सन्ध्या – उपासना के भावार्थ सहित मन्त्र

उपस्थान मन्त्र 

उप = समीप।स्थान = बैठना अर्थात् अपने हृदय में ईश्वर का अनुभव करना। निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अपने आपको सर्वरक्षक, सर्वशक्तिमान् और प्रकाश स्वरूप प्रभु की पवित्र गोद में बैठा हुआ अनुभव करें

ओ३म्। उद् वयं तमसस् परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥१॥ 

यजुर्वेद ३५. १४

भावार्थ – हे ईश्वर ! आप अज्ञान रूपी अन्धकार से रहित, प्रकाश स्वरूप, चराचर के सञ्चालक, प्रलय के बाद भी विद्यमान रहने वाले, देवों के भी देव और सबसे उत्कृष्ट हो। ऐसी कृपा करो कि हम अच्छे प्रकार श्रद्धा और भक्ति से आपको प्राप्त करें।

ओ३म्। उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।

दृशे विश्वाय सूर्यम्॥२॥ यजुर्वेद ३३. ३१

भावार्थ – सृष्टि की नियमपूर्वक रचना और वेद के मन्त्र तर्क – वितर्क के साथ ईश्वर का ज्ञान व निश्चय अच्छी प्रकार करा रहे हैं। वही जड़ और चेतन समस्त संसार का आधार है। पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम दिव्य गुण वाले ईश्वर की ही उपासना करें।

ओ३म्। चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर् मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावा पृथिवीऽ अन्तरिक्षं सूर्यऽ आत्मा जगतस् तस्थुषश्च स्वाहा॥३॥ यजुर्वेद ७. ४२

भावार्थ – ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभाव आश्चर्यजनक हैं। वह श्रेष्ठ विद्वानों के हृदय में प्रकाशित रहता है। वह सबका आश्रय है। मित्र स्वभाव वाले, श्रेष्ठ आचरण वाले, उत्तम ज्ञान वाले उपासकों का द्रष्टा और दर्शयिता वही है। द्युलोक, पृथिवी लोक, अन्तरिक्ष लोक आदि समस्त संसार का उत्पादक, धारक और रक्षक वही है। वही चराचर संसार का आधार है। ईश्वर के इस स्वरूप का अनुभव मैं यथार्थ रूप से कर रहा हूँ।

ओ३म्। तच्चक्षुर् देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥४॥ यजुर्वेद ३६. २४

भावार्थ – हे ईश्वर ! आप सबको देखने वाले तथा सबको मार्ग दिखाने वाले हो। आप ही विद्वानों और उपासकों के हितैषी हो। आप सृष्टि के पूर्व से लेकर सदा विद्यमान रहने वाले हो। आपके शुद्ध स्वरूप को हम सौ वर्षों तक देखते रहें। सौ वर्षों तक आपका ध्यान करते हुए जीवित रहें। सौ वर्षों तक आपके गुण सुनते रहें। सौ वर्षों तक आपके गुणों का प्रवचन करते रहें। सौ वर्षों तक हम दीनता रहित रहें अर्थात् किसी के अधीन न रहें तथा सौ वर्षों के बाद भी हम आपको देखते हुए, आपका ध्यान करते हुए, आपके गुणों को सुनते हुए, आपका गुणगान करते हुए, दीनता रहित होकर जीवित रहें।

गायत्री मन्त्र

ओ३म् भूर् भुवः स्वः। तत् सवितुर् वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥ 

समर्पण मन्त्र

हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा,

धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर् भवेन्नः॥ 

भावार्थ – हे दया के सागर ईश्वर ! आपकी कृपा से, जो – जो उत्तम कर्म हम लोग करते हैं, वे सब आपको अर्पण हैं। इस जप, उपासना आदि आपकी भक्ति से हमें शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो।

