NIMADI TRADITION : ध्रुव देव या कांकड़ देव, जिला-बड़वानी

ध्रुव देव या कांकड़ देव जिला-बड़वानी

NIMADI TRADITION-Newspuranकांकड़ निमाड़ी शब्द है, जिसका अर्थ होता है गाँव अथवा नगर की सीमा। इसलिए गाँव या नगर की सीमा पर जो देव स्थापित होता है, उसे कांकड़ देव कहते हैं। माना जाता है कि जिस प्रकार घर की दहलीज का स्थान अटल व ध्रुव होता है, उसी प्रकार गाँव की सीमा भी ध्रुव तारे की भाँति अटल होती है। इसलिए गाँव की सीमा की रक्षा करने वाले देव को ध्रुव देव या कांकड़ देव कहते हैं। इनका मन्दिर नहीं होता है। गाँव की सीमा पर यदि खुला स्थान है तो खुली जगह पर ही स्थापित कर देते हैं या फिर कोई वृक्ष हो, उसके नीचे किसी बड़े पत्थर को गाड़कर उसे सिन्दूर लगाकर स्थापित करते हैं। पत्थर को गाड़ते इसलिए हैं कि सीमा को इधर-उधर खिसका न सके। वैसे तो कांकड़ देव को सदा सिन्दूर से पूजा करके लोग नारियल चढ़ाते ही रहते हैं, परन्तु वर्ष में एक बार वर्षा ऋतु की बोवनी के बाद गाँव समुदाय के रूप में पूजा करने जाता है। इनकी पूजा के दिन

ग्रामवासी आपसी सहयोग से सुबह से ही गाँव के सभी देवी देवताओं की पूजा करते हैं। नारियल फोड़े जाते हैं, तत्पश्चात दोपहर बाद ग्रामीण गाँव पटेल के घर एकत्र होते हैं। तब पटेल अपने सिर पर ज्वार माता की टोकरी और पटेलन हाथों में पूजा की थाल तथा सिर पर पानी का घड़ा रखकर चलती है। सबसे आगे गाँव की भजन मण्डली लोकगीत गाते चलती है, उसके पीछे पटेल-पटेलन तथा इनके पीछे सारा जनसमुदाय इन्द्रदेव की जय कहते हुए चलता रहता है। गाते-बजाते और जयकारों के साथ गाँव की सीमा पर पहुँचते हैं। जहाँ पर पटेल अपनी पत्नी के साथ कांकड़ देव की पूजा करता है। पहले पानी चढ़ाता है, फिर पंचामृत उसके बाद सिन्दूर का लेपन फिर पूजा-आरती करते हैं। नारियल चढ़ाते हैं। उस समय बड़वों के शरीर में देवों के भाव आ जाते हैं। जो वर्ष की पूर्व घोषणा करते हैं कि इस वर्ष कितनी वर्षा होगी। अन्त में नारियल का प्रसाद वितरण करके वापस गाते-बजाते पटेल के घर पूजा का समापन करते हैं।

ध्रुव पूजा (कांकड़ पूजा) का एक निमाड़ी लोकगीत पाणी बिना केय जीव संसार। हरि तम सुणजो करुण पुकार।। सरग छीर सागर पौढ़ीया। सबई जगा का पालनहार।। तमक कमी होय तो झेलो। हमरा ढोला नसी दुई-दुई धार ।। जल बिन जीव तीरण बिन गोधन। झूटी-झूटी रया सब नर नार।। उड़ता पंछी अकाश म। उड़ी रया पर पसार।।

केऊ रूठिया तम इंदरराजा। का मन में सोच विचार।। ऐरावत बठीन वादा लावजो। करी जाजो वर्षाद धुवाधार ।।

हे भगवान! हमारी करुण पुकार सुनों। पानी के बिना यह संसार नहीं चल सकता है। आप तो स्वर्ग को छोड़कर क्षीर-सागर में आराम कर रहे हो। यदि सागर में भी आपको जल कम लगे तो हमारे अश्रु ले लेना। सारे प्राणी जल के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। आकाश की ओर वर्षा हेतु टकटकी लगाये बैठे हैं। हे इन्द्र ! आप रूठे क्यों हो? हमें क्षमा करो। अपने ऐरावत पर बैठकर आओ और धुआंधार वर्षा कर जाओ। सारे प्राणियों के साथ धरती की भी प्यास मिटा जाओ।


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