महिलाओं के खातों में नगद पैसा देकर चुनाव जीतने का फॉर्मूला भी बंगाल और तमिलनाडु में फेल हो गया. इसके पहले जिन भी राज्य सरकारों ने महिलाओं के बैंक खातों में नगद पैसे देने की योजनाएं लागू की थी वे चुनाव जीतने में सफल होती रही है. ऐसा पहली बार हुआ है कि नगद पैसे लेने के बाद भी महिलाओं ने ममता बनर्जी और एमके स्टॅलिन की पार्टी का साथ नहीं दिया..!!
महिलाओं को नगद राशि देने का ट्रेंड मध्यप्रदेश के चुनाव से शुरू हुआ था. शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना लागू कर नगद राशि खातों में देना प्रारंभ किया था. सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद बीजेपी चुनाव जीतने में सफल हुई थी. हालांकि चुनाव जीतने के बाद भी सीएम की कुर्सी शिवराज को नहीं मिली लेकिन उनकी योजना अभी भी प्रभावी ढंग से चल रही है. उसकी राशि भी बढ़ाई गई है. चुनावी घोषणा पत्र में बीजेपी ने इसे ₹3000 तक प्रति माह करने का वादा किया है. बीजेपी की रणनीति यही है कि अगले चुनाव से पहले योजना की राशि बढ़ाई जाए और आसानी से चुनाव जीत लिया जाए.
अब तक तो यह रणनीति सही दिख रही थी लेकिन बंगाल और तमिलनाडु के रिजल्ट ने इन योजनाओं के चुनाव जीतने की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए है. ममता की लक्ष्मी भंडार योजना का लाभ महिलाओं को मिल रहा था तमिलनाडु में DMK सरकार ने इस तरह की योजना में काफ़ी सरकारी धन लगया था. इसके बाद भी दोनों सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर चुनाव परिणाम में देखी जा सकती है.
मध्यप्रदेश के बाद जिन भी राज्यों में चुनाव हुए उनमें महिलाओं के लिए नगद पैसे देने की योजनाएं अहम साबित हुई है. महाराष्ट्र, हरियाणा दिल्ली और बिहार में भी महिलाओं के खाते में राशि डालकर चुनावी जीत का रिकॉर्ड कायम किया गया.
सवाल यह है कि बंगाल और तमिलनाडु में महिला हितेषी योजनाओं का लाभ सरकारों को क्यों नहीं मिला? इसका एक कारण यह हो सकता है कि बंगाल में बीजेपी ने महिलाओं को हर माह ₹3000 देने का चुनाव में वायदा किया है. ऐसा संभव है कि ममता की योजना का लाभ हासिल करते हुए भी महिलाओं ने यह भरोसा किया कि बीजेपी सरकार आने पर उनको बढ़ी हुई राशि मिलेगी.
महिलाओं के लिए सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है. बंगाल में जिस तरह से महिलाओं के खिलाफ अपराध और अत्याचार की घटनाएँ देखने में आई उससे माहौल बना कि ममता सरकार में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है इसलिए नगद पैसे की योजनाएं लागू करने के बाद भी ममता को महिलाओं का समर्थन कम हासिल हुआ है.
महिलाओं में राजनीतिक जागरुकता बढ़ रही है, महिला आरक्षण भी इस दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहा है. महिला रिजर्वेशन कानून से महिलाओं में बीजेपी ने अपनी पैठ बना ली है. परिसीमन के बाद महिला आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव के पहले लागू करने के लक्ष्य से बीजेपी ने लोकसभा में बिल पेश किया था जो DMK-TMC और कांग्रेस के विरोध के कारण पारित नहीं हो सका. बीजेपी ने इस मुद्दे को चुनाव में जोर शोर से उठाया था. इसका भी प्रभाव दिखाई पड़ता है जिसके कारण इन दोनों सरकारों की महिला हितैषी योजनाएं भी उनके फेवर में काम नहीं कर सकी.
फ्रीबीज़ योजना को लेकर किसी भी राजनीतिक दल को दूध का धुला नहीं माना जा सकता. पीएम नरेंद्र मोदी ने एक बार कहा था कि ऐसी योजनाओं के कारण राज्यों के बजट प्रभावित हो रहे हैं अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो सरकारों के लिए यह बड़े संकट का कारण बन सकते हैं. नीतिगत स्तर पर इस तरह की बातें भले की जाए लेकिन चुनावी राजनीति में बीजेपी भी फ्रीबीज़ योजनाओं का भरपूर उपयोग हर राज्य में करती है. बंगाल में भी अपने चुनावी संकल्प पत्र में बीजेपी ने महिलाओं के लिए कई योजनाओं का ऐलान किया है. अब सरकार बनने के बाद उन संकल्पों को पूरा करने में बीजेपी की सरकार को भी पसीना आएगा.
चुनाव परिणाम ने यह भी संदेश दिया है कि केवल फ्रीबीज़ योजनाओं से चुनाव नहीं जीता जा सकता. सबसे जरूरी गुड गवर्नेंस है. महिलाओं की सुरक्षा सबसे पहले है. मुफ्तखोरी की योजना राज्य की सरकारों को कर्जे में डालती जा रही हैं. अधिकांश राज्य सरकारों के हालात यह है कि वेतन और पेंशन के अलावा डेवलपमेंट के लिए केवल कर्ज पर ही आश्रित हैं. फ्रीबीज़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी मामला चल रहा है. अब तो जनादेश भी यह साबित कर रहा है कि केवल इसी के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता. इसलिए सभी राजनीतिक दलों को सामूहिक रूप से चिंतन मनन कर किसी रणनीति पर आगे बढ़ना होगा.
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए संस्थागत रूप से प्रयासों में भी सरकार का धन खर्च होता है लेकिन इसे व्यक्तिगत खातों में देकर राजनीतिक दल इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में चुनाव में भुनाने की कोशिश करते हैं. जिन सरकारों का सारा फोकस सरकारी बजट को ऐसी योजनाओं में उपयोग करने पर सिमटा हुआ है उन्हें रणनीति बदलने का समय है.
राजनीतिक दलों की फ्रीबीज से चुनाव जीतने की ममता बंगाल में हार गई है. ऐसी योजना की क्षमता अब जीत की गारंटी नहीं है. राजनीतिक दलों को बेहतर सरकार चलाने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए. केवल पैसे बाँटकर सत्ता में आना और पैसे-पैसे ही खेलना शायद एक्सपोज़ हो रहा है.
सरकारी बजट को निजी और पार्टी हित से ज्यादा जनहित में उपयोग करने की रणनीति सबसे भरोसेमंद बनाती है मुफ्तखोरी कर्महीनता बढाती है. कर्महीनता से राजनीतिक अर्थहीनता आएगी, समय कितना भी लगे लेकिन परिणाम यही होगा.