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आत्म मूल्यांकन स्टील फ्रेम को चकित कर देगा

सार

राष्ट्रीय सिविल सेवा दिवस लोक सेवाओं में उत्कृष्टता के सम्मान से ज्यादा आत्म मूल्यांकन का अवसर है. तमाम कमजोरियों और खामियों के बावजूद सिविल सर्विस देश की सबसे सम्मानित और नेतृत्व वाली सेवा है. नागरिकों की सेवा इसका मुख्य उद्देश्य है लेकिन सिविल सर्विस जनसेवा से ज्यादा सियासी स्ट्राइक में व्यस्त दिखाई पड़ती है..!!

janmat

विस्तार

   सिविल सर्विस स्ट्रक्चर देश की एकता का नायाब नमूना है. सिविल सेवा के अफसर नेशनल लेवल पर नियुक्त होते हैं. राज्यों में उनको सेवा देना होता है. केंद्र में प्रतिनियुक्ति भी उनकी सेवा का पार्ट है. वैसे कार्यपालिका का नेतृत्व निर्वाचित जनप्रतिनिधि कैबिनेट के रूप में करते हैं, लेकिन कार्यपालिका में क्रियान्वयन का पूरा दायित्व सिविल सर्विस ही निभाती है. सिविल सर्विस के अफसर और पॉलिटिकल कार्यपालिका के बीच रिश्ता नियम प्रक्रिया का होता है. सिविल सेवा के अफसरों की तटस्थता और निष्पक्षता बुनियाद है. लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इस सेवा का राजनीतिकरण देश की चिंता बढ़ा रहा है.

   सरदार वल्लभभाई पटेल ने सिविल सर्विस के अफसरों के पहले बैच को संबोधित करते हुए इसे भारत का स्टील फ्रेम बताया था. यह स्ट्रक्चर किसी भी इमारत की मजबूती का आधार होता है. सिविल सेवा भी देश के डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर का मजबूत पिलर है. 

    अब तो देश का सुप्रीम कोर्ट भी इस सर्विस पर तीखी टिप्पणियां कर रहा है. पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में जजेस को बंधक बनाने के मामले में बंगाल के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को सुप्रीम कोर्ट ने तलब किया था. अपनी टिप्पणी में कोर्ट ने कहा कि ब्यूरोक्रेसी ने पूरे राज्य को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है. इसकी आलोचना कितनी भी की जाए लेकिन सिविल सर्विस और राजनीति के बीच दबाव, लगाव और तनाव को रोका नहीं जा सकता है. 

    राजनीति को पांच साल में फिर से जनादेश हासिल करना है. उसका सारा टारगेट अगले चुनाव में बहुमत प्राप्त करने पर टिका होता है. इसके लिए अपने समर्थकों और क्षेत्र के लिए वह सब करने के लिए तैयार होता है, जो उसे चुनाव में विजयी बनाने के लिए जरूरी है. राजनीति के लिए नियम प्राथमिकता नहीं है, उसकी प्राथमिकता चुनावी जीत है. इसमें सिविल सेवा के अफसरों की भूमिका सार्वभौमिक है. बिना उनके सहयोग और समर्थन के कोई भी राजनेता अपनी कोई भी नीति योजना लागू नहीं कर सकता है.

    कोई बड़ा राजनेता हो, बड़ा सिविल सेवा का अफसर हो उसमें भी वही सब स्वार्थ और कमजोरी होती है, जो आम इंसान में होती है. अफसर तो एक बार नियुक्त होने के बाद रिटायरमेंट तक सरकारी सुविधा का लाभ लेगा. राजनेता को तो अगले चुनाव में फिर से आने का तनाव होता है, वह तो दबाव बनाएगा. सिविल सेवा के अफसर पर यह निर्भर करेगा कि वह कितना दबाव में आता है और कितना अपनी सर्विस के सम्मान, पारदर्शिता, ईमानदारी और जनसेवा के प्रति अपने समर्पण को साबित करता है.

