वामन पुराण संक्षेप- दिनेश मालवीय

वामन पुराण संक्षेप

-दिनेश मालवीय

‘वामन पुराण’ नाम से यह वैष्णव पुराण लगता है, लेकिन वास्तव में यह शैव पुराण है. इसमें शैव मत का विस्तार से वर्णन किया गया है. आकार में छोटा होने पर भी इसमें लगभग दस हज़ार श्लोक हैं, जिनमें से वर्तमान में करीब छह हज़ार उपलब्ध हैं. इसका उत्तर भाग उपलब्ध नहीं है. इस पुराण को विद्वानों ने अलग-अलग समय पर लिखा है. इसमें पौराणिक आख्यानों के साथ ही दूसरे पुराणों में वर्णित उपाख्यान भी हैं. हालाकि इनमें कुछ भिन्नता है.

शैव पुराण होते हुए भी भगवान विष्णु के बारे में इसमें कोई हीन बात नहीं कही गयी है. इसका नामकरण जिस राजा बलि और वामन चत्रित्र पर किया गया है, उसका इसमें दो बार बहुत संक्षेप में वर्णन किया गया है. इसमें राजा बलि की दानशीलता की प्रशंसा की गयी है.  इस उपाख्यान के अनुसार एक बार राजा बलि ने देवताओं पर चढ़ाई करके  इन्द्रलोक पर अधिकार कर लिया. उसके दान के चर्चे सभी जगह होने लगे. तब भगवान विष्णु ने वामन का वेश रखकर राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांग ली. उसके गुरु शुक्राचार्य विष्णुजी की योजना को समझ गये थे और उन्होंने बलि को दान नहीं देने को कहा. परन्तु बलि ने उनकी बात नहीं मानी  और भगवान ने विराट रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप लिए और तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया.

इस प्रकरण में विष्णु को श्रृष्टि का नियंता और दैत्यराज बलि की दानवीरता को प्रदर्शित किया गया है. परन्तु यह कथा ही ‘वामन पुराण’ का मुख्य विषय नहीं है. इसमें शिव चरित्र का विस्तार से वर्णन है.

इस पुराण में सती और उनके यज्ञ में दहन की कथा में कुछ भिन्नता है. प्रचलित कथाओं के अनुसार सती बिना निमंत्रण अपने पिता दक्ष के यहाँ यज्ञ में जाती हैं. वहाँ अपने पति शिव का अपमान देखकर अग्नि दाह कर लेती हैं. लेकिन ‘वामन पुराण’ के अनुसार गौतम पुत्री जया सती के दर्शन के लिए आती है. उसे सती को ज्ञान होता है कि जया अपनी अन्य बहने विजय, जयंती और अपराजिता अपने नाना दक्ष के यज्ञ में गयीं हैं. इस बात को सुनकर सती शिव को निमत्रण न आया जानकार दुखी हो जाती हैं और वहीं भूमि पर गिरकर अपने प्राण त्याग देती हैं. यह देखकर शिव की आज्ञा से वीरभद्र अपनी सेना के साथ जाकर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर देता है.

‘वामन पुराण’ में काम-दहन की कथा के अनुसार शिव जब दक्ष-यज्ञ का विध्वंस कर रहे थे तब कामदेव ने उन पर ‘उन्माद’ ‘संताप’ और ‘विज्राम्भण’ नामक तीन वाण चलाये. इससे शिव विक्षिप्त होकर सती के लिए विलाप करने लगे. उन्होंने व्यथित होकर वे वाण कुबेर के पुत्र पाँचलिक को दिए. जब कामदेव फिर वाण चलाने लगा तो शिव भागकर दारुकवन में चले गये. वहाँ तपस्यारत ऋषियों की पत्नियाँ उन पर आसक्त हो गयीं. इस पर ऋषियों ने शिवलिंग खंडित होकर गिरने का शाप दिया. शाप के कारण जब शिवलिंग धरती पर गिर पड़ा, तब सभी ने देखा कि उस लिंग का तो कोई ओर छोर ही नहीं है. इस पर सभी देवगण शिव की स्तुति करने लगे. ब्रह्मा और विष्णु ने स्तुति की. तब शिव ने प्रसन्न होकर पुन: लिंग धारण किया. इस पर विष्णु ने चारों वर्णों द्वारा शिवलिंग की उपासना का नियम प्रारंभ किया. साथ ही ‘शैव’, ‘पाशुपत’, ‘कालदमन और ‘कापालिक’ नामक चार प्रमुख शास्त्रों की रचना की.

एक कथा इस प्रकार है कि एक बार शिव चित्रवन में तपस्या कर रहे थे, तभी कामदेव ने उनपर फिर आक्रमण किया. शिवजी ने क्रोध में आकर उसे अपनी दृष्टि से भस्म कर दिया. भस्म होने के बाद भी वह राख नहीं बना, बल्कि पाँच पौधों में परिवर्तित हो गया. ये हैं- दुक्मधृष्ट, चम्पक, वकुल, पाटल्य और जातिपुष्प.

इस प्रकार ‘वामन पुराण’ में कामदेव के भस्म होकर अनंग होने का वर्णन नहीं मिलता. उसे सुगन्धित फूलों के रूप में परिवर्तित होना बताया गया है. इस पुराण में वसंत का बड़ा ही मनोरम वर्णन है.

इसके अलावा, ‘वामन पुराण’ में श्रृष्टि की उत्पत्ति, विस्तार और भूगोल का भी उल्लेख है. भारतवर्ष के विभिन्न प्रान्तों, पर्वतों, स्थलों और नदियों का भी वर्णन मिलता है. इसमें व्रत, पूजा, तीर्थाटन आदि के महत्त्व को भी बताया गया है. इसके अनुसार, जिस व्यक्ति को ‘आत्मज्ञान’ हो जाता है, उसे तीर्थों, व्रतों आदि की आवश्यकता नहीं रह जाती. वही सच्चा ब्राह्मण होता है, जो धन की लालसा नहीं करता. वह प्राणिमात्र के कल्याण को अपना धर्म मानता है.

इस पुराण के कुछ अन्य उपाख्यान प्रहलाद की कथा, अंधकासुर की कथा, तारकासुर और महिषासुर वध की कथा, दुर्गा सप्तशती, देवी महात्म्य, वेन चरित्र, चंड-मुंड और शुम्ब-निशुम्भ वध की कथा, चित्रांगदा विवाह, जाम्ब -कुजम्भ वध की कथा, धुंध पराजय आदि की कथा, अनेक तीर्थों का वर्णन, राक्षस कुल के राजाओं का वर्णन आदि भी शामिल हैं. इसमें राक्षसों को रक्तपिपासु नहीं बल्कि उन्नत सभ्यता का पालन करने वाला बताया गया है. वे लोग आर्य सभ्यता को नहीं मानते. इस पुराण में कृतध्नता को सबसे बड़ा पाप माना गया है. उपकार करने वाले के प्रति अनुपकार करने के पाप का कोई प्रायश्चित नहीं है.

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