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आकांक्षाओं के उफान का मैनेजमेंट ही संगठन की पहचान, देखें वीडियो

सार

मध्यप्रदेश में बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं का पार्टी छोड़ने और कांग्रेस में शामिल होने का सिलसिला लगातार चल रहा है. चुनाव के समय ऐसा दलबदल आमतौर पर देखा जाता है लेकिन इस बार भाजपा से कांग्रेस में शामिल होने वाले नेताओं की रफ्तार पहले से ज्यादा दिखाई पड़ रही है.

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विस्तार

लंबे समय तक राज्य में शासन के कारण बीजेपी में आकांक्षा और अपेक्षा का उफान निराशा में बदलने की सीमा तक दिखाई पड़ने लगा है. कार्यकर्ता बीजेपी संगठन की ताकत माने जाते हैं. बीजेपी 365 दिन कार्यकर्ताओं को इंगेज रखने के लिए जानी जाती है. विधानसभा चुनाव के पहले एमपी में कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह के लिए कार्यकर्ता महाकुंभ राजधानी भोपाल में पार्टी आयोजित कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 सितंबर को बीजेपी महाकुंभ में कार्यकर्ताओं में जोश भरेंगे.

समर्पित कार्यकर्ता बीजेपी में ही पाए जाते हैं. बाकी राजनीतिक दल में तो कार्यकर्ता पार्टी के लिए नहीं नेता के लिए काम करते हैं. जब ताकत ही कमजोरी बनने लगे तो चिंतित होना स्वाभाविक है. बीजेपी का संगठन भी निश्चित रूप से चिंतित होगा. कार्यकर्ताओं और नेताओं के पार्टी छोड़ने की छुटपुट घटनाएं तो हमेशा होती हैं लेकिन इस बार परसेप्शन ऐसा बन रहा है जो बीजेपी के लिए निगेटिव दिखाई पड़ रहा है. बीजेपी संगठन का कार्यकर्ताओं के साथ कनेक्ट क्या कमजोर हुआ है? केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मध्यप्रदेश की कमान अपने हाथ में लेने के बाद जब भोपाल आए थे तब उन्होंने भी साफ संदेश दिया था कि पार्टी इस बात से अवगत है कि कार्यकर्ताओं में नाराजगी है.https://youtu.be/cdhF-QCyons

जो भी कार्यकर्ता और नेता बीजेपी छोड़ रहे हैं उनमें एक वर्ग ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आये नेताओं और कार्यकर्ताओं का है. कांग्रेस से अलग होकर सिंधिया का बीजेपी में विधायकों के साथ शामिल होना और बीजेपी की सरकार का गठन अभूतपूर्व घटना थी. यह तो भाजपा संगठन की ही ताकत थी कि पार्टी के तपे तपाए नेताओं के विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस से आए नेताओं को नेतृत्व का मौका दिया. बीजेपी में सिंधिया फैक्टर के कारण नाराजगी तो स्वभाविक मानी जा सकती है. इसके कारण दलबदल दूरगामी और राजनीतिक नुक़सानदेह साबित शायद नहीं हो. बीजेपी के लिए चिंता की बात पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं में उभरता असंतोष और नाराजगी होगी.

बीजेपी जब विपक्ष की राजनीति करती थी तब भी असंतोष की आवाजें आती जरूर थीं लेकिन संगठन उन आवाजों को नियंत्रित करने में सफल हो जाता था. सत्ता की राजनीति अहम और निराशा की बीज कही जा सकती है. आगे बढ़ने और चुनाव लड़ने के लिए हर सक्रिय कार्यकर्ता की इच्छा और आकांक्षा होना गलत नहीं है. पार्टी संगठन की सफलता की पहचान यही है कि कार्यकर्ताओं की आकांक्षा और आशा का रचनात्मक मैनेजमेंट करें जिससे कि असंतोष उभरकर पार्टी छोड़ने तक की स्थिति तक नहीं पहुंच पाए. विधानसभा प्रत्याशियों के चयन में असंतोष का जो दौर दिखाई पड़ा है वह भी भविष्य में बीजेपी के लिए चिंता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है.

बीजेपी में उमा भारती का पार्टी छोड़कर नई पार्टी बनाना सबसे बड़ी बगावत रही है. इस बगावत के बाद ऐसा माना जा रहा था कि पार्टी को चुनावों में बड़ा नुकसान होगा. इसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा. उमा भारती की बगावत के कारण बीजेपी को होने वाले चुनाव में नुकसान की संभावनाएं बाद में गलत साबित हुईं. चुनाव परिणाम ने यह साबित किया कि उमा भारती को जो सत्ता विरोधी मत मिले थे अगर वह कांग्रेस में चले गए होते तो बीजेपी को नुकसान सुनिश्चित था. इस फार्मूले पर बीजेपी से असंतुष्ट जो नेता कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं उसका बीजेपी को नुकसान होगा और कांग्रेस को फायदा होगा इसका विश्लेषण तो चुनाव परिणामों के बाद ही हो सकेगा.

इतना जरूर है कि परसेप्शन ऐसा बन रहा है कि नेता बीजेपी से इसलिए छोड़कर जा रहे हैं कि कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं ज्यादा उज्जवल हैं. इस परसेप्शन को तोड़ने के लिए बीजेपी संगठन को कार्यकर्ताओं और नेताओं को साधने की जरूरत है. जहां नेताओं और कार्यकर्ताओं के अहम और हित टकरा रहे हों वहां पार्टी सामंजस्य और समन्वय के प्रयासों से सफलता प्राप्त कर सकती है. प्रत्येक विधानसभा में चुनाव के लिए न्यूनतम पांच की संख्या में प्रत्याशी बराबरी के साथ उपलब्ध हैं. इन संभावित प्रत्याशियों की राजनीतिक और पैसे की ताकत भी समान ही देखी जा रही है. आंतरिक असंतोष और गुटबाजी कांग्रेस की पहचान मानी जाती है लेकिन अब बीजेपी भी उसका शिकार है.

पीएम मोदी का चेहरा कार्यकर्ताओं में जोश भरने के साथ बीजेपी के पक्ष में जनादेश को मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाता रहा है. बीजेपी के पास ‘मोदीशक्ति’ और ‘मोदीनियत’ की ताकत पार्टी के चुनावी शेयर के मूल्य बढ़ाने के लिए काफी है. बीजेपी संगठन को पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतोष को न्यूट्रलाइज करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहिए. संगठन का अनुशासन दिखाई पड़ना चाहिए. अनुशासन तोड़ने वालों को स्पष्टता के साथ पार्टीलाइन पर लाने में कोई कंजूसी नहीं होना चाहिए. अगर फिर भी नहीं मनाया जा सकता तो पूर्व अनुभव यही बताते हैं कि असंतोष का पार्टी के बाहर जाना ही ज्यादा लाभदायक साबित होता है.