श्री कृष्ण जान बूझ कर पाठ भूल जाते थे -दिनेश मालवीय

श्री कृष्ण जान बूझ कर पाठ भूल जाते थे

-दिनेश मालवीय

भारत के सांस्कृतिक इतिहास में जब सच्ची मित्रता का ज़िक्र आता है तो श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता को ही सबसे श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है. सचमुच दोनों के बीच मित्रता थी भी ऎसी ही. पत्नी के आग्रह पर सुदामा के श्रीकृष्ण के पास द्वारकापुरी जाने और उनकी कृपा से सुदामा की कायापलट की बात तो बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन उनके विषय में कुछ बातें बहुत कम लोग जानते होंगे.

आइये, सबसे पहले तो यह जानते हैं कि एकराजवंश के यशस्वी राजकुमार और एक बहुत दरिद्र ब्राह्मण-पुत्र के बीच जीवन भर चलने वाली घनिष्ट मित्रता कैसे हुयी. काँटों के बारे में हमेशा नकारात्मक बातें कही जाती हैं. उने सभी को सदा पीड़ा ही मिलती है, लेकिन इन दोनों की मित्रता का कारण एक काँटा ही था.

 हुआ यूँ कि श्रीकृष्ण जब उज्जैन में महर्षि सांदीपनी के गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने जा रहे थे, उस समय जंगल में किसी के रोने की आवाज़ आई. श्रीकृष्ण ने ख़ुद वहाँ जाकर देखा, तो पाया की एक ब्राह्मण कुमार के पैर में काँटे लगे हैं. वह किशोर कोई और नहीं, सुदामा ही थे. उन्होंने उन काँटों को निकालकर सुदामा को अपने रथ पर बैठाया और उज्जैन ले आये. सुदामा पहले से ही इस गुरुकुल में अध्ययन कर रहे थे. श्री कृष्ण गुरुकुल में सुदामा के रूम पार्टनर बने.

गुरुकुल का नियम था कि पाठ भूल जाने पर गुरुजी उस विद्यार्थी को जंगल में लकड़ी लेने भेजते थे. सुदामा बहुत शुद्ध हृदय के बालक होते हुए भी पढ़ने में बहुत होशियार नहीं थे. वह अक्सर पाठ भूल जाते थे और उन्हें लकड़ी लेने जंगल जाना पड़ता था. श्रीकृष्ण सुदामा के सरल स्वाभाव से इतने प्रभावित थे कि उनकी उनसे बहुत प्रगाढ़ मित्रता हो गयी थी, जैसी कि आधुनिक समय में होस्टल में रहने वाले रूम पार्टनर्स के बीच हो जातीहै.

लिहाजा, सुदामा का साथ देने के लिए श्रीकृष्ण भी जानबूझकर पाठ भूल जाने का बहाना कर देते थे, ताकि सुदामा के साथ जंगल में जाकर उनकी मदद कर सकें.

कथा आती है कि एक बार की बात है, गुरु माता ने जंगल में खाने के लिए दोने के लिए कुछ चने सुदामा के पास रख दिए. सुदामा ने अवसर पाकर श्रीकृष्ण के पूछे बिना अकेले ही सभी चने खा लिए. दूसरे का भाग खाने वाले को दरिद्रत का दुःख भोगना ही पड़ता है.

शिक्षा पूरी होने पर श्रीकृष्ण और सुदामा अपने-अपने घर चले गये. श्रीकृष्ण द्वारकाधीश बने जबकि सुदामा घोर दरिद्रता का जीवन जीते रहे. लेकिन निर्धन होने पर भी उन्होंने भक्ति का मार्ग नहीं छोड़. एक बार पत्नी सुशीला ने कहा कि वह द्वारका के राजा अपने मित्र कृष्ण से मदद माँगने जाएँ. वह इसके लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा समझा जाएगा कि गुरुकुल में सुदामा ने कृष्ण के राजवंशी होने के कारण मित्र की थी. वहबहुत स्वाभिमानी भी थे.

फिर भी पत्नी के बहुत आग्रह पर सुदामा द्वारका गये. श्रीकृष्ण ने उनके चरण धोकर उनके द्वारा लाये चावल को प्रेम से खाया और उनका खूब आदर-सत्कार किया.  श्रीकृष्ण ने जब सुदामा को छाती से लगाया तो उन्हें लगा कि हड्डियों के ढाँचे सुदामा को उनके छाती से लगाने पर तकलीफ न हो. इधर सुदामा को यह संकोच रहा कि उनके कमजोर शरीर की हड्डियों से श्रीकृष्ण के कोमल शरीर को तकलीफ न हो जाए.

बहरहाल, सुदामा ने श्रीकृष्ण से कुछ नहीं माँगा. सुदामा जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये. उन्हें इस बात का कोई मलाल भी नहीं था कि श्रीकृष्ण ने उन्हें कुछ नहीं दिया. लेकिन जब घर लौटे तो लीला प्रिय श्रीकृष्ण की कृपा से उनके घर का कायाकल्प हो चुकाथा. वह तो अपने घर को पहचान तक नहीं पाए. बल्कि उसका वैभव देख कर डर गये. इस विषय पर परम्परागत रूप से एक भजन गाया जाता है कि-" सुदामा मंदिर देख डरे. यहाँ तो रही मेरी ठाकुर सेवा कंचन महल खरे". इसे सुनकर भक्तों की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगते हैं.

धन वैभव पाकर सुदामा की पत्नी सुशीला तो खुशी से फूली नहीं समा रही थी और उसे अपनी समृद्धि पर बहुत घमंड भी हो गया. सुदामा के लाख समझाने पर भी उसमें कोई बदलाव नहीं आया.

बहुत कम लोग जानते होंगे कि इतनी सम्पत्ति और धन-वैभव पाने के बाद भी सुदामा एक दरिद्र भक्त की तरह ही ईश्वर भक्ति में लीन रहे. वह धन से उत्पन्न होने वाले विकारों से निर्लिप्त रह कर भगवत भजन में तल्लीन रहते थे और इसी कारण उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया.

गुजरत के पोरबंदर में सुदामा का मंदिर स्थित है, जहाँ जाकर बहुत शान्ति और भगवत भक्ति की प्रेरणा मिलती है. वहाँ सीमेंट की ऎसी संरचना बनायी गयी है, जो चौरासी लाख योनियों की प्रतीक है. ऐसा माना जाता है कि इस यंत्र के चक्रों से गुजरने वाले भक्तो को चौरासी लाख योनियों से मुक्ति मिलती है.

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