निर्वाचित जनप्रतिनिधियो और उनकी फैमिली के कंडक्ट पर राजनीतिक दलों में संवेदनशीलता क्या समाप्त हो गई है. विधायक के परिवारजन आम आदमी को कुचलने का दुस्साहस करे और उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो..!!
करैरा की घटना बीजेपी और उसकी सरकार के गुड गवर्नेंस पर बहुत बड़ा सवाल है. दूसरी घटना खंडवा जिले में हुई है. आरोपी अपने वाहन से टक्कर मार कर लोगों को कुचल देता है. कुछ लोगों की मौत हो जाती है. ऐसी घटनाएं यही बताती हैं, कि लोगों में ना सरकार का भय है, ना कानून व्यवस्था की परवाह है. सत्ता का अहंकार थार पर सवार हो गया है.
आम पब्लिक को जब इस तरह से कुचला जा रहा है, तब सरकारी कर्मचारी और अफसर पर हमले तो सामान्य बात है. कुछ दिन पहले ही रेत माफिया ने मुरैना में एक वनरक्षक पर ट्रैक्टर चढ़ाकर मौत के घाट उतार दिया.
पिछोर के विधायक के बेटे ने जिस तरह से घटना को अंजाम दिया और उसके बाद सत्ता का रोब दिखाया, इतनी संवेदनशीलता भी नहीं दिखाई कि घायलों को अस्पताल तक पहुंचाया जाए, ऐसा आचरण पावर के ओवरडोज का ही रिएक्शन हो सकता है. बीजेपी को पार्टी विद डिफेंस माना जाता था. अपने सांसदों, विधायकों और पदों पर बैठे नेताओं के आचरण पर नकेल रखने की परंपरा मानी जाती थी. लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा लग रहा है, कि पावर का नशा कुछ ज्यादा ही हो गया है.
निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और उनके परिवार जनों के आचरण में सत्ता के अहंकार की बढ़ती प्रवृत्ति पूरी शासन व्यवस्था को संचालित करने की कोशिश में लगी रहती है. राजनीति में आपराधिक तत्वों का बोलबाला सभी दलों में है. इसे राजनीति की मजबूरी कहा जाए या अनिवार्यता कि हर क्षेत्र में मुकाबले के लिए इस तरह के बाहुबली को चुनाव में मौका दिया जाता है. पिछोर के विधायक की छवि पहले से ही बाहुबली की रही है. उनके बेटे के आचरण ने उनकी छवि को इसी दिशा में आगे ले जाने का काम किया है.
कोई भी आकस्मिक घटना स्वभाविक हो सकती है, लेकिन ऐसी घटना पर जो प्रतिक्रिया दी जाती है, उससे परसेप्शन बनता है, कि व्यक्ति को अपनी गलती का एहसास है या वह पावर के नशे में सब कुछ पा लेने की मानसिकता में जी रहा है. जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तब विधायक के राजनीतिक दल का दायित्व होता है, कि वह सार्वजनिक रूप से ऐसे कंडक्ट की ना केवल निंदा करें बल्कि उस पर राजनीतिक और कानूनी कार्रवाई के लिए दबाव बनाए.
जब खुले आम पब्लिक को थार से कुचल दिया जाता है, तो फिर ऐसी मानसिकता फाइलों में पब्लिक के इंटरेस्ट को किस सीमा तक कुचलती होगी, इसका केवल अंदाजा लगाया जा सकता है. जो सबको आंखों से दिख रहा है उसमें अच्छा नागरिक बनने की कोशिश नहीं की जाती. तो फिर जो फाइलों में दबा है, जो ठेकों में कुछ लोगों के हाथों में ही खेला जा रहा है, उसमें तो यह दादागिरी और पावर का नशा किस सीमा तक राज्य के इंटरेस्ट को बर्बाद कर रहा होगा, इसको केवल समझा ही जा सकता है.
सभी राजनीतिक दल गुड गवर्नेंस की बातें करते हैं. चुनावी वायदे भी करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत सत्ता के ऐसे अहंकार का ही प्रदर्शन करती है. पब्लिक तो सामान्यत: चुनाव में ही अपनी उपयोगिता साबित कर पाती है. सरकारी तंत्र को तो ऐसी मानसिकता से हर समय गुजरना पड़ता है अब तो यह समझना भी मुश्किल हो गया है, कि जो लोग निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेते हैं उनका लक्ष्य जनसेवा होता है या स्वयं की सेवा के लिए इतनी मेहनत करते हैं. राजनीति बहुत कठिन प्रोफेशन है. कोई भी एक्सपर्ट इसमें कम ही सफल हो पता है. ऐसे लोग इसमें सफल होते हैं जिनकी जनसेवा के योगदान को कोई याद नहीं रख सकता.
लॉ एंड ऑर्डर की जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन पर होती है. पुलिस से ज्यादा कठिन शायद कोई दूसरी सेवा नहीं होती. विधायकों का दबाव सबसे ज्यादा पुलिस पर ही होता है. पब्लिक भी पुलिस से ही सुरक्षा की अपेक्षा करती है. सरकार का गवर्नेंस भी पुलिस के कामकाज से ही स्थापित होता है. ऐसी घटनाएं कानून व्यवस्था की स्थिति पर सीधे सवाल खड़ा करती हैं. ज्यादातर मामलों में ऐसा लगता है कि पुलिस सत्ता के ताकत के साथ मिलकर ही अपना काम चलाने की कोशिश करती है. अगर कोई पुलिस अफसर अपने कर्तव्य के प्रति अडिग रहकर काम करना चाहे तो उसके लिए परिस्थितियां कठिनाई भारी ही रहेंगी.
यह बात केवल मध्य प्रदेश की नहीं है. ऐसी घटनाएं हर राज्य में होती रहती हैं. जहां विधायक और उनके परिवारजन अपने पावर का बेजा उपयोग करते पाए जाते हैं. पॉलिटिकल पार्टियां भी ऐसे जनप्रतिनिधियों से दूर नहीं हो पाती हैं. बाहुबल राजनीतिक ताकत और चुनावी जीत के लिए बहुत पुराना सक्सेस मंत्र माना जाता है. ऐसे आचरण से राजनीतिक दलों और सरकार की इमेज खराब होती है. चुनाव में जो सत्ता परिवर्तन होता है, सरकारों के खिलाफ जो एंटी इनकम्बेंसी होती है वह ऐसी घटनाओं से ही बनती है.
कांग्रेस कभी लंबे समय तक सत्ता का प्रतीक बनी हुई थी. अब तो कुछ ही राज्यों में उसकी सरकारें हैं. अब बीजेपी सत्ता की ताकत पर काबिज हो गई है. सत्ता बदलती रहती है सत्ता में रहते हुए जो इसका नशा संतुलन में रख सके, वही सफलता का पैमाना बन पाता है.
सत्ता का अहंकार तो रावण का भी नहीं चला. उसकी सोने की लंका को भी जलकर खाक होना पड़ा. फिर डेमोक्रेसी में किसी विधायक की तो कोई असली ताकत ही नहीं है. ताकत तो पब्लिक में है, उसको कुचलने की मानसिकता आत्मघात साबित होती है.