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सिस्टम का अंधड़ बातों का बतंगड़

सार

मध्य प्रदेश में सरकार और विपक्ष का बतंगड़ नीतियों पर नहीं बातों पर सिमट गया है. कांग्रेस खुद को सत्ता की पार्टी मानती है. विपक्ष उसे रास नहीं आता. विपक्ष भी शैडो केबिनेट होता है. राज्य को लेकर उसकी भी नीति और कार्यक्रम होते हैं. सरकार की नीतियों की जब आलोचना होती है, तब विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह उनका विकल्प भी सामने रखें..!!

janmat

विस्तार

    विकल्पहीन आलोचना ना तो पब्लिक को प्रभावित करती है और ना ही राज्य के विकास की दिशा को निर्धारित करने में कोई भूमिका निभाती है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस चुनावी राजनीति में सिमटती जा रही है. कांग्रेस का राज्य में कोई भी एमपी नहीं है. ताजा राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस टाइट रेस में है. कैंडिडेट देखकर वफादारी और बगावत की चर्चा सार्वजनिक है. कांग्रेस में संगठन दिल्ली से लगाकर भोपाल तक बिखरा हुआ है. सीएम उम्मीदवार बहुत हैं, लेकिन समर्पित वर्कर खोजना मुश्किल है. बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट में नेता अपनी फॉलोइंग बताने में लगे हुए है.

    वैसे तो राज्य में पक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन ही दिखाई पड़ता है. तीन साल की सरकार हो गई है. केवल सतही बयानबाजी के अलावा कोई गंभीर मुद्दा या जन आंदोलन विपक्ष की ओर से खड़ा नहीं किया जा सका. ना सिस्टम के फेल्योर के, ना ही करप्शन के कोई प्रमाणित मामले कांग्रेस उजागर करने में सफल हुई है. कांग्रेस अपने आंतरिक दबाव में ही उलझी हुई है. सीएम मोहन यादव अपनी सरकार चलाने में व्यस्त हैं.

    ताजा मामला सीएम और पीसीसी प्रेसिडेंट के बीच बयानों में टकराव और शब्दों की टूटती मर्यादा से जुड़ा हुआ है. जीतू पटवारी राज्य में वैसा ही करने की कोशिश कर रहे हैं, जैसा की राष्ट्रीय स्तर पर उनके नेता राहुल गांधी कर रहे हैं. राहुल गांधी पीएम नरेंद्र मोदी को गद्दार कहते हैं, तो पीएम प्रतिक्रिया नहीं देते. लेकिन जीतू पटवारी सीएम को अभिनंदन लाल कहते हैं, तो वह उन्हें टपोरी लाल कहने से नहीं चूकते. तीन साल में पहली बार मोहन की बांसुरी की आवाज थोड़ी बेसुरी सुनाई पड़ रही है. 

    जो भाजपा अपने को पार्टी विद डिफरेंस बताती है, वह अपनी भाषा, जुबान और शैली पर तो ज्यादा सतर्क रहती है. पहली बार राजनीतिक भाषा में बेसुरापन दिखाई पड़ रहा है. इसकी चर्चा भी इसलिए हो रही है कि इस तरह की उम्मीद भाजपा नेताओं से नहीं की जाती. कांग्रेस में तो यह पार्टी के भीतर ही होता रहता है. वहां तो बगावत और एक दूसरे के खिलाफ अमर्यादित शब्दों का उपयोग कांग्रेस की परंपरा रही है.

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है, कि सीएम को पीसीसी प्रेसिडेंट के खिलाफ इतने कठोर शब्दों का उपयोग क्यों करना पड़ा? अगर प्रदेश अध्यक्ष ने उनको अभिनंदन लाल कह दिया था तो यह ऐसा शब्द नहीं था कि इसकी प्रतिक्रिया में वह सब कहा जाए जो जीतू पटवारी को लेकर कहा गया. चुनाव में हार-जीत लगी रहती है. ना जीत किसी की अनंत होती है और ना हार किसी का अंत.

    प्रशंसा, आलोचना हमेशा परफॉर्मेंस और नीतियों के लिए होना चाहिए. चुनाव में पराजित कोई व्यक्ति कोई अच्छा विचार नहीं रख सकता ऐसा तो नहीं माना जा सकता. राजनीतिक पंडित यही समझने की कोशिश कर रहे हैं, कि सीएम मोहन यादव ने इतनी गंभीर प्रतिक्रिया देकर जीतू पटवारी की बयान बाजी की राजनीति को क्यों हवा दी है. 

    सरकार बनाना चलाना इसका नेतृत्व करना सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य होता है. नेतृत्व किसी को चुनता है तो यही माना जाएगा कि उसने योग्यता को आंका है. जहां तक संगठन का प्रश्न है तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि बीजेपी का संगठन कांग्रेस से मीलों आगे है.

    कांग्रेस में परिवारवाद और व्यक्तिवाद हावी हो सकता है. लेकिन बीजेपी संगठन और फीडबैक पर ही काम करती है. पर्ची सीएम राजनीतिक मजाक के लिए कहा जा सकता है लेकिन कोई पार्टी बिना मेरिट के कोई भी चयन नहीं करती है. इसकी ज्यादा संभावना कांग्रेस में ही दिखाई पड़ती है. विधानसभा में पराजय के बाद जब जीतू पटवारी को पीसीसी प्रेसिडेंट बनाया गया था, तब इसे राहुल गांधी की पर्ची नियुक्ति कहा जा रहा था.

    कांग्रेस में वह वायरस खत्म नहीं हुए हैं, जिसमें फंसकर कमलनाथ की सरकार का पतन हुआ था. राष्ट्रपति के चुनाव में भी कांग्रेस के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी. राज्यसभा में भी क्रॉस वोटिंग का डर देखा जा सकता है. यह कांग्रेस में ही हो सकता है. नेता हाई कमान में यह स्थापित कर रहे हैं कि अगर उनको टिकट मिलेगा तो क्रॉस वोटिंग की संभावना बिल्कुल नहीं होगी.

    पद पर बैठे व्यक्ति के लिए उसकी भाषा, शब्दावली और बोली पर सदैव सचेत रहने की जरूरत है. किसी भी नेता की विश्वसनीयता उसकी परफॉर्मेंस के साथ ही उसकी भाषा और बोली से भी स्थापित होती है. सरकार के पक्ष वाले दल पर यह ज्यादा जवाबदारी है कि वह मर्यादा और शिष्टाचार की सीमाओं में आचरण करे. विपक्ष तो किसी भी तरह काआरोप लगा सकता है. देश में इस समय विपक्ष की विश्वसनीयता लगातार घट रही है. विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी जिस तरह की भाषा और शब्दावली का उपयोग कर रहे हैं उसका नुकसान विरोधियों को नहीं उनको खुद को हो रहा है.

    विपक्ष का सुर बेसुरा हो सकता है, लेकिन सरकार के मुखिया से मिठास की ही उम्मीद होती है. मोहन की बांसुरी तो मंत्रमुग्ध करने के लिए जानी जाती है. उसमें से बेसुरे सुर सबकों चौंकाते हैं . बातों का बतंगड़ छोड़कर सिस्टम से ऐसे सुर निकलें कि सबको सुकून महसूस हो.