महिला आरक्षण सबका प्रण है लेकिन इसे लागू करने के लिए रण ही रण है. लोकसभा चुनाव वर्ष 2029 से महिला आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए लाया गया नारी शक्ति वंदन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो पाया. इसके चलते सरकार विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में लगी हुई है तो विपक्ष, बीजेपी की परिसीमन की चाल बता, ठीकरा फोड़ रही है..!
बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव पूर्व महिला आरक्षण का मुद्दा बीजेपी को लाभ का सौदा दिखता है. वही टीएमसी और डीएमके इस बिल को अपने राज्यों के खिलाफ बताने में जुटी हैं. राजनीति जो भी हो लेकिन महिलाओं के आरक्षण का ताला खुल गया है. उम्मीद है कि, अगले लोकसभा चुनाव में ही महिला आरक्षण लागू हो सकता है.
मोदी और बीजेपी इस मुद्दे को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगें. राम मंदिर जैसा महिला आरक्षण का मुद्दा उसको अपना राजनीतिक भविष्य चमकाने के लिए मिल गया है. वर्ष 2023 में महिला आरक्षण पर सभी दलों की सर्वानुमति से बिल पास किया गया था, लेकिन लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इसका राजनीतिक फायदा नहीं मिला.
किसी मुद्दे के विरोध से उसका राजनीतिक फायदा मिलता रहा है, राम जन्मभूमि आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. कांग्रेस हमेशा यह कहती है कि, जन्म भूमि का ताला राजीव गांधी ने खुलवाया था. फेक्चुअली यह बात सही है लेकिन परसेप्शन में राम मंदिर आंदोलन ने कांग्रेस को जितना राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है, उतना अन्य दूसरे मुद्दे ने नही.
महिला आरक्षण पर भी कांग्रेस यही कह रही है कि, वह आरक्षण के पक्ष में है लेकिन बिल का विरोध कर उसने जो राजनीतिक भूल की है, उसका खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा. क्षेत्रीय दल भी इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ खड़े रहे. पांच राज्यों के चुनावी परिणाम महिला आरक्षण की अगली दिशा निर्धारित कर देंगे. इन चुनाव में बीजेपी और एनडीए को बिल गिरने का कोई राजनीतिक फायदा दिखता है तो निकट भविष्य में ही किसी न किसी रूप में पूरी प्रक्रिया को फिर से शुरू किया जाएगा.
बीजेपी यह जानती है कि, महिलाओं में अब वह केवल विपक्षी दलों के विरोध के आधार पर आरक्षण देने के उनके मंसूबों का अधिक फायदा नहीं ले सकती है, इसके लिए उसे महिला आरक्षण लागू करना ही पड़ेगा. मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में सरकार का यह कमिटमेंट बताया है कि, वह यह कानून लागू करने के लिए अडिग हैं.
इस संबोधन में पीएम ने राजनीति के सारे फार्मूले पर अपनी बात रखी है. कांग्रेस सहित दूसरे दलों के महिला रिजर्वेशन पर इतिहास और किसी भी रिफॉर्म का विरोध करने की नीति का भी उल्लेख किया. चुनावी राज्यों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में उन राज्यों का बड़ा नुकसान किया है. परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू होता तो उनके राज्यों के भाषा-भाषी लोग बढ़ी हुई संख्या में लोकसभा विधानसभा में अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करते.
भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा की बैठकें बुलाकर महिला आरक्षण का विरोध करने के लिए विपक्षी दल के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित किया जा रहा है. पब्लिक के बीच भी विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं. राहुल गांधी के सरकारी आवास पर भी इस बिल का विरोध करने के लिए भाजपा की महिला नेत्रियों ने प्रदर्शन किया.
महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया में जितना प्रतिरोध होगा, उतना ही क्रेडिट बीजेपी के पक्ष की तरफ झुकता जाएगा. तकनीकी रूप से महिला आरक्षण दशकों से लंबित रहा, इसे पारित करने का साहस पीएम नरेंद्र मोदी ने ही दिखाया है. जहां तक इसको लागू करने की प्रक्रिया का सवाल है, वर्तमान सीटों पर इसे लागू करने पर पुरुष प्रतिनधि सहमत होते तो काफी पहले यह लागू हो जाता.
विपक्षी दल, बीजेपी को परिसीमन की प्रक्रिया नहीं करने देने के लिए कितने भी एकजुट हो जाए लेकिन यह प्रक्रिया संवैधानिक अनिवार्यता है. परिसीमन अकेले से चुनाव नहीं जीते जाते. लोकसभा और विधानसभाओं की आज जो सीटें निर्धारित हैं, उनका परिसीमन कांग्रेस की सरकारों के दौरान हुआ था. निश्चित रूप से कांग्रेस ने अपने हित के मुताबिक उन सीटों का निर्धारण किया होगा. लेकिन वर्तमान में उन्हीं सीटों से भाजपा बहुमत प्राप्त कर रही है. बीजेपी और कांग्रेस के बीच में ट्रस्ट डिफिसिट ज्यादा है.
कांग्रेस मोदी के हर कदम का विरोध करती है. केवल महिला आरक्षण ही नहीं कांग्रेस ने तो धारा 370, सीएए, एनआरसी, वक्फ़ बिल, एसआईआर, यहां तक कि, सर्जिकल स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के विरोध में भी विचार व्यक्त किए हैं.
महिला आरक्षण और परिसीमन पर कांग्रेस और विपक्षी दलों को अपना स्टैंड आगे चलकर बदलना पड़ेगा. सभी राज्यों में समानुपातिक सीटों में वृद्धि का जो प्रस्ताव लाया गया है, उस पर ही सभी को सहमत होना पड़ेगा. आज भले ही मोदी और बीजेपी थोड़ा पीछे हटते दिखे हों लेकिन अगला कदम मजबूती से उठेगा. महिला आरक्षण बीजेपी के बुनियादी मुद्दों में नहीं था लेकिन उसकी विकास यात्रा में महिलाओं की भागीदारी ने इसकी जमीन मजबूत की है.
पीएम मोदी यह सुनिश्चित करेंगे कि, महिला आरक्षण के साथ वर्ष 2029 का लोकसभा चुनाव हो. अगर ऐसा हुआ तो परिणाम भी पूर्व निर्धारित है. मोदी और उनके मुद्दों का विरोध उनकी सबसे बड़ी ताकत है, अब तक तो यही साबित हुआ है.