स्टोरी हाइलाइट्स
प्रत्येक स्त्री का सबसे बड़ा सपना होता है माँ बनना । जब यह सपना साकार हो जाता है यानि जब वह नन्हे मासूम की हँसी, मुस्कान, कुपोषण
अपने बच्चे को कुपोषण से बचायें .आपकी अनदेखी उनकी जान पर भारी पड़ सकती है ।
प्रत्येक स्त्री का सबसे बड़ा सपना होता है माँ बनना। जब यह सपना साकार हो जाता है यानि जब वह नन्हे मासूम की हँसी, मुस्कान, उसकी शैतानियों, मस्ती आदि क्रियाएँ देखती है तो उसके आनन्द की सीमा नहीं रहती। वह अपने को पूरा-पूरा महसूस करती है।
हर एक माँ यही चाहती है कि उसकी बगिया के फूल हमेशा स्वस्थ रहें और हँसते खिलखिलाते रहें। इसके लिये पूरा परिवार दिन-रात प्रयत्नशील रहता है, परन्तु कई बार अज्ञानतावश या फिर साधनों के अभाव में हम अपने नन्हे मासूमों को असमय ही खो बैठते हैं, क्यों?
बच्चे फूल की तरह नाजुक और कोमल होते हैं। इसलिये उनकी देखभाल हमें जबसे वह गर्भ में आते हैं, तभी से जरूरी होती है। देखभाल में जैसे साफ-सफाई, रहन-सहन, आचार-विचार और महत्वपूर्ण बात होती है उनके पोषण की क्योंकि कुपोषण (Malnutrition) से आज भी लगभग 10% बच्चे असमय अपना जीवन खो देते हैं।
यद्यपि एन्टी-बॉयोटिक्स के आविष्कार ने बहुत से संक्रामक रोगों पर विजय प्राप्त कर ली है। रोगों की गंभीरता तथा उसकी अवधि में कमी ला दी है तथापि कुपोषण(Malnutrition) आज भी विकासशील राष्ट्रों की सबसे बड़ी समस्या है। भारत में कुपोषण(Malnutrition) की स्थिति भयावह है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अत्यंत चिन्ताजनक है।
कुपोषण(Malnutrition) के कई कारक तत्व है जैसे- अशिक्षा, अज्ञानता, बेरोजगारी, गरीबी, कम उत्पादन, , भोज्य पदार्थों की कमी, उपलब्धि क्रय शक्ति का कम होना, अत्यधिक जनसंख्या, भोजन का असमान वितरण, संरक्षण एवं संग्रह के अपर्याप्त एवं अनुपयुक्त तरीके, अकाल, बाढ़, युद्ध आदि। ये सभी किसी न किसी रूप में कम या अधिक मात्रा में हर एक देश में व्याप्त रहते हैं। विकासशील भारत में भी स्थिति यही है।
दुनिया में उथल-पुथल का कारण बच्चों के गलत पालन-पोषण में छुपा है
प्रश्न यह है कि कुपोषण(Malnutrition) क्या है? जब किसी भी व्यक्ति के द्वारा लिया गया भोजन मात्रा व पोषक तत्वों की दृष्टि से शरीर की आवश्यकता के अनुरूप नहीं हो तो परिणामस्वरूप पोषणहीनता जनित रोग देखे जाते हैं, इसे ही कुपोषण(Malnutrition) कहा जाता है।
पोषणहीनता जनित रोगों से तात्पर्य है पोषक तत्वों की कमी से होने वाले रोग। इसमें प्रोटीन, कैलोरी, विटामिन्स एवं खनिज लवणों की पर्याप्त मात्रा शरीर के भाग के अनुरूप नहीं ली जाती है, जिससे इनकी कमी के कारण कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं, इसे ही कुपोषण(Malnutrition) कहा जाता है।
विश्व में अविकसित एवं तीसरी दुनिया के देशों में जिसमें भारत भी एक है, प्रोटीन+कैलोरी, कुपोषण(Malnutrition) जनस्वास्थ की सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या है। यही कारण है कि इन राष्ट्रों के करीब 25% बच्चे पाँच वर्ष की आयु पूर्ण करने तक जीवित नहीं रहते हैं।
कुपोषण (Malnutrition) प्रायः पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में अधिक देखा जाता है। केवल प्रोटीन की गंभीर कमी से क्वाशियोरकर नामक रोग होता है, जो मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में पाया जाता है। जबकि प्रोटीन एवं कैलोरी दोनों की कमी से जो रोग होता है उसे मराश्मस कहा जाता है। यह कस्बों एवं बड़े शहरों में ज्यादा देखा जाता है।
बच्चों पर ज्यादा गुस्सा न करें, इससे बच्चे की मानसिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है
