राजनीतिक दलों के बीच विचारधारा और नीतियों पर विरोध प्रदर्शन मजबूत लोकतंत्र है. दलीय व्यवस्था संविधान की बुनियाद है. राजनीतिक दल से ही सरकार बनती है, लेकिन दल और सरकार एक नहीं हो सकते..!!
सरकार में संविधान की शपथ लेने के साथ ही दलीय भूमिका खत्म नहीं होती, लेकिन संविधान के अनुपालन की शर्त संवैधानिक पदों के साथ जुड़ जाती है. पीएम केंद्र में तो सीएम राज्य में सबसे बड़ा संवैधानिक पद है. प्रश्न यह खड़ा है, कि क्या राज्य का सीएम किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो सकता है.
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल गिरने के बाद भाजपा इसके लिए विपक्षी दलों को जिम्मेदार बताते हुए विभिन्न राज्यों में विरोध प्रदर्शन कर रही है. उन प्रदर्शनों में सीएम और संविधान की शपथ लेने वाले दूसरे मंत्री शामिल हो रहे हैं. अब तक तो सामान्यतः संविधान की शपथ लेने वाले किसी भी विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होते. यह राजनीतिक दल का काम है. संवैधानिक पद की शपथ लेने के बाद वह नेता सरकार का पार्ट हो जाता है. सरकार राज्य के सभी नागरिकों की है. विरोधी दल के नेता और मतदाता भी राज्य के नागरिक हैं. उनके लिए भी काम करना सरकार संवैधानिक दायित्व होता है.
सीएम और मंत्री जब संविधान की शपथ लेते हैं तो उनके शपथ का मूल यही होता है, कि उस पद पर रहते हुए अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे. भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करेंगे. अगर सीएम किसी भी मुद्दे पर एक पक्ष में विरोध प्रदर्शन के लिए उतरेंगे तो फिर यह भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना संविधान और विधि के अनुसार न्याय कैसे होगा.
जब सीएम ही एक पक्ष में विरोध प्रदर्शन और आंदोलन में शामिल हो गया तो फिर उसका आचरण उस मुद्दे पर दूसरा पक्ष रखने वालों के खिलाफ अपने आप हो गया. संवैधानिक पद पर शपथ लेने वाले सीएम और मंत्री लोकसेवक होते हैं. लोकसेवक के रूप में उनके दायित्व होते हैं. शासकीय कर्मचारी-अधिकारी भी लोकसेवक की श्रेणी में आते हैं.
सिविल सेवा आचरण नियम भी स्पष्ट रूप से कहते हैं, कि कोई भी शासकीय कर्मचारी अपनी सेवा से संबंधित किसी भी मामले में हड़ताल प्रदर्शन या किसी भी प्रकार के विरोध में भाग नहीं ले सकता. राज्य सरकारों के आचरण नियम भी इसी के अनुरूप हैं, जो प्रदर्शनों को अनुशासनहीनता मानते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है, कि सरकारी कर्मचारियों के पास हड़ताल करने का कोई मौलिक कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है.
महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में गिरने के बाद बीजेपी राजनीतिक अभियान चला रही है. इस अभियान में कोई बुराई नहीं है. कोई भी राजनीतिक दल ऐसा कर सकता है, लेकिन उसके दल की जिन राज्यों में सरकारें हैं उन सरकारों में संविधान की शपथ लेकर बैठे सीएम और मंत्री सामान्य रूप से ऐसा नहीं कर सकते हैं. पहले भी सीएम विरोध प्रदर्शन में शामिल होते थे. मध्य प्रदेश में भी ऐसा हो चुका है.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री विरोध प्रदर्शन में जंतर-मंतर पर जब धरने पर बैठे थे, तब बीजेपी की ओर से यही स्टैंड लिया गया था कि सीएम धरना प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकते हैं.
मध्य प्रदेश में धरना प्रदर्शन से जुड़े एक कानूनी मामले में संवैधानिक पद की मर्यादा का विषय पहले आ चुका है. बीजेपी की उमा भारती जब मुख्यमंत्री बनी थी, उससे पहले उन पर कर्नाटक की हुबली में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के मामले में प्रदर्शन का एक मामला अदालत में लंबित था. जब वह मुख्यमंत्री बनीं, उसके बाद उस मामले में कोर्ट से गैर जमानती वारंट जारी किया गया. अब प्रश्न यह उपस्थित हुआ कि क्या उमा भारती मुख्यमंत्री रहते हुए अदालत में पेश होकर अपनी विधि सम्मत प्रक्रिया पूरी कर सकती हैं.
बीजेपी के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व और विधि, संविधान के विशेषज्ञों ने ऐसा माना कि उमा भारती ऐसा नहीं कर सकती हैं. अगरवह अदालत में जाती हैं, तो उन्हें पद छोड़कर जाना चाहिए. उमा भारती ने सीएम पद से त्यागपत्र दिया. बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने उमा भारती बिना संविधान की शपथ लिए किसी धरना प्रदर्शन के लीगल मामले में सीएम रहते अपनी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ सकती थीं, तो फिर कोई भी इस पद पर रहते हुए किसी भी धरना प्रदर्शन में कैसे शामिल हो सकता है.
संविधान वही है लेकिन समय के साथ व्यवस्था में बदलाव कार्य संस्कृति और प्रक्रिया भी बदलती है. राज्यों में सरकारी कार्यप्रणाली सामूहिकता से ज्यादा सीएम ओरिएंटेड हो गई है. पॉलीटिकल पार्टी भी सीएम के मुताबिक ही चलती है. सारा फोकस यहां तक कि प्रबंधन सीएम पर ही निर्भर करता है. बिना सीएम मंत्री या सरकार की भागीदारी के सत्ताधारी दल की गतिविधियां तो प्रभावी ढंग से पूरी नहीं हो पाती हैं.
महिला आरक्षण के मामले में लोकसभा में बिल गिराने पर विपक्षी दलों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव को लेकर भी विधानसभाओं की बैठकें आयोजित की जा रही हैं. संसदीय विशेषाधिकार के अंतर्गत सदन के भीतर किसी भी सांसद के आचरण पर अदालत में भी सवाल नहीं किया जा सकता. लोकसभा के भीतर महिला आरक्षण का विरोध करने वाले सांसदों को अपने आचरण का विशेषाधिकार है. उनके उस आचरण की निंदा के लिए संसदीय प्रक्रिया का ही सहारा लिया जा रहा है. विधानसभा में क्या लोकसभा के सांसदों के कंडक्ट पर निंदा प्रस्ताव संवैधानिक प्रक्रिया पर ही सवाल नहीं खड़े करेगा.
संविधान की रक्षा को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं. कांग्रेस की ओर से तो राहुल गांधी अपनी सभाओं में संविधान की पुस्तक लहराते हैं. संविधान द्वारा स्थापित विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन शुद्ध अंतःकरण से ही किया जा सकता है.
शुद्ध अंतःकरण को मापने का कोई सार्वजनिक पैमाना नहीं है. हर व्यक्ति अपने अंतःकरण के लिए जवाबदेह है. राजनीति में शामिल हर अंतःकरण संविधान को बचाना चाहता है, तो निश्चित ही हमारा संविधान बचेगा.