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पब्लिक कनेक्ट से कमबैक परफेक्ट

सार

पांच राज्यों के चुनाव में केवल भाजपा और उसके गठबंधन की सरकार ही रिपीट होने में सफल हुई है. इसके अलावा कोई भी दल अपनी सरकार को वापस लाने में सफल नहीं रहा है..!!

janmat

विस्तार

    असम में तीसरी बार बीजेपी को भारी बहुमत मिला है. पुडुचेरी में भाजपा गठबंधन अपनी सरकार फिर से बनाने में सफल रही है. इसके अतिरिक्त बंगाल, तमिलनाडु और केरल में सरकारें पराजित हुई हैं. 

    संसदीय शासन व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधि शासन संभालते हैं. सरकारी सिस्टम तमाम तरह की कमजोरियों और करप्शन से भरपूर होता है. अधिकांश सरकारों से जनता में नाराजगी बढ़ जाती है. पहले तो यही ट्रेंड था कि हर पांच साल में सरकारें बदल जाती थीं. अभी भी कुछ राज्यों में यह ट्रेंड बना हुआ है. हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसा ही ट्रेंड है. कुछ राज्यों में जहां पहले ऐसे ही सरकारों में बदलाव का ट्रेंड था, उनमें अब हालात बदले हुए दिखाई पड़ते हैं. 

    देश में पहले अकेली कांग्रेस सत्ता की पार्टी मानी जाती थी. केंद्र के साथ ही अधिकांश राज्यों में उसकी सरकारें काम करती थीं. बीजेपी के उभरने के बाद तुलनात्मक गवर्नेंस का ट्रेंड बढा. इसका क्रेडिट बीजेपी को ही दिया जा सकता है. कांग्रेस में तो यही इतिहास रहा है कि उनकी सरकार एक बार सत्ता में आती है तो दूसरी बार वापसी कम ही कर पाती हैं. पिछले तीन दशक में अगर देखा जाएगा, तो केवल मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार है, जो दो बार सत्ता में लगातार रही है. इसके अलावा कांग्रेस की सारी सरकारें चुनाव में पराजित हो जाती हैं.

    बीजेपी ने इस ट्रेंड को बदल दिया है. बीजेपी गुजरात में तो तीन दशक से लगातार शासन चला रही है. हरियाणा में तीसरी बार बीजेपी की सरकार है. मध्य प्रदेश उत्तराखंड महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों में तीन-तीन बार लगातार बीजेपी ने सरकार में वापसी की है. केंद्र में पीएम मोदी की सरकार भी तीसरी बार सत्ता में है. 

    सरकार चलाना कोई आसान काम नहीं है. सिस्टम की तमाम सारी कमजोरियां हैं, उसमें संतुलन बनाए रखते हुए, जनहित को प्राथमिकता देना तभी संभव होता है जब सरकार और राजनीतिक दल के बीच में संतुलन हो राजनीतिक दल का संगठन पब्लिक के बीच मजबूती के साथ कनेक्ट रहे, भाजपा सरकारों को इस मामले में थोड़ा लाभ आरएसएस का भी मिलता है. संघ जमीनी हकीकत और सरकार से पब्लिक कनेक्ट पर सटीक फीडबैक संगठन और सरकार को उपलब्ध कराता है. 

    सरकारों के रिपीट होने में एक तरफ जहां गवर्नेंस की भूमिका होती है. वहीं विपक्ष का नाकारापन भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. अगर असम का ही उदाहरण लिया जाए तो तीसरी बार यहां भाजपा सत्ता में आ रही है. पुडुचेरी में भी दूसरी बार बीजेपी सरकार की वापसी हो रही है. इन दोनों राज्यों में विपक्ष के रूप में कांग्रेस सामने है. कांग्रेस विपक्ष की भूमिका भी सक्षमता और ईमानदारी से निभाने में सफल नहीं हो पाती है. यही कारण है कि जहां कांग्रेस एक बार सत्ता से उतरी वहां लंबे समय तक दोबारा सत्ता में वापस नहीं हो पाती है.

