आरक्षण ज्वलंत विषय है. गैर आरक्षित वर्गों के साथ ही आरक्षित वर्ग भी आरक्षण की समानता से वंचित हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट लगातार यही संदेश दे रहा है, कि शोषितों, वंचितों के लिए लागू आरक्षण की व्यवस्था मूल उद्देश्यों पर खरी उतरना चाहिए..!!
आरक्षित वर्गों के संपन्न परिवारों को भी आरक्षण का लाभ मिलने पर संविधान की वह मंशा ही पूरी नहीं होगी. जो वंचित लोगों को आरक्षण देकर बराबरी के साथ आगे लाना चाहती है.
ओबीसी रिजर्वेशन में क्रीमी लेयर की व्यवस्था इसी उद्देश्य से लागू है. न्याय यह चाहता है कि आरक्षण उस परिवार को मिले जो उसका वास्तविक हकदार है. सुप्रीम कोर्ट ओबीसी में क्रीमी लेयर पर सुनवाई करते हुए अपनी चिंता व्यक्त करता है. कोर्ट ने सवाल किया कि यदि किसी उम्मीदवार के माता-पिता ऊंचे पदों पर जैसे दोनों आईएएस अधिकारी हैं, तो फिर उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए. यदि संपन्न परिवारों को लगातार आरक्षण मिलता रहा तो आरक्षण का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट इससे ज्यादा क्या कह सकता है.
कानून निर्माताओं के सामने यह चुनौती है कि वह आरक्षण की व्यवस्था इस तरह से क्रियान्वित करें, कि संपन्न परिवारों को उसका लाभ नहीं मिले. इसका सीधा मतलब है कि आरक्षण वर्ग के लिए नहीं है, गरीब, शोषित और वंचित के लिए है. यह समानता के लिए है और गैर बराबरी को दूर करने के लिए है.
ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था है. क्रीमी लेयर के कारण इस वर्ग की बहुत बड़ी संपन्न आबादी ऐसी है जिसको इसका लाभ नहीं मिलता है. एक तरफ आरक्षित वर्गों के बीच से ही यह आवाज उठती है कि इस वर्ग के संपन्न लोगों को इस लाभ से वंचित किया जाए. तो दूसरी तरफ ओबीसी वर्ग में यह मांग उठती रहती है कि एससी-एसटी के समान इस वर्ग के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था लागू की जाए. जैसे एससी एसटी में क्रीमी लेयर नहीं है. वैसे ही ओबीसी में भी क्रीमी लेयर नहीं होना चाहिए.
इसी तरह की मांगों पर भी सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी है कि अगर आरक्षण संपन्न परिवारों को मिलता रहा तो उसका मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा. इसका मतलब है, कि ओबीसी में क्रीमी लेयर की व्यवस्था पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ लागू होने का जरूरत है. इसमें आय के साथ ही समाज में परिवार की स्थिति और संपन्नता का भी आंकलन किया जाना चाहिए. इसी प्रकार की व्यवस्था एससी-एसटी वर्ग में भी प्रभावशील करने की जरूरत आरक्षित वर्ग से ही महसूस की जा रही है.
अगर आरक्षित वर्गों के गरीब लोगों को आरक्षण सुनिश्चित होगा तो उससे आरक्षण की व्यवस्था ना केवल सफल होगी, बल्कि उसके संपन्न परिवार इसका लाभ लेकर दूसरे लोगों को उससे वंचित नहीं कर सकेंगे. क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू होने से आरक्षण में कोई अंतर नहीं आएगा.
आरक्षण जिन वर्गों पर लागू है. उन वर्गों के ही गरीब लोगों को इसका लाभ सुनिश्चित होगा. क्रीमी लेयर नहीं होने से आरक्षित वर्गों के शिक्षित और संपन्न परिवार ज्यादा तादाद में उसका लाभ लेने में सफल होते रहे हैं. ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं, जहां आरक्षित वर्गों के कुछ खास परिवार हैं. बड़ी-बड़ी नौकरियों में काबिज़ हैं. एक ही परिवार के कई-कई आईएएस, आईपीएस और पीसीएस अफसर मिल जाएंगे.
जबकि दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग की ही बड़ी आबादी ऐसी है जो नौकरी की तलाश में भटक रही है. यह विमर्श अब लगातार जोर पकड़ता जा रहा है, कि आरक्षण की व्यवस्था को न्यायपूर्ण ढंग से लागू किया जाए.
आरक्षण राजनीति का बहुत बड़ा हथियार बन गया है. कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण पर कोई भी कदम उठाने से परहेज करता है. यहां तक कि सरकारें इसकी समीक्षा के लिए तैयार नहीं होती, कि उसका लाभ समाज के भीतर कहां तक पहुंच रहा है.
कोई यह बात नहीं कह रहा है कि आरक्षण समाप्त किया जाए या कम किया जाए. समाज के गरीब वर्गों को इसका लाभ सुनिश्चित किया जाता है तो इससे गैर आरक्षित वर्गों को कोई लाभ नहीं होगा. आरक्षण तो उन्हीं वर्गों को मिलेगा जिन पर वह लागू है. सवाल केवल इतना है, कि आरक्षित वर्गों में संपन्न परिवारों को बार-बार आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट इसी बात पर जोर दे रहा है. यह बात ना केवल तार्किक है बल्कि न्याय संगत भी है .
ओबीसी में तो क्रीमी लेयर लागू है. इसे पूरी सख्ती से लागू रहना चाहिए. एससी-एसटी वर्ग में भी संपन्न परिवारों को आरक्षण से दूर करने की प्रक्रिया पर विचार करने का वक्त है. यद्यपि सुप्रीम कोर्ट इस बारे में पहले ही कदम उठा चुका है. एससी-एसटी रिजर्वेशन के अंतर्गत कोटे में कोटे की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर कई राज्यों में लागू कर दी गई है. इसके अंतर्गत आरक्षण को आरक्षित वर्गों में ही प्रमुख जातियों के बीच उनकी जनसंख्या के अनुपात में बांटा जा सकता है.
आरक्षण का लाभ लेकर जो लोग बड़े-बड़े पदों पर पहुंच गए हैं. एक तरह से उस वर्ग के नाम पर उन संपन्न परिवारों की प्रशासनिक और राजनीतिक ताकत बनी है. अपने समाज के नाम पर इस ताकत का यह वर्ग हमेशा उपयोग करता है. नैतिकता तो यही कहती है,कि आरक्षित वर्ग के जो परिवार इसका लाभ लेकर एक बार आगे आ चुके हैं, उन्हें स्वेच्छा से उसे छोड़ने की पहल करना चाहिए.
राजनीति से अपेक्षा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ही आरक्षण का न्यायपूर्ण और समानतापूर्वक वितरण सुनिश्चित करने के लिए सहायक हो सकता है. आरक्षण के मामले में अब तक जो भी व्यवस्था लागू है, वह सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्शन पर ही चल रही है.
आरक्षित वर्गों के संपन्न परिवारों को आरक्षण से अलग करने की न्यायपूर्ण व्यवस्था भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर ही लागू हो सकती है. न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन न्याय को लंबे समय तक रोका नहीं जा सकता.