नमस्कार मन्त्र 

ओ३म्। नमः शम्भवाय च मयोभवाय च। नमः शङ्कराय च मयस्कराय च। नमः शिवाय च शिवतराय च॥ 

यजुर्वेद १६. ४१

भावार्थ – हे शान्ति स्वरूप, सुख स्वरूप और आनन्द स्वरूप प्रभो ! आप शान्ति, सुख और आनन्द देकर हमारा कल्याण करो। हम बारम्बार आपको नमस्कार करते हैं।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

॥  इति सन्ध्या – उपासना विधिः॥ 

ब्रह्मयज्ञ (सन्ध्या – उपासना) के मन्त्रों का भावार्थ –

हे सत् – चित् – आनन्द स्वरूप ईश्वर ! हम उपासक भक्ति भावना से पूरित होकर प्रेम और श्रद्धा से आपकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना कर रहे हैं। हमारे ऊपर सुख और शान्ति की वर्षा करके कल्याण करो। मेरा यह शरीर श्रेष्ठ कर्मों का मन्दिर बनकर सदा सुदृढ़ और स्वस्थ रहे।बुद्धि शुद्ध, पवित्र और शुभ संकल्पों वाली हो। हृदय में सत्य, प्रेम, अहिंसा, शान्ति और उदारता का निवास बना रहे।

हे ईश्वर ! आप ही सृष्टि के निर्माता और सञ्चालक हो।आप अग्नि, वायु, पृथिवी, जल, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र आदि समस्त ब्रह्माण्ड को बनाकर धारण और पालन कर रहे हो। हम आपके सर्वव्यापक, न्यायकारी स्वरूप का अपने हृदय मन्दिर में दर्शन करके पाप के आचरण और दुष्कर्मों से सदा दूर रहें।

हे सर्वव्यापक ईश्वर ! पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, नीचे और ऊपर सभी दिशाओं में आप ही हमारे स्वामी हो। आप ही अपनी दिव्य शक्तियों से सभी दिशाओं में हमारी रक्षा करते हो। अतः हम आप को और रक्षा करने वाली आपकी दिव्य शक्तियों को बार – बार प्रणाम करते हैं। सृष्टि के विविध पदार्थ बाण के समान हमारे रक्षक और प्रेरक हैं। उनको भी हम नमस्कार करते हैं अर्थात् इनका उपयोग करते हैं।

हे ईश्वर ! आप हम सबकी द्वेष भावना को नष्ट करने की कृपा करो, जिससे हम सदा आनन्द में रहें। आपके गुण, कर्म और स्वभाव हम अल्प ज्ञानियों के लिए बहुत ही आश्चर्यकारक हैं। ज्ञानी लोग आपके गुणों का गान करते हुए ज्ञान रूपी नेत्रों से आपकी अनुभूति में रम कर सदा आनन्द विभोर रहते हैं।

हे सुख स्वरूप ईश्वर ! हम आपके स्वरूप को सौ वर्षों तक देखते रहें।सौ वर्षों तक आपका ध्यान करते हुए जीवित रहें। सौ वर्षों तक आपके गुणों को सुनते रहें। सौ वर्षों तक आपके गुणों का प्रवचन करते रहें और सौ वर्षों तक हम स्वाधीन होकर जीवन बितायें। इतना ही नहीं; सौ वर्षों के बाद भी हमारा जीवन इसी प्रकार रहे।

हे दया के सागर ! आपकी उपासना भक्ति और आपके जप से हमें धर्म – जो सत्य और न्याय का आचरण करना है उसकी, अर्थ – जो धर्मपूर्वक पदार्थों की प्राप्ति करना है उसकी,काम – जो धर्म और अर्थ से प्राप्त किये गये पदार्थों का सेवन करना है उसकी तथा मोक्ष – मुक्ति की, शीघ्र ही प्राप्ति हो।हम आपको बारम्बार प्रणाम करते हैं।हमें सब प्रकार का सुख और शान्ति देकर मोक्ष रूप आनन्द प्रदान करो।यही विनती है।हे प्रभो ! स्वीकार करो – स्वीकार करो – स्वीकार करो।

ATUL VINOD



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