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84 महादेव परिक्रमा 11वीं कड़ी, सिद्धेश्वर महादेव : स्वार्थ के युग में निस्वार्थ सिद्धि का शाश्वत संदेश

सार

अहंकार से ऊपर उठकर धैर्य, समर्पण और आत्मविश्वास की साधना, जहाँ प्रत्येक शिला, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक परिक्रमा-पथ मानव को आत्मबोध की ओर अग्रसर करता है, इसी दिव्य परंपरा की एक अनमोल कड़ी है 84 महादेव परिक्रमा—जिसमें ग्यारहवें क्रम पर प्रतिष्ठित हैं सिद्धेश्वर महादेव..!!

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विस्तार

महाकाल की नगरी उज्जयिनी केवल तीर्थों का समूह नहीं है, यह भारतीय चेतना, सनातन दर्शन और जीवन-मूल्यों की जीवंत प्रयोगशाला है। जहाँ प्रत्येक शिला, प्रत्येक मंदिर और प्रत्येक परिक्रमा-पथ मानव को आत्मबोध की ओर अग्रसर करता है। इसी दिव्य परंपरा की एक अनमोल कड़ी है 84 महादेव परिक्रमा—जिसमें ग्यारहवें क्रम पर प्रतिष्ठित हैं सिद्धेश्वर महादेव।

भेरूगढ़ क्षेत्र में, सिद्धनाथ मंदिर के मुख्य द्वार के समीप स्थित सिद्धेश्वर महादेव का मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि आत्मिक साधना और जीवन-दर्शन का सशक्त प्रतीक है। यह वह स्थल है, जहाँ शिव केवल आराध्य नहीं, बल्कि गुरु बनकर साधक को यह सिखाते हैं कि सिद्धि का मार्ग बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता से होकर जाता है।

पुराणों में वर्णित एक अत्यंत सारगर्भित कथा के अनुसार, देवदारु वन में अनेक विद्वान ब्राह्मणों ने सिद्धि-प्राप्ति के उद्देश्य से कठोर तपस्या आरंभ की। किसी ने निराहार व्रत अपनाया, किसी ने वर्षों तक कठिन आसनों में साधना की, तो किसी ने शास्त्रीय अनुष्ठानों का सहारा लिया। किंतु दीर्घकालीन तप के बाद भी जब अपेक्षित फल नहीं मिला, तो निराशा ने उनके मन में शंका और असंतोष का बीज बो दिया।

धीरे-धीरे यह तप स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और अहंकार से ग्रस्त हो गया। साधना ईश्वर-प्राप्ति का साधन न रहकर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ बन गई। तभी आकाशवाणी हुई—जिसने उन्हें आत्मावलोकन का संदेश दिया। उस दिव्य वाणी में कहा गया कि-“स्वार्थ, ईर्ष्या, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ और मोह से की गई साधना कभी सिद्धि प्रदान नहीं करती। सच्ची सिद्धि केवल निस्वार्थ समर्पण और शुद्ध भाव से ही प्राप्त होती है।”

आकाशवाणी के निर्देश पर तपस्वियों ने महाकाल वन में वीरभद्र के समीप स्थित एक शिवलिंग की आराधना आरंभ की। जब साधना से स्वार्थ और अहंकार का त्याग हुआ, तब उन्हें वांछित सिद्धि प्राप्त हुई।

मान्यता है कि इसी शिवलिंग की कृपा से सनकादिक देवताओं, राजा वामुमन, राजा हाय, कृतवीर्य तथा अरुण जैसे अनेक साधकों को दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। तभी से यह शिवलिंग “सिद्धेश्वर महादेव” के नाम से प्रसिद्ध हुआ—अर्थात् वह शिव, जो निस्वार्थ साधना को सिद्धि प्रदान करते हैं।

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर का महत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। यहाँ आने वाला भक्त भौतिक इच्छाओं की पूर्ति से अधिक आत्मविश्वास, मानसिक स्थिरता और जीवन में संतुलन की कामना लेकर आता है।

यह मंदिर सिखाता है कि—

अहंकार प्रगति का सबसे बड़ा अवरोध है। निस्वार्थ कर्म ही स्थायी फल देता है,कृष्णपक्ष की अष्टमी और चतुर्दशी को यहाँ दर्शन की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन में नियम, अनुशासन और संयम अपनाने का प्रतीक मानी जाती है।

आधुनिक युग में सिद्धेश्वर महादेव की प्रासंगिकता

आज का युग त्वरित सफलता, दिखावे और निरंतर तुलना का युग बन चुका है। विशेषकर युवा वर्ग सोशल मीडिया की आभासी उपलब्धियों के दबाव में मानसिक तनाव, असंतोष और आत्मसंशय से जूझ रहा है।

ऐसे समय में सिद्धेश्वर महादेव की कथा यह संदेश देती है कि—

सफलता की दौड़ बाहर नहीं, भीतर से शुरू होती है। निरंतर प्रयास, आत्मसंयम और आत्मविश्वास ही वास्तविक उपलब्धि हैं।

दूसरों से आगे निकलने की होड़ नहीं, स्वयं से बेहतर बनने की साधना आवश्यक है।

यह स्थल बताता है कि सिद्धि कोई चमत्कार नहीं, बल्कि आत्मविजय का परिणाम है।

सिद्धेश्वर महादेव के दर्शन के पश्चात् भक्त केवल प्रसाद लेकर नहीं लौटता, वह एक नया दृष्टिकोण लेकर लौटता है। यह मंदिर जीवन के उस सत्य से परिचित कराता है, जहाँ भौतिक उपलब्धियों से अधिक आत्मिक शांति, मानसिक संतुलन और सकारात्मक दृष्टि का महत्व है।

सिद्धेश्वर महादेव मंदिर यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म कोई जड़ परंपरा नहीं, बल्कि समय के साथ चलने वाला जीवन-दर्शन है।निस्वार्थ साधना, धैर्य, आत्मविश्वास और विनम्रता—यही सिद्धेश्वर महादेव का शाश्वत संदेश है।इसी कारण सदियों बाद भी यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि मानव जीवन के मूल्यों का प्रकाश स्तंभ भी है।