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स्ट्रांग और लाउड हुए स्पीकर

सार

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ कांग्रेस का नो कॉन्फिडेंस मोशन वार का इंपैक्ट कांग्रेस को ही लहूलुहान कर गया. स्पीकर का रोल तो स्ट्रांग और लाउड ही साबित हुआ..!!

janmat

विस्तार

    संसद में पूरी बहस सरकार विरुद्ध राहुल गांधी दिखी. कांग्रेस ने जब यह वार शुरू किया था उस दिन ही इसका अंजाम पता था. स्पीकर पर हमला रेयर ही होता है. अब तक केवल तीन बार ऐसा हुआ है. हर बार नो कॉन्फिडेंस पराजित हुआ है. लोकसभा के कस्टोडियन की प्रतिष्ठा को घायल कर कांग्रेस अगर अपना राजनीतिक लक्ष्य साधना चाहती है तो यह पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी की हिस्ट्री और ट्रेडीशन पर नो कॉन्फिडेंस जैसा है.

    ओम बिरला पिछली लोकसभा के भी स्पीकर रहे हैं. पिछली और वर्तमान लोकसभा में सारे दृश्य पुराने ही हैं. सरकार का चेहरा भी वही है, बदलाव केवल यह कि पिछली लोकसभा में कोई LOP नहीं था. इस बार राहुल गांधी LOP हैं. जिस स्पीकर की निष्पक्षता पर पिछली लोकसभा में कोई गंभीर सवाल नहीं खड़ा हुआ था उस पर सबसे बड़ा आरोप राहुल गांधी को नहीं बोलने देने का लगाया गया. 

    राहुल गांधी पार्लियामेंट में नहीं बोलते हैं ऐसा तो नहीं है. यह बात जरूर है कि वे जब भी बोलते हैं तब लोकसभा में विवाद हो जाता है.आसंदी से नियम प्रक्रियाओं का हवाला दिया जाता है, उनके भाषण में टोका टाकी होती है. राहुल गांधी कांग्रेस के एकछत्र नेता हैं. जब भी उनके भाषण के समय टोका टाकी होती है तो कांग्रेस सांसद खुद ही हल्ला मचाने लगते हैं. 

    इस पर चर्चा करने का तो बहुत औचित्य नहीं कि नियम प्रक्रिया के अनुरूप आचरण में स्पीकर सही हैं, LOP सही हैं या सरकार का रोल सही है? संसदीय कार्यवाही में सांसदों और राजनीतिक दलों की यही कोशिश होती है कि उनका परफॉर्मेंस देश में सकारात्मक रूप से पहुंचे ताकि चुनाव में सत्ता तक पहुंचने में मदद मिले. सार यह है कि विपक्ष और सरकार दोनों के आचरण पर असली निर्णय जनादेश ही है. 

    संसद संवाद के लिए है. सरकार और विपक्ष में युद्ध के लिए नहीं. राहुल गांधी के LOP बनने के बाद ऐसे ऐसे घटनाक्रम हुए हैं जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी और उनके बीच कटुता के हालात पैदा हुए हैं. विपक्ष का संघर्ष सरकार की इमेज खराब करना उसको सत्ता से बेदखल  करना और खुद सत्ता हासिल करना ही है. खासकर कांग्रेस को सत्ता में आने और सत्ता से बेदखल होने का खासा अनुभव है. 

    केंद्र में हो चाहे राज्यों में हो, जिन सरकारों को चुनाव में हारना पड़ा है, उसके मुख्य कारण घोटाले के आरोप, कुशासन, जनहित से जुड़े महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दे रहे हैं. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का पतन करप्शन और घोटालों के आरोपों से ही हुआ था. राजीव गांधी की सरकार बोफोर्स घोटाले के आरोप से पराजित हुई थी. संसद में जिन विषयों पर राहुल गांधी स्पीकर से लड़ रहे हैं, वे मुद्दे ना जनता को प्रभावित करते हैं और ना उनका कोई चुनावी महत्व है. 

