रिशूल लेकर उन्हें मारने दौड़े. आखिर में पार्वती ने उनके क्रोध को शांत किया.

इसके बाद भृगु विष्णुजी के पास गये. भगान उस समय सो रहे थे. इन्होंने बेधड़क विष्णुजी के वक्ष:स्थल पर लात मारी. भगवान तुरंत अपननी शय्या पर से उठ गये और इनके चरणों पर अपना सिर रखकर नमस्कार किया. उन्होंने कहा-“भगवन! आइये, आइये, विराजिये. आपके आने की जानकारी न होने के कारण आपके स्वागत की व्यवस्था नहीं कर सका. क्षमा कीजिए!. कहाँ तो आपके कोमल चरण और कहाँ यह मेरी वज्र जैसी छाती! आपको बड़ा कष्ट हुआ होगा. ऐसा कह्कर्र वह उनके चरण अपने हाथों से दबाने लगे.

भगवान् ने कहा कि आज मैं कृतार्थ हो गया. अब ये आपके चरणों की धूलि हमेशा मेरे ह्रदय पर रहेगी.
कुछ समय बाद महर्षि भृगु लौटकर ऋषियों की मण्डली में आये और अपना अनुभव सुनाया. इनकी बात सुनकर ऋषियों ने एक स्वर से यह निर्णय लिया कि जो सात्विकता के प्रेमी हैं, उन्हें एकमात्र भगवान विष्णु का ही भजन करना चाहिए. 

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