क्या सप्ताह के सातों दिनों के नाम भारत ने दिए ?

क्या सप्ताह के सातों दिनों के नाम भारत ने दिए ?

भारतीय ज्योतिष और वैदिक ज्ञान के आधार पर यह दावे से कहा जा सकता है, कि सप्ताह के दिनों के नाम ग्रहों पर आधारित होने के पीछे कहीं न कहीं भारतीय सनातन वैदिक परंपरा का योगदान है, हम सब हर दिन को एक ग्रह से जोड़कर देखते हैं, जैसे रविवार को सूर्य का दिन माना जाता है, सोमवार को चंद्रमा का दिन माना जाता है ,मंगलवार को मंगल का दिन माना जाता है, बुधवार को बुध का दिन माना जाता है, शुक्रवार को शुक्र का, शनिवार को शनि का |

सूर्य हमारे लिए सौर मंडल का सबसे प्रमुख गृह है, बाकी गृह उसके चक्कर लगाते हैं, इसी तरह बाकी दिन रविवार के चक्कर लगाते हैं, इसलिए  सप्ताह  के मध्य दिन का नाम सूर्य के नाम पर रखा गया, सप्ताह को सोमवार से शुरू माना गया |



प्राचीन समय में पृ्थ्वी की अपेक्षा शनि सबसे ऊपर या दूर माना जाता था और चन्द्रमा सबसे नीचे अर्थात नजदीक, इसलिए शनिवार सबसे आखिरी और सोमवार पहला दिन, रविवार को दिनों का मध्य दिवस माना गया, इन ग्रहों को, जैसा कि सूर्य सिद्धान्त आदि ग्रन्थों से सिद्ध है, ज्योतिषियों नें दिनों का स्वामी माना है |

सूर्यदेव को पूरे विश्व में सभी जगह(इस्लाम को छोडकर) ग्रहों का राजा ही माना गया है. इसलिए घडी या घंटे का स्वामी उन्होने सूर्य को ठहराया|

पृथ्वी ठीक 24 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर लगा लेती है, इसीलिए हमारा एक दिन जो 24 घंटे का होता है, वह पृथ्वी  के एक चक्कर पर आधारित है, दिन के नाम ग्रह के नाम पर रखने का तात्पर्य यह भी था कि दिन भी ग्रह नक्षत्रों की तरह गतिशील है ,  दिनों के नाम ग्रहों के नाम पर रखने में सौर मंडल के साथ प्रमुख ग्रहों को चुनना प्रमुख था जिसमें सूर्य ग्रहों का राजा माना जाता है ,

1.  सूर्यवार अर्थात् रविवार

2.  चन्द्रवार अर्थात् सोमवार ,सोमवार को 'लूना' यानि चाँद का नाम दिया गया, इसलिए इतालवी भाषा में उसे 'लुनेदी' और फ्राँस में उसे 'लंदी' कहते हैं। भारत में भी सप्ताह के दिन इसी परम्परा से जुड़े हैं।

3.  सृष्टि के तीसरे दिन जब सब मंगल लगा तो तीसरे दिन का नाम ऋषिमुनियों ने भोमवार अर्थात् मंगलवार कर दिया ।

4.  अगले दिन बुद्दी का प्रकाश हुआ और हमने बुद्धि से सभी वस्तुओं को देखा तो ऋषिमुनियों ने बुधवार कर दिया ।

5.  सृष्टि में सबसे पहला गुरु परमात्मा है और इसके ही एक नाम पर ऋषिमुनियों ने गुरुवार अर्थात् बृहस्पतिवार रखा । इस दिन तक परमपिता परमात्मा का ज्ञान धीरे-धीरे सब तक पहुंचना प्रारंभ हो गया था ।

6.  सृष्टि के आदि समय में वीर्य का ठीक ठीक उपयोग करके संतान उत्पत्ति प्रारंभ कर दी थी । जिस प्रकार शुक्र बहुत कम होता है उसी प्रकार शरीर में धातु अर्थात् वीर्य बहुत कम मात्र में उत्पन्न होता है ।जिसके लिए हमें अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करनी चाहिए ।

