दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करना

दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करना

चन्द्रभान नाम का एक राजा था। उसका बहुत विस्तृत राज्य था राजा की यश कीर्ति चारों ओर फैली थी। राज्य दिन दुगनी रात चौगनी तरक्की कर रहा था। प्रजा बड़े अमन चैन से थी। राज्य में कभी उपद्रव नहीं होते थे। उसी राज्य के बराबर में एक दूसरा छोटा सा राज्य था। यहां के राजा का नाम कृष्णकांत था। उसके राज्य में आये दिन लड़ाई-झगड़े होते रहते थे। पूरे राज्य में आतंक का बोलबाला था। प्रजा सदैव दुखी रहती थी। राज्य की आर्थिक स्थिति भी ठीक न थी। इस सब कारणों से राजा कृष्णकांत बहूत परेशान रहता था।



एक दिन कृष्णकांत चन्द्रभान के राज्य में आया। चन्द्रभान ने कृष्णकांत का खुले दिल से स्वागत किया तथा भोजनादि के पश्चात यह कृष्णकांत को राज्य की सैर कराने ले गया।

कृष्णकांत ने की चन्द्रभान के राज्य में चारों ओर खुशहाली है हर नागरिक प्रसन्न तथा संतुष्ट नजर आ रहा है इस पर कृष्णकांत को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने चन्द्रकांत से कहा-"मेरा राज्य छोटा सा है, किन्तु आये दिन लड़ाई झगड़े होते रहते हैं। प्रजा असन्तुष्ट रहती है तथा मेरा मन भी दुखी रहता है, जबकि आपका राज्य इतना विस्तृत है, किन्तु फिर भी प्रजा सुखी है। इसका क्या कारण है? चन्द्रकांत ने मुस्करा कर उत्तर दिया-"आप ठीक कहते हैं, मेरे राज्य में वड़ा अमन चैन है, इसका कारण ये चार चौकीदार हैं जो हर समय मेरी रक्षा करते हैं। यह सुन कर कृष्णकांत को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने पूछा-"केवल चार चौकीदारों से आप इतने बड़े राज्य की रक्षा कैसे कर सकते हैं? जबकि मेरे पास तो चौकीदारों की पूरी फौज है फिर भी इसका कोई फायदा नहीं होता। मेरे राज्य में फिर भी अशान्ति है।"

यह सुन चन्द्रभान हंसा और बोला-"मेरे चौकीदार दूसरी तरह के हैं।" कृष्णकांत ने पूछा- "कैसे ?" चन्द्रकांत ने उत्तर दिया-"पहला चौकीदार है 'सत्य । यह मुझे असत्य बोलने नहीं देता, और जिस राज्य में सत्य का बोलबाला हो राजा असत्य वचन न कह कर सत्य का साथ देता है, वहां दुख कैसे हो सकता है?"

"और दूसरा चौकीदार " कृष्णकांत ने पूछा।

चन्द्रभान ने कहा- "दूसरा चौकीदार है प्रेम। वह मुझे प्रजा से घृणा करने से बचाता है। इसी प्रेम के बल पर मैंने प्रजा के हृदय को जीत रखा हैं। इसी के आधार पर मेरे पूरे राज्य में प्रेम की गंगा बहती है। जिस राज्य का राजा अपनी प्रजा से प्रेम करने वाला होगा, उस राज्य की प्रजा भी अपने राजा से प्रेम करेगी और आपका तीसरा चौकीदार कौन है?" कृष्णकांत ने उत्सुक होकर पूछा।

"मेरा तीसरा चौकीदार है न्याय । यह मुझे अन्याय करने से बचाता है प्रजा की तया राज्य की सुख शान्ति के लिये राजा को न्याय का साथ देना आवश्यक होता है। जिस राज्य के राजा में न्याय करने की क्षमता नहीं होती, उस राज्य में सुख-शांति हो ही नहीं सकती।" चन्द्रभान ने बताया अब कृष्णकांत का उत्साह और बढ़ गया था और उसने चौथे चौकीदार के विषय में पूछा।

चन्द्रभान ने बताया-"मेरा चौथा चौकीदार है त्याग ही त्याग है जो मुझे स्वार्थी बनने से रोकता है मैें स्वार्थ का त्याग कर प्रजा की भलाई के कार्यों में लगा रहता हूं। जिस राज्य का राजा स्वार्थी होता है उस राज्य में सदैद आर्थिक संकट रहता है। राजा प्रजा की भलाई न सोच कर सदैव अपने खजाने भरने में लगा रहता है।"

अब कृष्णकांत की समझ में आ गया था कि चन्द्रभान के राज्य की उन्नति का रहस्य क्या है। उसकी शंका का समाधान हो गया था वह प्रसन्नतापूर्वक अपने राज्य लौट गया।

सीख-जिस राजा के सत्य, प्रेम, न्याय और त्याग जैसे चौकीदार होते हैं वह सर्वश्रेष्ठ होता है उसे कोई भी चिन्ता नहीं होती। उसका राज्य और राज्य की प्रजा 'दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करती है।"


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