    स्पीकर के खिलाफ नो कॉन्फिडेंस लाने के पीछे जो कारण बने,उनमें पूर्व आर्मी चीफ की अप्रकाशित पुस्तक का राहुल गांधी द्वारा संदर्भ देने पर उत्पन्न विवाद और US-भारत डील जो फाइनल भी नहीं हुई है उस पर पीएम को कंप्रोमाइज्ड बता कर US के सामने सरेंडर होने का आरोप बड़ा कारण है. राहुल गांधी नो कॉन्फिडेंस की चर्चा में भी यही कहते रहे कि स्पीकर उन्हें बोलने नहीं देते हैं. एप्स्टीन फाइल्स और अन्य उन्ही सारे मुद्दों को वे दोहराते रहे. 

    जब तक एनडीए सरकार स्पीकर के साथ है तब तक उनका पद सुरक्षित है. विपक्ष अल्पमत में है फिर स्पीकर से टकराने का राजनीतिक आकलन जरूरी है. जिन मुद्दों पर स्पीकर के साथ टकराव हो रहा है, उन मुद्दों का जनहित से सीधा संबंध और चुनावी महत्व भी नहीं है. अब तक राहुल गांधी या कांग्रेस मोदी सरकार पर करप्शन का कोई भी गंभीर आरोप लगाने में सफल नहीं हुई है.

    नो कॉन्फिडेंस मोशन की चर्चा में सत्तापक्ष की ओर से राहुल गांधी पर जितनी बातें रिकॉर्ड पर लाई गई हैं वे भविष्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी. राहुल गांधी के विदेशी दौरों के आंकड़े और वहां उनके द्वारा कही गई देश विरोधी बातों को भी लोकसभा के रिकार्ड पर लाया गया. बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने तो यहां तक कहा कि राहुल गांधी ने 2014 के बाद अब तक 260 विदेशी दौरे किए हैं. गांधी परिवार का कोई व्यवसाय नहीं है. केवल किताबों से रायल्टी आती है. यह सारी विदेशी यात्राएं कैसे की गई हैं, इसका जवाब देश को मिलना चाहिए. उन्होंने तो लंदन में गांधी परिवार के घर को भी रक्षा सौदों के दलाल के साथ जोड़ा. 

    विपक्ष के आठ सांसद पूरे बजट सत्र के लिए सदन से निलंबित किये जा चुके हैं. जब स्पीकर के निर्णय और अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में भी चेलेंज नहीं किया जा सकता तो फिर राहुल गांधी इसे चैलेंज कर क्या हासिल करना चाहते हैं? यह समझ से परे है. नो कॉन्फिडेंस मोशन मूल रूप से राहुल गांधी और स्पीकर की टकराहट का परिणाम है. विपक्ष इसमें भले साथ हो लेकिन भाषणों में सभी सांसदों ने निजी तौर पर स्पीकर की सराहना ही की है. 

    नो कॉन्फिडेंस का छीछालेदर के बाद भी आसंदी पर स्पीकर वही होंगे. राहुल गांधी भी LOP रहेंगे. स्पीकर के निर्देश और नियम प्रक्रिया को LOP सहित हर मेंबर को मनाना ही पड़ेगा. नो कॉन्फिडेंस से स्पीकर की इमेज लाउड स्पीकर जैसी देश में फैल गई. 

    राहुल गांधी को अपने मुद्दों को जनता के बीच स्थापित करना होगा. मुद्दों की गंभीरता और जनहित के बीच में तालमेल करना होगा. नो कॉन्फिडेंस से तो स्पीकर का कुछ नहीं बिगड़ा, कांग्रेस ने भी इससे कुछ नहीं पाया. पाया तो कॉन्फिडेंस से जाता है, नो कॉन्फिडेंस तो नेगेटिव होता है.