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स्वांग-अदाकारी, बनी राजनीतिक महामारी 

सार

मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म का कथानक राजनीति में भयानक रूप से बढ़ता जा रहा है. इस चलचित्र में नायक अपने जीवन आचरण को छिपाते हुए डॉक्टर बनकर जादू की झप्पी देते हुए दर्शकों की तालियां बटोरता है. गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी का कुली का ड्रेस पहनकर बिल्ला लगाए हुए ट्राली वाला सूटकेस सिर पर रखे चित्र और दृश्य जिस राजनीतिक कथानक का निर्माण कर रहे हैं वह चलचित्र में अभिनय जैसी ही अनुभूति दे रहे हैं..!

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विस्तार

मजबूरी में कुली की तरह बोझ उठाने वाला हर इंसान राहुल गांधी जैसी सुख-सुविधा, पद-प्रतिष्ठा हासिल करने का सपना देख रहा है और राहुल गांधी कुली का ड्रेस पहन कर अपने राजनीतिक लक्ष्य को साधने का सपना देख रहे हैं. शास्त्रों और सिद्धांतों में काम, क्रोध, मद, लोभ जानने समझने की अब शायद कोई आवश्यकता ही नहीं है. राजनीति में काम करने वाले नेताओं के जीवन आचरण हर क्षण उनके जीवंत संदेश दे रहे हैं.

करुणा-प्रेरित, दुख-पोषित, छवि निर्माण अभियान आज राजनीति का सबसे बड़ा अभियान बन गया है. कुछ करने की जरूरत नहीं है. केवल आम आदमी और गरीबों के बीच जाकर उनकी मजबूरी का भावनात्मक शोषण और विश्व प्रदर्शन प्रचार के साथ करुणानिधान की भी छवि बनाता है. खेत में धान लगाते किसान का फोटो शूट नेताओं को किसान की वास्तविकता का दर्शन करने के भाव के साथ किया जाता तो किसानों के साथ कुछ समय तक जीवन बिताने का प्रयास किया जाता. 

यह केवल राजनीति में ही हो सकता है कि गरीब का दर्द केवल फोटो क्लिक कर ही समझा जा सकता है. किसी भी अनुभूति के लिए पूरा जीवन खपाना पड़ता है. केवल राजनीति में ही क्षण भर में अनुभूति हासिल करने का चमत्कार देखा जा सकता है. आजकल मॉब लिंचिंग शब्द राजनीति में बहुत प्रचलित है. जब भीड़ कोई अपराध करती है तो उसे मॉब लिंचिंग कहा जाता है और जब भीड़ को मोहरा बनाकर उसकी मजबूरी और दुख का प्रदर्शन कर भीड़ की भावनात्मक हत्या की जाती है तो उसे लिंचिंग मॉब कहा जाना चाहिए. मॉब एडवेंचर पॉलिटिकल टूरिज्म पर चलचित्र बनाने की पहल हो तो निश्चित रूप से वह फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस से ज्यादा सफल होगी. 

राजनीति में बचकानेपन की कोई गुंजाइश नहीं है. चलचित्र में रिटेक की व्यवस्था होती है लेकिन राजनीति में रिटेक नहीं होता. लोकतंत्र में 18 वर्ष की परिपक्व उम्र को शायद इसीलिए मताधिकार दिया गया है कि उसे बचपन नहीं परिपक्व राजनेता चुनना है. राहुल गांधी बचपन में ही राजनीति में रच बस गए. उनको लेकर देश का अनुभव खट्टा मीठा रहा है. 

कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि राहुल गांधी में राजनीतिक परिपक्वता का सुखद उदय हो गया है. भारत जोड़ो यात्रा ने उनकी राजनीतिक परिपक्वता का संदेश देने में सफलता पाई थी. इस यात्रा के बाद राहुल गांधी के राजनीतिक कदमों और बयानों ने फिर परिपक्वता को निराश किया है. देश उनको पीएम के रूप में स्वीकार करे या नहीं करे लेकिन कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के समर्थक तो उन्हें इसी नजर से देखते हैं. राहुल गांधी को कम से कम अपनी पार्टी और समर्थकों को तो उनकी परिपक्वता का एहसास कराना ही चाहिए.

गांधी परिवार शुरू से ही भारत दर्शन के नाम पर ऐसे राजनीतिक पर्यटन कर लोगों की गरीबी और मजबूरी का प्रदर्शन दर्द समझने के नाम पर करता रहा है. राहुल गांधी के कई बयानों को न्यायालय भी मानहानिकारक मान चुका है. सेवा से शिखर और आनंद तक पहुंचाने की स्थिति शायद राजनीतिज्ञों को समझ नहीं आती है. केवल तरह-तरह के स्वांग अदाकारी और अभिनय राजनीति की मुख्य धारा बन गई है.