शरीर में पोषक तत्वों का संग्रह भी आवश्यकता से अधिक या आवश्यकता से बहुत कम रहता है जिसके कारण शरीर में विभिन्न कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं। बच्चे की शारीरिक वृद्धि (बाढ़) रूक जाती है। मानसिक वृद्धि रूक जाती है अर्थात् बच्चे की मानसिक आयु कम हो जाती है। मांसपेशियाँ छोटी व ढीली हो जाती हैं।
शरीर पर वसा की तह कम या बहुत अधिक हो जाती है। शरीर में सूजन आ जाती है। सूजन पहले पैरों व टांगों के निचले हिस्से में होती है, फिर जांघ तथा चेहरे तक फैल जाती है। त्वचा सूखी, झूरियों वाली पीली हो जाती है। जबड़े व दाँत अस्वस्थ लगते हैं। बाल सूखे व चमकहीन हो जाते हैं।आँखें कान्तिहीन हो जाती हैं। आँखों में जलन व खुजली होती है। भूख कम हो जाती है। अधिकतर अपचन रहता है। बच्चा थका, कमजोर और निरूत्साहित रहता है। बच्चा चिड़चिड़ा, भयभीत और उदासीन रहता है। बच्चे के शरीर में खून की कमी हो जाती है।
बच्चों में कुपोषण (Malnutrition) न हो इसके लिए कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
बच्चे को छः माह की आयु से ही तरल या अर्द्ध ठोस पदार्थ जैसे- दाल का पानी, सब्जियों का सूप, पतली खिचड़ी, उबला मसला हुआ आलू, रोटी की पपड़ी आदि देना शुरू कर देना चाहिए।बच्चों के भोजन में अंकुरित अनाजों का समावेश किया जाना चाहिए।
बच्चे का पेट छोटा होने के कारण जल्दी खाली हो जाता है, अतः बार-बार भोजन देना चाहिए। बच्चे को उसकी शारीरिक माँग के अनुसार पौष्टिक तत्वों युक्त भोजन देना चाहिए। हरी सब्जियाँ बच्चे कम पसन्द करते हैं अतः भोजन में किसी न किसी रूप में हरी सब्जियों का उपयोग अवश्य होना चाहिए।
बच्चा एक ही तरह का भोजन करने से ऊब जाता है, उसे अलग-अलग प्रकार का भोजन देना चाहिए। समूह में बच्चा अच्छी तरह भोजन करता है, अतः परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उसे भोजन देना चाहिए। बच्चों को नियमित रूप से समय पर भोजन देना चाहिए। भोजन के समय में अनियमितता पाचक रसों पर कुप्रभाव डालती है।
बच्चों को फास्ट फूड से दूर रखना चाहिए। बच्चों को तले और मिर्च मसाले वाले भोज्य पदार्थ नहीं देना चाहिए क्योंकि तलने से पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। निम्न वर्ग में कुपोषण(Malnutrition) अधिक देखा जाता है, अत: इस वर्ग में सस्ते पौष्टिक पदार्थों के उपयोग की शिक्षा स्त्रियों को दी जानी चाहिए जैसे-दलिया, छिलका दाल की खिचड़ी, फलीदा, गलाया हुआ चना, उबला आलू आदि।
गर्भवती स्त्रियों के पोषण पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि एक कुपोषित माँ कुपोषित बच्चे को जन्म देती है। अतः गर्भवती स्त्रियों को सन्तुलित व पौष्टिक आहार नियमित दिया जाना चाहिए। इन बातों को ध्यान में रखने के साथ-साथ बच्चों को अपना पूर्ण स्नेह, प्यार व पर्याप्त समय भी दें।
हमारी छत्र छाया में पलने-बढ़ने वाले इन बच्चों पर देश का उज्ज्वल भविष्य निर्भर है। हम इन भावी कर्णधारों के द्वारा अपने राष्ट्र का भविष्य सँवार हैं इसलिए बच्चों को बचपन से ही शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनायें। उनके खानपान का विशेष ध्यान रखें। बच्चों को शुरू से पौष्टिक आहार दें।
बच्चों को पौष्टिक आहार के महत्व के बारे में बतायें। यदि बच्चा सब्जियाँ नहीं खाता है तो उन्हें अन्य तरीके जैसे मैथी के पराठे, पूरी, मटर के तरह-तरह के व्यञ्जन, पालक-टमाटर का सूप, गाजर का हलवा आदि स्वादिष्ट भोजन बनाकर बच्चों की रूचि बढ़ा सकते हैं।
कुपोषण(Malnutrition) की समस्या शहरों की अपेक्षा गाँवों में ज्यादा देखने में आती है। इसका प्रमुख कारण अशिक्षा है, जो कि अनेक समस्याओं की जड़ है, यदि मनुष्य शिक्षा के महत्व को जान जाये तो कुपोषण(Malnutrition) तो क्या देश की हर गंभीर समस्या से हम आसानी से लड़ सकते हैं।
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