दिल्ली के इतिहास का आइना है ‘पुराना किला’

दिल्ली के इतिहास का आइना है ‘पुराना किला’

    दिल्ली का इतिहास जानने के लिए पुराना किले के उत्खनन में मिले अवशेष महत्त्वपूर्ण रहे हैं। इतिहास के मुताबिक पहले मुगल बादशाह बाबर का बेटा हुमायूं 1530 में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा और तीन साल बाद उसने एक शहर ‘दीनपनाह’ की नींव रखी। छह साल बाद शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हराकर दिल्ली की सल्तनत पर कब्जा कर लिया और दीनपनाह को नष्ट कर उस स्थान पर नया दुर्ग शेरगढ़ बनवाया। इतिहासकार वाईडी शर्मा ने लिखा है कि 1955 में पुराने किले के दक्षिण पूर्वी भाग में परीक्षण के तौर पर खुदाई हुई, चित्रित भूरे बर्तनों के टुकड़े निकले। इन बर्तनों के बारे में कुछ इतिहासकारों ने अनुमान लगाया कि वे ईसा पूर्व 1000 साल पुराने थे और फिर इस स्थान के महाभारत काल से जुड़े होने की बात को बल दिया गया। सन् 1969 में पूर्वी दीवार में जल द्वार तक जाने वाले रास्ते के साथ उत्खनन फिर शुरू  किया गया। यह 1973 तक चलता रहा। इससे मिले चित्रित बर्तन से बस्ती के बारे में तो पता नहीं चला, लेकिन मौर्यकाल से लेकर प्रारंभिक मुगल काल तक के स्तर विन्यास उभरकर सामने आए। 
यह भी तथ्य है कि सन् 1913 तक यहां मजबूत दीवारों से घिरा एक गांव था। इस गांव का नाम इंद्रपत था। इसी आधार पर कुछ लोगों ने यह परिकल्पना की कि पुराने किले इंद्र्रप्रस्थ के अवशेषों पर बना है। वैसे पुराने किले के हर कोने पर बुर्ज और पश्चिम में मजबूत दीवार हैं। इसमें तीन द्वार - हुमायूं दरवाजा, तलाकी दरवाजा और बड़ा दरवाजा हैं।आजकल लोग बड़ा दरवाजा होकर ही किले के अंदर जाते हैं। दक्षिण का द्वार हुमायूं दरवाजा कहलाता है। इतिहासकार के मुताबिक तलाकी दरवाजे की अस्पष्ट लिखावट में हुमायूं का जिक्र है जिससे लगता है कि इस द्वार का निर्माण या मरम्मत हुमायूं ने कराई। किले के अंदर स्थित वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने ‘कला ए कुहना’ मस्जिद को शेरशाह ने बनवाया था। पुराने किले के अंदर अब तक बची कुछ इमारतों में से एक इस मस्जिद का मध्य भाग सफेद संगमरमर से बना है, लेकिन शायद इस पत्थर की कमी की वजह से शेष भाग गहरे लाल बलुआ पत्थरों से बनाया गया।
अंदर मेहराबों वाले पांच द्वार हैं। अंदर ही संगमरमर की एक पट्टिका है जिस पर लिखा है- जब तक पृथ्वी पर लोग रहेंगे तब तक यह जगह किसी के नियंत्रण में न रहे और यहां आ कर लोग हमेशा खुश रहें। शेरशाह ने पास में ही दो मंजिली इमारत शेरमंडल का निर्माण कराया था, जिसे देखकर लगता है कि यह एक आरामगाह थी। शेरशाह से अपनी सल्तनत दोबारा हासिल करने के बाद हुमायूं ने इस इमारत को ग्रंथालय में तब्दील कर दिया था। 19 जनवरी 1556 को इसी ग्रंथालय की सीढ़ियों से गिर जाने से उसकी मौत हो गई थी। शेरमंडल के पश्चिम में विशाल हमाम है।
इतिहासकारों के मुताबिक शेरशाह ने पुराना किले का निर्माण अधूरा छोड़ दिया था और जब हुमायूं ने दोबारा सत्ता हासिल की तो इसे पूरा कराया। पुराना किले के सामने 1561 में निर्मित खैरु ल मंजिल मस्जिद है। यहां जिस कक्ष में नमाज पढ़ी जाती है उसके बीच की मेहराब में एक शिलालेख है जिस पर लिखा है कि यह मस्जिद सम्राट अकबर के शासनकाल में उनकी धाय मां माहम अंगा ने बनवाई थी। खैरुल मंजिल मस्जिद के सामने शेरशाह द्वार है जो शायद शेरगढ़ का दक्षिणी द्वार था। लाल पत्थरों से बने इस द्वार को लाल दरवाजा भी कहा जाता है।


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