मध्यप्रदेश के लोकनाट्य 1- जाने मध्य प्रदेश तीन लोक नाट्य परंपरा का समृद्ध इतिहास..


स्टोरी हाइलाइट्स

लोकनाट्य परपरा में मध्यप्रदेश की खासियत यह है कि यह उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा जैसे संपन्न सांस्कृतिक परंपराओं वाले प्रांतों के बीच में स्थित है।

क्या है लोकनाट्य परंपरा? मध्य प्रदेश की लोक नाट्य परंपराएं.. 

लोक नाट्य की परंपराएँ सारे देश में विभिन्न अंचलों में शताब्दियों से चली आ रही हैं। इनमें कुछ सामान्य विशेषताएं हैं, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत मूल्यबोध और जीवन दृष्टि को उजागर करती है। इसके साथ ही हर अंचल में प्रचलित लोकनाट्यों की अपनी विशेषताएँ हैं, जो उस अंचल के भूगोल, जातीय परंपरा, रहन सहन और रीति रिवाजों को व्यक्त करती हैं। 

जनसाधारण से जुड़ाव, निम्न मध्यवर्ग या आदिम जनजातियों की जीवन पद्धतियों की प्रतिच्छवि, आनुष्ठानिकता या मंगलभावना, आनंद और रंजन तथा भारतीय दिक्काल बोध की संक्रांति ये सामान्य विशेषताएँ सभी लोकनाट्यों में देखी जा सकती है। इसके साथ ही आउंबर विहीन सादा मंच, गीत और नृत्य की प्रधानता, आशुरचना या अभिनेताओं की तात्कालिक सूझ, दर्शकों की नाट्य प्रस्तुति में सहभागिता या अभिनेताओं का सीधे दर्शकों को संबोधित करना, स्थानीय बोलियों का प्रयोग, रंजन तत्वों हास्य व्यंग्य, चुटीले संवाद ये लोकनाट्यों की अपनी खूबियाँ हैं। लोकनाट्य भारतीय कृषिप्रधान संस्कृति से जन्मे हैं। अभिजात या नागर रंगमंच के बरक्स ये सहजता के सौंदर्य को प्रस्तुत करते हैं।

लोकनाट्य परपरा में मध्यप्रदेश की खासियत यह है कि यह उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा जैसे संपन्न सांस्कृतिक परंपराओं वाले प्रांतों के बीच में स्थित है। अतः इसकी लोकनाट्य परंपराओं में राजस्थान के खयाल, गुजरात के भवइ, महाराष्ट्र के तमाशा और उड़ीसा के नृत्य नाटयों की छवियाँ भी देखी जा सकती हैं, और इसकी अपनी जमीन भी पहचानी जा सकती है।

लोक नृत्यों से अंतःसंबंध:

नृत्य और गायन की प्रधानता के कारण अनेक नृत्य ऐसे हैं, जो नाट्य की शक्ल भी अख्तियार कर लेते है। ख्याल, नौटंकी, स्वांग, भगत, हरिकीर्तन, राई, बरेदी नृत्य, डंडा, सुआ नृत्य, अहिरा नाच, गोंचा नृत्य, करमा नृत्य आदि मध्य प्रदेश के विभिन्न अंचलों में किये जाने वाले लोक नृत्य है, जिनसे लोकनाट्य किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। बुंदेलखंड के राई को बुन्देली लोक संस्कृति के प्रसिद्ध अध्येता डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त ने लोकनाट्य ही माना है। इसी तरह संगीत की प्रधानता सभी लोकनाट्यों में होती है।

लोकगीत, कथाकथन और कथा गायन तथा लोकनाट्य:

लोकगीतों का लोकनाट्यों से गहरा संबंध रहा है। बुंदेलखंड में दिवारी गीत, सखयाऊ फागें, लमटेरा, देवी के गीत, राधरे गीत आदि नृत्य और नाट्य से संपर्क के साथ विकसित हुए। कजरियन को राखरी जैसे राछरे गीत अपने आप में अत्यंत नाटकीय है, जिनमें बहन की कजरियाँ खाँटने की रक्षा में भाइयों के द्वारा वीरता पूर्वक युद्ध करने का आख्यान निरूपित होता है। 

प्रकृति की गाथा के आधार पर लोक कथाओं का विकास अनेक अंचलों में हुआ। गाथा के दो रूप बुंदेलखंड में विकसित हुए गहनई और महाकाव्यात्मक गाथा। दूसरे प्रकार की गाथा का उत्तम उदाहरण आल्हा काव्य है। लोककथा और लोकगाथा का घनिष्ठ संबंध लोकनाट्यों से रहा है। लोक नृत्यों की ही तरह कथाकथन और कथा गायन के अनेक रूप ऐसे हैं, जो नाट्य प्रस्तुतियों की शक्ल भी अख्तियार कर लेते हैं। 

लोककथा तथा लोकगाथा दोनों में हुंकारा देने वाला आवश्यक होता है। बुंदेलखंड में आल्हा, रैया पंवाड़ो या पवारों, बसदेवा, जगदेव का पुँआरा तथा हरदौल नाटकीय कथागायन की विधाएँ हैं। कथक या गाथागायक अभिनय के साथ ही कथा या गाथा को प्रस्तुत करता है। अत एवं कथा या गाथा का प्रस्तुतीकरण अपने आप में नाटकीय हो जाता है। 

