राजनेताओं के खिलाफ चोर-चोर के नारे पहले कभी कभार ही सुनाई पढ़ते थे. चुनाव में ही ऐसे नारे भरते थे और परिणाम के बाद सब भुला दिया जाता था. सरकार से हटी पार्टियां भी अपनी गलतियों को भूलकर फिर नई राजनीति शुरू कर देती थीं..!!
जनता जनादेश देकर कुर्सी से उतार देती थी. लेकिन अब उसका गुस्सा इससे ही शांत नहीं हो रहा है. बंगाल में टीएमसी की करारी पराजय हुई. अब उनके जन प्रतिनिधियों पर पब्लिक अपना गुस्सा दिखा रही है. दो सांसदों अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी के खिलाफ जिस तरह से चोर-चोर के नारे लगे, वह लोकतंत्र के बदलते स्वरूप का संकेत है. अब वक्त आ गया है, कि चुनाव हारने के बाद भी सरकार में रहते हुए की गई गलतियों का खामियाजा नेताओं को भुगतना पड़ रहा है.
राजनीति इतनी विकृत हो गई है. नीति इसमें से गायब है. सिद्धांत का पता नहीं है. राज के लिए अराजकता और झूठ का सहारा घोषित एजेंडा बन गया है. संकट यह है, कि सोशल मीडिया के दौर में नेता की हर बात रिकॉर्ड मिल जाता है. अभिषेक बनर्जी पर हमले के बाद ममता बनर्जी यह कह रही हैं, कि राहुल गांधी ने उनको फोन किया. उन्होंने कहा कि अगर जरूरत होगी तो अभिषेक बनर्जी का इलाज हैदराबाद ले जाकर कराया जाएगा. यही राहुल गांधी बंगाल चुनाव प्रचार में यह कह रहे थे, टीएमसी ने गुंडागर्दी की है, एक समुदाय का पोलराइजेशन किया है, करप्शन किया है. इसके कारण राज्य में बीजेपी को घुसने का मौका मिल रहा है.
ममता बनर्जी ने राज्य के चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं दी. वह कभी भी इंडिया गठबंधन के साथ खड़ी नहीं हुईं और अब इस गठबंधन के साथ लड़ाई की बात कर रही हैं. विपक्ष के सारे दल उनके साथ खड़े होने का दावा कर रहे हैं. चोर-चोर के नारे के पीछे राजनेताओं का यही पाखंड और दोगलापन है. पब्लिक गलती से उतना ज्यादा नाराज नहीं होती जितना कि पाखंड और दोगलेपन से होती है. दलालों का कोई दल नहीं होता. जो भी सरकार में होता है दलाल उसके साथ रहते हैं. सरकार बदलने पर वही दलाल दूसरी जगह पहुंच जाते हैं. दलालों को सरकार के सारे रास्ते और संपत्तियों का पता होता है. करप्शन का पता होता है. ज्यादातर सरकारों में तो करप्शन की जांचों को उछाला नहीं जाता, क्योंकि हर सरकार उसी में अपना भविष्य देखती है.
बंगाल में अन्याय, अत्याचार और भ्रष्टाचार का चरम पहुंच गया. टीएमसी का सिंडिकेट और टोलेबाजी ने जनता को इतना आक्रोशित कर दिया कि केवल जनादेश से सरकार बदलने से वह संतुष्ट नहीं हो रही है. टीएमसी के उन चेहरों को वह दंडित करना चाहती है, जिन्होंने अन्याय किया है. सांसदों के लिए चोर-चोर के नारे लगने की प्रक्रिया जो बंगाल से चालू हुई है, वह रुकने वाली नहीं है. वह लोकतंत्र की पुकार बन जाएगी.
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि सेवा के लिए चुने जाते हैं. लेकिन जिस तरह से वह संपत्तियां बनाते हैं, गुंडागर्दी और दादागिरी से काम करवाते हैं, लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार करते हैं, वह अब बर्दाश्त के बाहर हो रहा है. सरकारों को चुनाव में बदल देने के बाद भी चेहरों को देखकरआक्रोश उभरता है.
अब तो राजनीतिक नीयत पर सवाल है. जो राजनेता बोलते हैं, उसकी विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल है. बंगाल में जनता चोर-चोर चिल्ला रही है. और दूसरी तरफ नेता जनता पर जनादेश की चोरी का आरोप लगा रही है. जन प्रतिनिधियों के लिए चोर-चोर के नारे किसी एक दल के लिए नहीं सभी राजनीतिक दलों के लिए खतरे का संकेत हैं.
लोकतंत्र ने पहले कभी नहीं देखा था, कि चुनावी पराजय के बाद राजनीतिक दल के खिलाफ़ चोर-चोर का नारा लगे. इलेक्शन कमीशन के खिलाफ सार्वजनिक सभा में चोर-चोर का नारा लगवाया गया. यह नारा भी कोई नई पार्टी नहीं बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के नेता लगवा रहे हैं. राहुल गांधी में तो बिहार में अपनी वोट अधिकार यात्रा में चुनाव आयोग के आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम लेकर नारे लगवाए. जो पब्लिक वोट डाल रही है उसको परिणामों पर पूरा भरोसा है. लेकिन जो पराजित हो रहे हैं वह पूरी चुनावी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
राजनीति विकास और नीतियों के लिए होती जब पार्टी और नेता खुद की संपत्ति के लिए इसका उपयोग करने लगें तो फिर उसे राजनीतिक दल नहीं बल्कि लोकतंत्र ठीक करेगा.
चोरी केवल धन की नहीं होती विचार की भी होती है. भरोसा भारत की संस्कृति है. राजनीति इस पर ही चोट कर रही है. राजनीति जो कहती है, करनी में पूर नहीं होता है. करप्शन फ्री गवर्नेंस कथनी है, लेकिन करनी उससे उल्टी है. शायद इसी कारण चोर-चोर के नारे लग रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में जो घटनाक्रम हो रहा है उस पर भी राजनीति होने लगी है. यह कहा जाने लगा कि इन घटनाओं के पीछे बीजेपी का हाथ है. बीजेपी को तो जो मिलना था वह मिल गया. जनता ने उन्हें प्रचंड बहुमत दे दिया. उनकी सरकार बन गई. उनको अगर कोई एक्शन भी करना है तो पूरी कानूनी प्रक्रिया उनके हाथ में है. वह नियम-कानून के अंतर्गत टीएमसी और उनके नेताओं को एक्सपोज़ कर सकते हैं.
ममता बनर्जी जब वकालत के लिए हाई कोर्ट पहुंचती हैं, तब कोर्ट परिसर में भी चोर-चोर के नारे लगते हैं. यह सब यही बता रहा है कि टीएमसी के गवर्नेंस ने लोगों को इतना प्रताड़ित कर दिया कि अब पब्लिक मुखर होकर सामने आ रही है.
सबसे अविश्वसनीय क्षेत्र राजनीति बन गया है. यह अविश्वसनीयता लोकतंत्र के लिए खतरा है. सिस्टम के लिए खतरनाक है. अब तो यह लगने लगा है कि लोकतंत्र के रक्षक ही भक्षक बन रहे हैं.
राजनीतिक नीयत पर पब्लिक का दबाव बढ़ रहा है. राजनीतिक अराजकता अब टिक नहीं पाएगी. अगर इसे सुधारा नहीं गया तो फिर लोकतंत्र तो इसे सुधार ही देगा.