जनादेश ने एक बार फिर राजनीति के सारे पैंतरों को ध्वस्त कर दिया. बीजेपी ने बंगाल में ममता बनर्जी की इस्लामी राजनीति को ध्वस्त करते हुए विजय हासिल की है..!!
पांचो राज्यों में परिणाम बीजेपी को खुशी देने वाले दिख रहे हैं. असम में भाजपा ने तीसरी बार भारी बहुमत हासिल किया है. तमिलनाडु में सनातन विरोधी डीएमके हारा. केरल में कांग्रेस जीती जरूर है लेकिन बीजेपी भी आगे बढ़ी.
देश की राजनीति में बीजेपी, कांग्रेस तथा दूसरे क्षेत्रीय दलों की रणनीति में इस्लामी और हिंदुत्व की विचारधारा का स्पष्ट विभाजन है. विपक्षी दलों में मुस्लिम वोट की खींचतान साफ दिखती है. ममता अपने मुस्लिम तुष्टिकरण से इतनी आश्वस्त थीं, कि उन्हें हार में चुनाव आयोग और केन्द्रीय बलों की भूमिका दिख रही है. मुस्लिम इलाकों में भी ममता के पांव उखड़ गए. बंगाल इस्लामी राजनीति का आखिरी किला था, जिसे भाजपा ने ध्वस्त कर दिया है. असम में भी इस राजनीति को बीजेपी खत्म कर चुकी है. निसंदेह मुस्लिम बीजेपी को एक मुश्त वोट नहीं करते. बीजेपी बंगाल में हिंदुत्व के ध्रुवीकरण से जीतने में सफल हुई.
चुनावी परिणाम के आंकड़े साबित करेंगे कि हिंदू जहां एकजुट रहे. वहीं मुस्लिम मतों में विभाजन हुआ लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा ममता के खाते में ही गया. परिणामों से साफ है कि केवल इस्लामी राजनीति से अब सत्ता का सपना नहीं देखा जा सकता. मुस्लिम तुष्टिकरण अब जीत की गारंटी नहीं बचा, इसके काउंटर रिएक्शन में हिंदुत्व ध्रुवीकरण चुनावी जीत का आधार बनता जा रहा है.
पिछले लोकसभा चुनाव में आरक्षण खत्म करने के नेरेटिव पर कांग्रेस और विपक्षी दलों को समर्थन मिला, जिसके कारण मोदी सरकार बहुमत से दूर रही, इससे पब्लिक में निराशा थी. लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में चुनाव हुए, वहां सभी में बीजेपी सफल रही है. अब अगला मुकाबला यूपी में होगा. वहां भी लोकसभा परिणाम का बदला बीजेपी जरूर लेगी.
नारी शक्ति वंदन विधेयक लोकसभा में गिराने के लिए टीएमसी और डीएमके जिम्मेदार रही हैं. दोनों दलों को महिलाओं की नाराजगी का सामना करना पड़ा. केरल से वामपंथियों का भी सफाया हो गया है. अब किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं है. केरल में बीजेपी अभी उभर रही है इसलिए उसका स्वाभाविक लाभ भले ही कांग्रेस को मिला हो लेकिन महिलाएं कांग्रेस से भी निराश दिख रही हैं.
बंगाल में सनातन की जीत हुई. स्वतंत्रता के बाद बंगाल में कांग्रेस, वामपंथियों के बाद ममता बनर्जी ने शासन संभाला. इन तीनों ने बंगाल में सनातन को नुकसान पहुंचाने की हर कोशिश की है. तीनों ने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत किया. सीमावर्ती राज्य होने के कारण बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिए भी वोटबैंक बनते गए. बंगाल में हिंसा और भय की राजनीति शुरु से चली है.
मतदाता शुद्धिकरण का ऐतिहासिक काम चुनाव आयोग ने किया. ममता ने शुरु से ही एसआईआर और केंद्रीय बलों की तैनाती का विरोध किया. पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल के लोगों में TMC के भय को दूर करने में सफलता हासिल की. बंगाल के भद्रलोक ने भी परिवर्तन का साथ दिया. टीएमसी के संस्थागत भ्रष्टाचार और सिंडिकेट के दुष्प्रभाव से भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, विवेकानंद और बंकिमचंद्र चटर्जी जैसे सनातन के प्रतीक बंगाल से आते हैं. जनसंघ के रूप में भाजपा के जनक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बंगाल होम स्टेट है. वंदेमातरम की जननी है. सनातन का गुरुत्व केंद्र बंगाल माना जाता है. बंगाल की सभ्यता और डेमोग्राफी बदलने की साजिश हो रही थी. यह चुनाव बीजेपी के लिए उतना ही ऐतिहासिक है. जितना नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनना था. अब बंगाल हिंदुत्व की नई कैपिटल बनने जा रही है. गुजरात के बाद अब बंगाल में हिंदुत्व की जड़े इतनी गहरे जाएंगी कि भविष्य की राजनीति उससे प्रभावित होगी. आरएसएस के शताब्दी वर्ष में बंगाल में बीजेपी की विजय सनातन की विजय के रूप में देखी जा रही है.
बंगाल और तमिलनाडु में परिवारवादी राजनीति भी धराशायी हुई है. दोनों राज्यों की सरकारों ने महिलाओं सहित मतदाताओं के बैंक खाते में नगद राशि देने का काम भी किया, लेकिन ये फ्रीबीज योजनाएं सरकारों को बचा नहीं सकीं. मेंडेट ने भय और गुंडागर्दी को नकारा. तमिलनाडु में सुपरस्टार विजय पहली बार राजनीति में आए और सीएम की कुर्सी तक पहुंचने में सफल हो गए. वहां द्रविड़ राजनीति का सफाया होता दिख रहा है.
परिणाम पांच राज्यों में आए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बंगाल की हो रही है. फाइटर ममता बनर्जी भले ही कुछ भी आरोप लगाएं, लेकिन उनकी पराजय बंगाल की जनता ने सुनिश्चित की है. उनकी इस्लामी राजनीति के कारण हिंदुओं के पोलराइजेशन से उनकी पराजय हुई है. बीजेपी का मैनेजमेंट जीता है. पीएम नरेंद्र मोदी के चेहरे और गवर्नेंस को जीत मिली है. क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी चुनाव में ध्वस्त हुई.
चुनाव परिणामों ने यह साबित किया है कि क्षेत्रवाद और भाषावाद की राजनीति अब नहीं चलेगी. असम ने यही है साबित किया है, कांग्रेस वहां मुस्लिम समर्थन के बावजूद भी कुछ हासिल नहीं कर पाई. परिणामों ने साबित किया है कि बीजेपी की चुनावी रणनीति का मुकाबला करने में कोई दल सक्षम नहीं है. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी केरलम की जीत का क्रेडिट जरूर लेंगे, लेकिन वहां का चेंज स्वाभाविक है. कांग्रेस की असली पराजय असम में हुई है. प्रियंका गांधी वहां इंचार्ज थीं.
इस्लामी राजनीति की ममता का सबसे मजबूत किला बंगाल भी ध्वस्त हो गया है. इंडी गठबंधन के तीन दल भी टीएमसी, डीएमके और वामपंथी चुनाव में धराशायी हो गए हैं. राहुल गांधी दावा जरूर करते हैं कि बीजेपी का मुकाबला कांग्रेस ही कर रही है, लेकिन चुनाव परिणाम साबित कर रहे हैं, कांग्रेस बीजेपी को रोकने में पूरी तरह से असफल है.