राहुल गांधी का सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक डायलॉग आज कल ‘नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान’ बन गया है. लोकसभा में बीजेपी सांसद और बसपा सांसद के बीच में हुआ अमर्यादित आचरण राहुल गांधी के लिए मोहब्बत की झप्पी देने का अवसर बन गया है.  इसका मतलब है कि नफरत का बढ़ना उनके राजनीतिक जीवन में मोहब्बत बढ़ाने का माध्यम बन गया है. जो दुर्भाग्यजनक घटनाक्रम लोकसभा में हुआ उसको विस्तार देकर बार-बार इस घटना का स्मरण दिलाना मोहब्बत फैलाने का ईमानदार प्रयास है या नफरत फैलाने की सोची समझी साजिश?

नफरत की जड़ तो राजनीति बनी हुई है. जो भी सत्ता में पहुंच जाता है, जहां भी सत्ता में पहुंच जाता है, वहां नफरत की परिस्थितियों को पीछे रखकर सत्ता आनंद में लीन हो जाता है. जो सत्ता में नहीं होता उसका एकमात्र लक्ष्य सत्ताधीश के खिलाफ नफरत का माहौल बनाना, भले ही इस माहौल की रचना में देश और समाज का कितना भी नुकसान हो, इससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता. जाति संप्रदाय और धर्म के नाम पर राजनीतिक शिखर पर पहुंचने के बाद बीजेपी आज जाति-संप्रदाय और धर्म के नाम पर नफरत की राजनीति को पीछे करने की इसलिए ईमानदार कोशिश कर रही है क्योंकि नफरत का नुकसान हमेशा सत्ता को ही होता है. अब तो ऐसा लगने लगा है कि नफरत का जो माहौल बनाया जा रहा है वह विपक्षी चुनावी अभियान का सुनिश्चित हिस्सा है. 

चुनावी राज्यों में सत्ता के लिए कांग्रेस और बीजेपी का राजनीतिक संघर्ष कड़वाहट भरा होता जा रहा है. एमपी में पोस्टरवार भ्रष्टाचार से शुरू होकर पाकिस्तान के थीम सॉन्ग की चोरी तक पहुंच गया है. चुनावी जीत के लिए कौन सच बोल रहा है, कौन झूठ बोल रहा है, इसका अंतर समझना दूभर हो गया है. जनता के धन से सरकारी खजाना लुटाकर चुनावी गारंटियां देना जनता के लिए खुद के सिर पर खुद का बोझ उठाने जैसा साबित हो रहा है. मीडिया के खिलाफ झल्लाहट सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है.

श्रेष्ठता साबित करने के लिए दूसरे की हीनता का शोषण सामाजिक अपराध है. श्रेष्ठता भीड़ से नहीं मन की श्रेष्ठता से आती है. आम आदमी दिखने की लालसा आंतरिक हीनता प्रदर्शित करती है. गरीब की मजबूरी और दुखों को जानने समझने के नाम पर सार्वजनिक प्रदर्शन की प्रवृत्ति अब लोगों में आक्रोश पैदा करने लगी है.

राजनेताओं को दूसरे का दर्द समझने से ज्यादा आम लोगों को यह अवसर देने की जरूरत है कि वह उनके सुख-दुख, पद-प्रतिष्ठा श्रेष्ठता हीनता के जीवन आचरण को समझ सके. हमेशा गरीबों के ही दर्द को जानने की राजनीति क्यों हो? जनता को भी तो यह अवसर मिलना चाहिए कि वह अपने महान नेताओं को करीब से बिना सुरक्षा घेरे के उनकी असलियत को जान पहचान सके. संत जैसे आम लोगों के बीच एकांतवास में चातुर्मास के लिए अवसर जुटाकरअपनी भक्ति और कर्म की शुद्धता को परखने का आम लोगों को मौका देते हैं. इसी प्रकार से राजनेताओं को भी हर साल एकांतवास में राजनीतिक चातुर्मास करना चाहिए. 

रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाकर भीड़ का उपयोग छवि निर्माण में नहीं बल्कि अकेले में भीड़ को उन्हें समझने का मौका देना चाहिए. स्वांग अदाकारी और अभिनय के पाखंड की राजनीतिक महामारी आगे चलकर राजनेताओं को कष्टकारी साबित होगी. ब्रेक के बिना गाड़ी का गति पकड़ना संभव नहीं है. कांग्रेस में राहुल गांधी के लिए ब्रेक नहीं  है शायद इसीलिये वे गति भी नहीं पकड़ पा रहे हैं.