    कुछ भी हासिल करने के लिए मेहनत और लंबा रास्ता कम ही लोग अपनाना चाहते हैं. अधिकांश लोग शॉर्टकट में बहुत जल्दी सब कुछ हासिल करना चाहते हैं. राजनेता भी यही चाहता है और सिविल सेवा के अफसर भी. यही कॉमन फैक्टर एक गठजोड़ बना देता है. जनसेवा का लक्ष्य तो केवल कागजों पर रह जाता है. वास्तविकता में तो सिविल सेवा के अफसर और राजनेता एक दूसरे की पीठ खुजलाने में व्यस्त हो जाते हैं.

    राजनीति के बढ़ रहे अपराधीकरण से भी सिविल सेवा और पुलिस सेवा के अफसर कई बार अपने सम्मान की रक्षा करने बेबस महसूस करते हैं. ऐसे-ऐसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि चुन कर आते हैं, जिनका अपराधिक रिकॉर्ड होता है, जिनका आचरण उनकी गुंडागर्दी और भय से चुनावी जीत की धारणा पर काम करता है.   

    सिविल या पुलिस सेवा में जो भी युवा चुना जाता है, निश्चित रूप से वह अपनी मेरिट प्रूफ करता है. मध्य प्रदेश में करैरा में प्रोवेशन पर काम कर रहे आईपीएस अफसर के साथ बीजेपी के विधायक द्वारा जिस तरह के वक्तव्य दिए गए हैं, वह राजनीतिक आचरण और दबाव का बहुत बड़ा उदाहरण है. 

    सिविल सेवा के अफसर आजकल राजनीतिक मानदंडों को इसीलिए प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि नियुक्तियों, पदोन्नति, ट्रांसफर और पुरस्कारों में राजनीतिक पसंद को प्राथमिकता मिलती है. राजनीतिक दबाव के कारण सिविल सर्विस के प्रति धारणा बदल रही है. इन दबावों के कारण भी सिविल सेवकों की तटस्थता, निष्पक्षता खत्म हो रही है. 

    योग्य अधिकारियों की बजाए चाटुकार अधिकारियों को बढ़ावा मिलने से योग्यता का ह्रास होता है. राजनीतिक संरक्षण के कारण नौकरशाही अपनी विफलताओं के लिए जिम्मेदार नहीं बनाई जाती. जब प्रशासन राजनीतिक रूप से जुड़ा हुआ लगता है, तो जनता का सरकारी तंत्र से विश्वास कम हो जाता है. राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित होता है.

    पुलिस में तो डीजीपी के लिए 2 साल का कार्यकाल निर्धारित किया गया है, लेकिन सिविल सेवाओं में अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है. स्थानांतरण और पदोन्नति में राजनीतिक हस्तक्षेप कम करने के लिए अफसर का कार्यकाल निश्चित होना चाहिए. सिविल सेवकों को संवैधानिक मूल्यों और तटस्थता के सिद्धांतों कापालन अवश्य करना चाहिए. इससे जवाबदेही में सुधार आएगा. 

    सिविल सेवा के अफसर के बिना ना तंत्र चलेगा और ना ही सरकारों को चलना मुमकिन है. सिविल सर्विस को सियासी स्ट्राइक के लिए उपयोग होने से बचाना, उस सर्विस के अफसरों की ही जिम्मेदारी है.अफसर के परफॉर्मेंस का तो मूल्यांकन होता है, लेकिन आत्म मूल्यांकन से बड़ा कुछ भी नहीं होता.

    सिविल सर्विस के अफसर अगर ईमानदारी से आत्म मूल्यांकन करेंगे तो उन्हें स्टील फ्रेम की उनकी छवि धुंधली दिखाई पड़ेगी. इस छवि को चमकाना अफसर के लिए भी जरूरी है और देश के लिए भी.