नीमाड़ में गाथा की दो परंपराएँ हैं- वाचिक और लिखित। वाचिक परंपरा की गाथाओं में काठी नृत्याख्यान भिलनो बाल, गोंडेन नार, हरिचंद और सुरियालो महाजन ये प्रचलित रही हैं। इनमें पहली तीन पौराणिक है, और सुरियालो महाजन में अकाल और भुखमरी - का कारुणिक चित्रण होता है। ढोला मारू, चंद्रावली, कुदई राणा, काजल राणी, सुदबुद सालंगा, भरवरी, गोपीचंद, रामायण व महाभारत, श्रवणकुमार, तोता मैना आदि की गाथाएँ भी नीमाड़ में प्रचलित हैं। इनमें से सुदबुद सालंगा, भरथरी आदि अनेक गाथाएँ ऐसी हैं, जो लोकनाट्यों में भी खूब मंचित होती है विशेषता मालवा के मार्च में ये बड़ी लोकप्रिय हैं।

लिखित गाथाओं में सरिता को ब्याव, लिखा को तलाव, हालू कवि की रची महाभारत गाथा, समत सिंगाजी की रची गाया अभिमन्यु का ब्याह तथा सुभद्राहरण आदि, भादवदासकृत नरसिंगकथा, दलुदास की रुखमणी का व्याह फकीरनाथ की गऊलीला, भिलनीचरित, मतीलीला आदि भी नीमाड़ में गाई जाती रही हैं। कलंगी तुर्रा विधा में भी अनेक रचनाएँ प्रस्तुत होती रही हैं। बघेलखंड में भरथरी, ढोला (राजस्थान का ढोलामारू), सरमन, बसामन मामा, करन दानी आदि लोकगाथाएँ प्रचलित हैं। मालवा में तुर्रा कलंगी लोक गायकी का नाटकीय रूप है।

कथा गायन के अनेक रूप प्रदेश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित रहे हैं। इनमें बुंदेलखंड में आल्हा; बुंदेलखंड, महाकौशल और बघेलखंड के कुछ जनपदों में बसदेवा गायन, सरवन लोक कथा (श्रवण कुमार की कथा) जिस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं, वह अपने आप में नाट्यात्मक होता है। 

छत्तीसगढ़ का अन्य लोकनाट्य है हरेली। हरेली के उत्सव में हरियाली की पूजा होती है और घर घर के द्वार पर पेड़ों की डालियां सजाई जाती है। इसी तरह का एक नृत्य मूलक नाट्य बुंदेलखंड में प्रचलित काडरा है। काडरा के गायक प्राय: निर्गुनिया भजन गाते हैं, और बीच बीच में संवाद भी बोलते हैं। इन संवादों में किसी कथानक के ताने बाने भी आ जुड़ते हैं।

छत्तीसगढ़ की ही एक अन्य गायन शैली है चंदैनी। इसमें कि चंदा की कथा गाई जाती है। गायन के साथ साथ नृत्य भी होता है। एक ही व्यक्ति सारे पात्रों और कथा की सारी दुनिया को प्रस्तुत कर देता है।

प्रदेश के प्रमुख लोकनाट्य:

प्रदेश के विभिन्न अंचलों में कई लोकनाटय प्रचलित हैं। इनमें से उल्लेखनीय है

मालवा माच, कलंगी-तुर्रा, नकल तथा स्वांग, नीमाइ गम्मत, काठी, रास मंडल, रामलीला, स्वांग बुंदेलखंड नौटंकी, स्वांग, नकल, रामलीला 3, बघेलखंड छार मनसुखा, हिंगाला, लकड़बग्धा, नक्काई, सतपुड़ा अंचल डंडहार, तमाशा, गम्मत, खड़ानाच।

इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ में प्रचलित नजरिया नाच, मुंशी-मुंशाइन आदि भी लोकप्रिय नृत्य नाट्य हैं। इनमें छोटे छोटे रोचक प्रसंगों और चुटीले चुभते संवादों के द्वारा गायक नर्तक नाट्य प्रस्तुति देते हैं। मध्यप्रदेश से आसपास के प्रदेशों में प्रचलित लोक नाटयों से इन परंपराओं का संवाद रहा है।

नौटंकी, स्वांग, रासलीला तथा रामलीला उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय रहे हैं। गम्मत छत्तीसगढ़ के अनेक क्षेत्रों में भी प्रचलित है। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ का नाचा, खड़ोसाज का नाचा, रहस, विहाव आदि लोकनाट्यों का साम्य लीला नाटयों या स्वांग के साथ देखा जा सकता है।

बस्तर के अंचल में भतरा नाट और माओपाटा आदिवासियों की अपनी धरोहर हैं। मध्यप्रदेश के लोकनाट्यों की विशेषता इनकी समावेशी प्रकृति और पारस्परिकता है। तुर्रा-कलंगी ने अनेक लोकनाट्य रूपों को प्रभावित किया है, माच तो आसपास प्रचलित अनेक लोकनाट्य रूपों से विभिन्न तत्त्व ले कर परिपूर्ण होता गया है।


 

पुराण डेस्क

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