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वसंत है, तरंग में रहिये उमंग तो अभी दूर है

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 20 Jul

सार

आज वसंत पंचमी है | प्रकृति अपनी छटा बदलती है | देश में उमंग आती है, पर ऐसा कुछ दिख नहीं रहा, देश में दुष्काल और अनियोजन के कारण बेरोजगारी और राजनीति के कारण कुछ और समस्या बड़ी और खड़ी हुई है |बीमार भारत में इस वसंत पर सिर्फ तरंग में रहा जा सकता है |

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विस्तार

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबन्ध के अंश याद आ रहे हैं | “एक शिरीष हैं, जिस पर लंबी-लंबी सुखी छिमियाँ अभी लटकी हुई हैं। पत्ते कुछ झड़ गए हैं और कुछ झडऩे के रास्ते में हैं। जरा-सी हवा चली नहीं कि अस्थिमालिका वाले उन्मत्त कापालिक भौरव की भाँति खडख़ड़ाकर झूम उठते हैं। ‘कुसुम जन्म ततो नव पल्लवा:’ का कहीं नाम-गन्ध भी नहीं है। एक नीम है। जवान है, मगर कुछ अत्यन्त छोटी किसलयिकाओं के सिवा उमंग का कोई चिह्न उसमें भी नहीं है|” तब परिस्थिति कुछ और थीं आज का माहौल कुछ भी कहें वासन्तिक नहीं है, जबरन वासन्तिक बनाने की कोशिशें हो रही है |

 

हर कोई किसी प्रकार बस जी रहा है। सब या बुरी तरह चुप हैं, या चुप रहने के होते इशारे देख रहे हैं । कहीं भी उल्लास नहीं, उमंग नहीं बीएस कवियों की दुनिया में हल्ला है प्रकृति रानी नया शृंगार कर रही है, और फिर जाने क्या-क्या। दुष्काल अभी गया नहीं है ,देश का भाग्य प्रसन्न नहीं है तो कोई क्या करे?रोज खबरें पढ़ता-लिखता हूँ, यही पेशा है। दुनिया के बारे में मीडिया के सहारे ही थोड़ा-बहुत जानता हूँ। हर जगह से एक बात सामने है,हिन्दुस्तान के जवानों में कोई उमंग नहीं है| जिन्हें सोचना चाहिए वे अपने[ खुद या गुट] से ज्यादा कुछ नहीं सोच रहे हैं | देश तो बहुत दूर है |

 

संसद चलाई जा रही है और पिछले कई सालों से ऐसे ही चलाई जाती है | कोई बात सिरे नहीं चढती, संसद के बाहर और भीतर का हल्ला सिर्फ कुर्सी पर काबिज रहने या काबिज होने की होड़ बदलता दिखाई दे रहा है |इस सब पर आज विचार किया तो कारण साफ दिखता है | देश ने अपने मनीषियों की अवहेलना की है | हर काल में एक काल पुरुष होता है और आप तब ही उस श्रेणी में आ सकते हैं, जब अपने पूर्वज मनीषियों को सलाम करें, उनसे इज्जत से पेश आये | सरस्वती संस्कार देती है, रूप और जय मांगने के लिए तो देवी दुर्गा है, परन्तु उन तक पहुँचने तक का पथ तो सरस्वती की कृपा से ही दिखता है |

 

मुझे यह समझ नहीं आ रहा किसने बताया कि देश में वसंत आ गया है? मैं थोड़ा-थोड़ा समझता हूँ। वसंत आता नही, ले आया जाता है। जो चाहे और जब चाहे अपने पर ले आ सकता। मुझे बुखार आ रहा है। यह भी नियति का मजाक ही है। सारी दुनिया में हल्ला हो गया कि वसन्त आ रहा है, और मेरे पास आया बुखार। अपने देश की ओर देखता हूँ और सोचता हूँ, मेरी वजह से तो यहाँ का वसंत, तो नहीं रुका है? आप भी विचार कीजिए, आपको शुभकामनायें, आज वसंत पंचमी है |