क्या हुआ जब एक विदेशी ने एक महर्षि की परीक्षा लेनी चाही?

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क्या हुआ जब एक विदेशी ने एक महर्षि की परीक्षा लेनी चाही?

महर्षि रमण जब समस्त भ्रम रूपी पड़ाव को पार कर ब्रह्म से एकाकार हुए तो हर प्राणी में उन्हें ब्रह्म का ही साक्षात्कार दिखने लगे और सारी सृष्टि ब्रह्म स्वरूप हो गयी।

उस नूतन दृष्टि में किसी के लिए कोई द्वेष, भिन्नता, विषमता शेष नही बची रही।सभी के लिए आदर प्रेम और भक्ति प्रकट हो गयी।उनका हृदय ब्रह्मांड सा विराट हो गया।वो सृष्टि को ही ब्रह्म और सृष्टि में सभी जीवों को उसी ब्रह्म के रूप में देखते थे।हर प्राणी उनके लिए ईश्वर स्वरूप ही थे और अपना सारा जीवन जीव सेवा अर्थात ईश्वर सेवा में ही काट दिया।ये होता है ब्रह्म साक्षात्कार, जिसमें दृष्टि ब्रह्म स्वरूप हो जाती है।

उनके दौर में धर्म परिवर्तन की होड़ सी लग गयी थी।बहुत सारे ईसाईयों और अन्य धर्मों एवं पंथो के कई व्यक्ति महर्षि के ज्ञान एवं व्यक्तित्व से काफ़ी प्रभावित थे।क्यूँकि वो स्वयं धर्म स्वरूप थे उनकी मुख से धर्म और ज्ञान की वास्तविक स्वरूप और शब्द प्रकट होते थे।जो अलख निरंजन स्वरूप हैं, जिन्हें सुनकर भटके राही और तृष्णा में जलते भक्त स्वतः उस आकर्षण में बँधे चले जाते थे।

उस दौर में ईसाइयत ज़ोर शोर से सारे विश्व में फैली थी।भारत में भी और इस धर्म अथवा पंथ से जुड़े बहुत सारे लोग महर्षि के शरण में चले गए थे। निरंतर चले ही जा रहे थे।तब उस धर्म के कुछ संरक्षकों, पादरियों और धर्म गुरुओं ने आपस में वार्ता कर एक निष्कर्ष निकाल, कि ये व्यक्ति शायद हमारे धर्म के लोगों को बहला फुसला कर सनातन धर्म में परिवर्तित कर रहा है।

वो सभी को ये बोलता हैं कि मैं ईश्वर को जानता ही नहीं अपितु हर रोज़ उससे मिलता हूँ।सभी को भी ईश्वर का साक्षात्कार करवाने का दावा करता है।या तो ये कोई धर्म परिवर्तन करवाने वाले संगठन का हिस्सा है या बहुरूपिया।इसलिए उससे जाकर मिला जाए और जो लोगों को ईश्वर साक्षात्कार करवाने का दावा करता हैं उसे परखा जाए।लोगों के सामने उसकी पोल खोली जाए।

एक दिन सभी पादरी और धर्म गुरु मिल कर महर्षि के कुटी पर पहुँचे। वो भक्तों और शिष्यों के भीड़ से भरी हुई थी और महर्षि सिर्फ़ एक धोती पहने नंगे शरीर एक कुर्सी पे बैठे थे।तभी उनमे से एक पादरी महोदय ने उनसे सवाल किया

सवाल:- आपने ईश्वर को देखा हैं? उनका साक्षात्कार किया है? जैसा कि आप दावा करते हैं?

महर्षि का जवाब :- हाँ बिलकुल देखा है, हर रोज़ देखता हूँ ईश्वर को और उनसे मिलता भी हूं। उनकी सेवा भी करता हुँ और तुम्हें भी मिला सकता हूँ।

सवाल:- ईश्वर देखने में कैसे लगते हैं उनका क्या रूप है? क्या रंग है ज़रा खुल कर बताए? और हमें भी दिखाएं?

ईश्वर को हम भी अपनी आँखो से देखना चाहता हँ

जवाब :- कल आना मैं तुम्हें भी ईश्वर का साक्षात्कार करवा दूँगा ।

अगले दिन सभी तय समय पर ये सोच कर महर्षि के कुटी पे पहुँच गए कि आज इस ढोंगी का पर्दाफ़ाश होगा।

उन्हें मालूम हुआ की महर्षि किसी कार्य से बाहर गए हैं उन्हें थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा। उनसे मिलने हेतु सभी बहुत समय तक वहीं उनका इंतज़ार करते रहे, परंतु बहुत समय बीत जाने के उपरांत भी जब वो नहीं आए तो सभी को लगा महर्षि का भपाखंड ख़त्म होने वाला है।इसीलिए महर्षि सामने आने से क़तरा रहे हैं मूर्ख अज्ञानी और बेचारे भी ।

तभी उन्हें सामने से महर्षि आते दिखे और फिर वो उनके सामने आ गए फिर से वही सवाल ईश्वर कहाँ हैं? और आपने आज उनसे मिलाने का वादा किया है, तभी महर्षि मुस्कुराये और उन्हें अपने पीछे आने को बोला, कुछ आगे जाकर उन्हें एक झोपड़ी की ओर इशारा कर बताया कि ईश्वर इस झोंपड़ी के अंदर हैं और मैं उन्ही की सेवा में पिछले कई घंटे से लगा हुआ था। इसलिए माफ़ी चाहता हूँ मुझे विलम्ब हो गया।

सभी कौतुहल से उस झोपड़ी की ओर देखने लगे और कुछ पादरी और धर्म गुरु उस झोंपड़ी के अंदर प्रवेश किए और ये क्या ?

उन्होंने देखा एक वृद्ध व्यक्ति जिसे कुष्ठ रोग था, उसके सारे शरीर से सड़ने की बू आ रही थी, पूरे शरीर पे मलहम पट्टी लगी थी जो महर्षि रमण थोड़े देर पहले कर के गए थे।बस ये देखना था कि सभी की आँखें नमः हो गयी।हृदय रूपांतरण हो गया, और वो सभी पादरी एवं अन्य और धर्मगुरु के हृदय में महर्षि रमन के लिए अनंत श्रद्धा उमड़ पड़ी।द्रवित होकर उनसे माफ़ी माँगी और सभी ने एक ही शब्द बोला “आपका ईश्वर ही सत्य हैं” और उस दिन से वो सभी उनके सिद्धांत, ज्ञान और रास्ते को धारण कर उनके अनुयायी और शिष्य बन गए।


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