    कुछ ही राज्य बचे हैं जहां पांच साल में सरकार बदलने का ट्रेंड अभी कायम है. किसी राज्य में कांग्रेस एक बार सरकार में अगर बाहर जाती है, तो दोबारा जीत नहीं पाती है. यूपी, बिहार, बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में जहां दशकों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. मध्य प्रदेश में भी 23 सालों में कमलनाथ की 15 महीने की सरकार छोड़कर सत्ता से बाहर है.

    भाजपा शासित राज्यों में गवर्नेंस में कमजोरी कम नहीं है. लेकिन फिर भी सरकार और संगठन में संतुलन बनाते हुए गुड गवर्नेंस और डेवलपमेंट को प्राथमिकता के कारण जनता में भरोसा पैदा करने में बीजेपी ज्यादा सफल दिखाई पड़ रही है. बिहार में तो बीजेपी गठबंधन बीस सालों से सत्ता में है. गवर्नेंस और डेवलपमेंट में बीजेपी की क्रेडिबिलिटी उनको दूसरे राज्यों में चुनाव जीतने में सक्षम बनाती है. सेंट्रल गवर्नमेंट का परफॉर्मेंस भी बीजेपी को प्रो डेवलपमेंटल प्रमाणित करता है.

    करप्शन हर राज्य में है. कोई भी राज्य बेस्ट नहीं हो सकता, लेकिन संसदीय व्यवस्था तुलना और बेहतरी के आधार पर काम करती है. बहुमत और अल्पमत उसकी बुनियाद है. अगर तुलना के रूप में देखा जाएगा तो बीजेपी की सरकारों का परफॉर्मेंस दूसरे दलों की सरकारों की तुलना में बेहतर माना जा सकता है. गवर्नेंस की खुशी ही जनादेश से सरकारों की वापसी का कारण माना जा सकता है. इसको पॉजिटिव दृष्टिकोण से तो ऐसे ही देखा जाएगा, लेकिन इसमें एक नकारात्मक दृष्टिकोण है, जो विपक्ष की भूमिका को लेकर है. 

    देश में विपक्ष के रूप में कांग्रेस सबसे प्रमुख दल है. उसकी चार राज्यों हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और अब केरलम में सरकार है. इनमें से कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में तो कांग्रेस आंतरिक खींचतान से ग्रसित दिखाई पड़ती है. कांग्रेस का संगठन राजनीतिक प्रतिबद्धता से ज्यादा गांधी परिवार की प्रतिबद्धता पर आश्रित है. जब कोई संगठन व्यक्तिवादी या परिवारवादी निष्ठा पर काम करता है, तो उसका पूरा ढांचा हर स्तर पर व्यक्तिगत निष्ठा पर ही सिमट जाता है. जब व्यक्तित्व टकराते हैं तो फिर सरकारों में एंटी इनकमवैंसी पनपती है. 

    गवर्नेंस में  गल्तियां संभव हैं. असली बात नीयत की होती है. अगर नीयत ही खराब है, नीयत ही जन सेवा से ज्यादा स्वार्थ सिद्धि की है, तो फिर चुनावी हार-जीत के बाद भी गवर्नेंस नहीं सुधर सकता है. आज भी कई राज्यों में सरकारों की वापसी इतना खुश होने के लिए काफी है, कि सरकार चलाने वाले गवर्नेंस सुधारने के लिए चिंतित हैं. 

    जनादेश का विवेक सब कुछ समझ जाता है. उसे लंबे समय तक बरगलाना और भरमाना संभव नहीं है. इसलिए अच्छी नीयत से निष्ठा पूर्वक शुद्ध अंतकरण से सरकार का संचालन राजनीतिक दलों का प्राथमिक दायित्व है. 

    सरकारों का पब्लिक कनेक्ट उनके कमबैक का परफेक्ट माध्यम है.