7.  शनि बहुत पवित्र है जो परमात्मा का ही एक नाम है और सृष्टि के 7 वे दिन को शनिवार रखा गया क्योंकि इस दिन हमने सभी वस्तुओं का उपभोग करना प्रारंभ कर दिया था ।  सप्ताह के 7 दिनों का इतिहास

जापानी भाषा में दिनों के नाम इस प्रकार हैं-

रविवार को 'निचीयोबि' यानि 'सूर्य का दिन' कहा जाता है।

सोमवार को गेतसुयोबी यानि चाँद का दिन कहा जाता है।

मँगलवार को कायोबी यानि आग का दिन कहा जाता है।

बुधवार को सुईयोबी यानि पानी का दिन कहा जाता है।

बृहस्पतिवार को मोकुयोबी यानि लकड़ी का दिन कहा जाता है।

शुक्रवार को किनयोबी यानि स्वर्णदिन कहा जाता है।

शनिवार को दोयोबी यानि धरती का दिन कहा जाता है।

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आर्यभट कृत दशगीतिका, श्लोक 3 में गुरुदिवस (बृहस्पतिवाद) का उल्लेख है। बृहत्संहिता में मंगल (क्षितितनय दिवस) का उल्लेख है। पंचसिद्धान्तिका में सोम दिवस (सोमवार) आया है। बृहत्संहिता ने रविवार से शनिवार तक के कर्मों का उल्लेख किया है। इसी विषय में उत्पल ने गर्ग नामक प्राचीन ज्योतिर्विद् के 18 अनुष्टुप् श्लोकों का उद्धरण दिया है। कर्न ने गर्ग को ई. पू. पहली शती का माना है। इससे प्रकट है कि भारत में सप्ताह-दिनों का ज्ञान ई. पू. प्रथम शती में अवश्य था।

फिलास्ट्रेटस ने टायना के अपोल्लोनियस (जो सन् 18 ई. में मरा) के जीवन चरित में लिखा है कि किस प्रकार भारत में यात्रा करते समय अपोल्लोनियस ने ब्राह्मणों के नेता इर्चुस से 7 अँगूठियाँ प्राप्त कीं, जिन पर 7 ग्रहों के नाम थे और जिन्हें उसे प्रतिदिन एक-एक करके पहनना था। इससे भी यही प्रकट होता है कि ग्रह - नाम प्रथम शती के बीच में भारत के लोग ग्रहीय दिनों से परिचित थे।

वैखानस-स्मार्त-सूत्र एवं बौधायन धर्मसूत्र में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु नामक ग्रहों के नाम आए हैं।

प्रथम ग्रन्थ में बुधवार का भी उल्लेख है।

आथर्वण-वेदांग-ज्योतिष (वारप्रकरण, श्लोक 1 से 8) में रविवार से लेकर शनिवार तक के कर्मों का उल्लेख है।

गाथा-सप्तशती (हाल कृत प्राकृत काव्य संग्रह) में मंगल एवं विष्टि का उल्लेख है।

याज्ञवल्क्य स्मृति में आज की भाँति दिनों एवं राहु-केतु के साथ नवग्रहों की चर्चा है।

यही बात नारद पुराण में है।

पुराणों में सप्ताह-दिनों के विषय में बहुत-से वर्जित एवं मान्य कर्मों के उल्लेख हैं। बहुत-से पुराणों की तिथियों के विषय में मतभेद हैं, किन्तु इतना तो प्रमाणों से सिद्ध है कि ईसा की प्रथम दो शतियों में ग्रहों की पूजा एवं सप्ताह के दिनों के विषय में पूर्ण ज्ञान था।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, यह सप्रमाण सिद्ध हो चुका है कि भारतीय लोग ई. पू. प्रथम शती एवं ई. उपरान्त प्रथम शती के बीच ग्रहों की पूजा एवं ग्रहयुक्त दिनों के ज्ञान से भली-भाँति परिचित थे।

दिनों के नाम पूर्णतया भारतीय हैं, उन पर यूनानी या अभारतीय प्रभाव नहीं है। अल्बरूनी ने लिखा है कि भारतीय लोग ग्रहों एवं सप्ताह-दिनों के विषय में अपनी परिपाटी रखते हैं|
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