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MP चुनाव: खतरे में पड़ गई अस्मिता ईवीएम की

सार

एक कांग्रेसी ने कहा कि जिस तरह इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान) धरती से चंद्रयान को संदेश देता रहता है, कुछइसी तरह का हाथ इसरो की मदद से भाजपा और चुनाव आयोग ने किया है..!!

janmat

विस्तार

वर्ष 2023 में तीन हिंदी भाषी राज्यों में करारी हार के बाद कांग्रेस ने अपनी शिकस्त का ठीकरा ईवीएम पर फोडना शुरू कर दिया गया है। कासतौर से मध्यप्रदेश कांग्रेस दफ्तर में इसके लिए ऐसे-ऐसे तर्क ( कुतर्क) गढ़ेजा रहे हैं कि हर किसी का माथा उनक जाए या वो हंसकर लोटपोट हो जाए। सबसे पहले तो दावा किया गया कि ईवीएम की बैटरी 16 दिनों तक क्यों चार्ज बनी रही। यानि बीच में ही उसे बदल दिया गया। उन ईवीएम को जो कांग्रेस और भाजपा के पोलिंग एजेंट की मौजूदगी में खोली और सील की जाती है। यानि उन्हें सील करने के बाद किसी भी पार्टी के पक्ष में बन दबाना मुमकिन नहीं है। यह सभी जानते हैं कि ईवीएम मशीन कभी भी किसी इंटरनेट से कनेक्ट नहीं होती है। यानि उसके साथ छेड़छाड़ या हैकिंग संभव नहीं है। लेकिन हमारे एक कांग्रेसी मित्र ने कहा कि जिस तरह इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान) धरती से चंद्रयान को संदेश देता रहता है। कुछइसी तरह का हाथ इसरो की मदद से भाजपा और चुनाव आयोग ने किया है। एक ने तो यह तर्क भी गढ़ा कि डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान संस्थान) की मदद से ऐसा किया है।

कांग्रेसियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि यदि ईवीएम के साथ इसी तरह छेड़छाड़ होती है तो पिछले विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने 90 में 68 सीटें हासिल कीं? मध्यप्रदेश में वह कैसे बहुमत के अंक के साथ ही कांग्रेस से पिछड़ गई? क्यों उसने राजस्थान में बहुमत हासिल कर लिया? ईवीएम पर सवाल उठाने वाली आप पार्टी ने लगातार दो विधानसभा चुनावों में 70 में से 67 या 64 सीटें हासिल कर ली ? इसी साल हुए हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कैसे कांग्रेस की सरकार बन गई । यदि मध्यप्रदेश के हालिया नतीजों की ही बात करें तो 230 में से 163 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने किस तरह प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ या उनके बेटे नकुल नाथ के संसदीय क्षेत्र छिंदवाड़ा की सातों सीटें जीत लीं? क्या ईवीएम पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसी यह मानने को तैयार हैं कि अफसरों ने गड़बड़ी करके कांग्रेस को छिंदवाड़ा की सभी सीटों पर जितवा दिया। श्योपुर जिले की दोनों ही सीटें कांग्रेस कैसे जीत गई?

वोटों के अंकगणित में पिछड़ गई कांग्रेस

ईवीएम पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसियों के लिए जमीनी हकीकत को समझते हुए न सिर्फ आत्म मंथन की जरूरत है बल्कि आंकड़ों के आईने में अपनी हैसियत का आकलन करना जरूरी है। हार के असली कारणों को पहचाने बगैर वहल आगे नहीं बढ़ सकती। आंकड़ों के आइने में देखें तो हरेक को समझ में आता है कि वोट शेयर के मामले में वह न सिर्फ मप्र बल्कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ज्यादा नहीं पिछड़ी है। मध्यप्रदेश में 2018 के चुनावों में कांग्रेस ने 40.89 फीसदी वोट शेयर के साथ भाजपा की 109 सीटों के मुकाबले 5 सीटें ज्यादा हासिल की थीं। बावजूद इसके भाजपा 41.02 वोट शेयर के साथ कांग्रेस से 45 हजार वोट ज्यादा पाई थी। तब कांग्रेस ने 1 करोड़ 55 लाख 95 हजार 153 वोट हासिल करते हुए अपने मत प्रतिशत को 36.79 फीसदी से करीब चार फीसदी ज्यादा बढ़ाते हुए सीटों का आंकड़ा 58 से 114 तक पहुंचाया था।

इस बार यानि 2023 में कांग्रेस ने आधा फीसदी वोट शेयर घटने के बावजूद एक करोड़ 75 लाख 64 हजार 353 वोट हासिल करके अपने पक्ष में करीब बीस लाख वोट बढ़ाए। लेकिन भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत को 41.02 से बढ़ाकर 48.55 फीसदी तक पहुंचा दिया । उसको मिले वोटों के आंकड़े में तकरीबन 56 लाख वोट बढ़ाकर कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ दिया। भाजपा ने इस बार 2 करोड़ 11 लाख 8 हजार 771 वोट हासिल किए। अब सवाल यह है कि जब कांग्रेस का वोट बढ़ा और वोट शेयर मामूली घटा तो भाजपा के वोट में साढ़े सात फीसदी की बढ़त के साथ 56 लाख का इजाफा कैसे गया?

इसका सीधा सा जवाब यही है कि भाजपा ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के बजाए तीसरे दलों और निर्दलीयों को मिलने वाले वोट बैंक पर हमला किया। 2018 के चुनाव में जहां तीसरे दलों के साथ अन्य को मिलने वाले वोट का शेयर 18.39 के मुकाबले 10.20 फीसदी पर आ गया। इसके चलते ही प्रदेश में सपा बसपा या गोंडवाणा गणतंत्र पार्टी के साथ न तो आप का खाता कुल पाया और न कांग्रेस तथा भाजपा के बागी ही कुछ काम कर सका।

बसपा का वोट शेयर तो 2013 में मिले सात फीसदी से ज्यादा वोटों से गिरतेहुए पिछले चुनाव में 5 प्रतिशत के आसपास था तो इस बार वह 3.40 प्रतिशत के करीब आ गया। 1.77 फीसदी वोट पाने वाली गोगंपा एक प्रतिशत वोट भी नहीं पा सकी। सपा भी एक फीसदी से नीचे उतरकर आधा प्रतिशत पर आ गई। जाहिर है कि ईवीएम पर रोना रोने के बजाए कांग्रेसी अपना वोट बैंक बढ़ाने और भाजपा का वोट शेयर घटाने की कोशिश करेंगे तभी उनकी जीत मुमकिन होगी। गालिब का वो शेर दोहराने से कोई फायदा नहीं होने वाला कि 'जिंदगी भर गालिब हम यही गुनाह करते रहे, धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करते रहे। '