श्रीकृष्ण ने ऐसे करवाया बड़े भाई बलराम का गर्व हरण -दिनेश मालवीय

श्रीकृष्ण ने ऐसे करवाया बड़े भाई बलराम का गर्व हरण

-दिनेश मालवीय

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि अहंकार और गर्व ही भगवान का भोजन है. भगवान जिसे प्रेम करते हैं, उसके मन में गर्व का अंकुर फूटते ही उसे नष्ट कर देते हैं. एक बार उन्हें अपने बड़े भाई महाबलशाली बलरामजी का गर्व ही तोड़ना  पड़ा. इस कार्य में भी उन्होंने हर बार की तरह हनुमानजी की ही सहायता ली.

किस्सा यूँ हुआ कि द्विविद नाम के एक महाबलशाली वानर को बलरामजी ने मार डाला. इससे गर्वित होकर वह अपने इस पराक्रम की चर्चा जहाँ-तहाँ करने लगे. श्रीकृष्ण के सामने भी उन्होंने इसका खूब बखान किया. कृष्ण तो ठहरे लीलापुरुष. उन्होंने कहा कि दाऊ भैया आपको कौन पराजित कर सकता है? आपके तो एक घूंसे से ही पर्वत चकनाचूर हो सकते हैं. उस वानर की आपके सामने क्या विसात? बलराम और फूल गये.

लेकिन श्रीकृष्ण के मन में तो कुछ और ही चल रहा था. उन्हें बड़े भाई का दर्प दलन करना आवश्यक लगा. इसके लिए उन्होंने हनुमानजी को याद किया.

अगले ही दिन नगर में एक विशाल बंदर राज उद्यान में भयानक तबाही मचाने लगा. पूरे नगर में हाहाकार मच गया.उसने सभी सुरक्षाकर्मियों को मार भगाया. पेड़ों से फल खाते हुए उसने डालियों को तोड़ डाला. विख्यात वीर उससे मुकाबला करने लगे, लेकिन उनकी एक न चली. यह बात श्रीकृष्ण के ध्यान में लायी गयी. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि बंदरो को काबू करने में तो दाऊ भैया माहिर हैं. वह सब ठीक कर देंगे. बलराम फूल कर कुप्पा हो गये और यह कहते हुए उठ कर चले कि उस वानर की मौत ही उसे यहाँ लायी है. उन्होंने उद्यान में पहुँच कर उस विशाल वानर को ललकारा. वानर ने मन ही मन बलराम को प्रणाम किया, लेकिन उनकी तरफ से लापरवाह दिखने के लिए इधर-उधर टहलने लगा. बलराम ने अपना मूसल उस पर चला दिया. वानर ने उसे बहुत लापरवाही के साथ बाएं हाथ से पकड़ कर एक तरफ फैंक दिया. यह देखकर सब चकित रह गये.

इसके बाद बलराम ने अपनी भारी गदा तेजी से फैंककर मारी. गदा आती देख वानर उछला और ऊपर ही उसे पकड़कर उसकी गति धीमी कर दी. फिर उसे मूसल के पास फैंक दिया. फिर बलराम ने अपना धनुष उठाकर वाणों की बरसात कर दी, लेकिन वानर फुर्ती से पैंतरे बदलकर उन्हें निष्फल करता गया. उसने उछल कर बलराम का धनुष पकड़ लिया. फिर बलराम ने वानर पर घूसें से प्रहार किया, लेकिन वानर को ऐसा लगा जैसे किसी ने हलके से उन्हें स्पर्श किया हो. लेकिन बलराम का हाथ झनझना गया.

 हताश होकर बलराम ने अपने हल को याद किया. जब बलराम ने अपना हल मूसल उठाया, तो हनुमानजी ने श्रीकृष्ण को याद किया. बलरामजी तो जगत में प्रलय कर देंगे. अब आप अपनी लीला समेटिये. श्रीकृष्ण अपनी अंतर्दृष्टि से सबकुछ देख रहे थे. वह उद्यान में प्रकट हो गये. फिर हँसते हुए बलराम से बोले कि दाऊ भैया! यह आप क्या कर रहे हैं! आपके सामने महाबली हनुमान हैं. श्रीकृष्ण ने बलराम को रामावतार के जन्म की याद दिलाई, तब बलराम ने हनुमानजी का बहुत आदर किया. फिर हनुमानजी ने दोनों भाइयों से श्रीराम और लक्ष्मण के रूप में दर्शन देने का आग्रह किया. उन्होंने इस रूप में हनुमानजी को दर्शन दिये.

इस तरह बलराम के दर्प का हरण हुआ.
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