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आर्थिक नीतियों पर बीजेपी कांग्रेस साथ-साथ

सार

राजनीतिक बयानों में भले ही आर्थिक नीतियों पर बीजेपी और कांग्रेस अलग दिखाई पड़ती हों, लेकिन दोनों की नीतियां एक जैसी रही हैं. ग्लोबलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन कांग्रेस की शुरुआत है. बीजेपी भी इसी पर चल रही है..!!

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विस्तार

    इसीलिए केवल राजनीतिक आलोचना की जाती है, लेकिन दोनों दलों की राज्य सरकारें अपने राजस्व में कोई कमी नहीं करना चाहती. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को महंगाई बम बताया जाता है, लेकिन कांग्रेस की राज्य सरकारें भी इस पर टैक्स कम नहीं करतीं. पेट्रोल डीजल को जीएसटी में लाने का कांग्रेस विरोध करती है. अगर इसको इसमें शामिल किया जाता है, तो राज्यों का टैक्स घटकर आधा हो जाएगा और कीमतें बढ़ने के बाद भी नागरिकों को पुराने रेट पर ही पेट्रोल-डीजल मिल सकेगा.

    यूपी का सबसे बड़ा चुनाव बीजेपी के सामने है. कीमती बढ़ने का नुकसान हो सकता है फिर भी विश्वव्यापी युद्ध संकट के कारण भारत पर आए इस संकट का कोई समाधान दिखाई नहीं पड़ रहा है. केंद्र सरकार को बार-बार कीमतें बढ़ाने से बेहतर है, कि एक बार वर्तमान परिस्थितियों और आने वाले छः माह के अनुमानों के आधार पर कीमतों में बढ़ोत्तरी कर दी जाए. तेल कंपनियों को मुनाफा कमाने का भले ही मौका नहीं मिले लेकिन भारत सरकार को पेट्रोल-डीजल और गैस की राष्ट्रीय समस्या के समाधान के लिए उनके विकल्पों पर ज्यादा से ज्यादा निवेश करने की तरफ आगे बढ़ना चाहिए. 

    महंगाई, बेरोजगारी और करप्शन तब तक मुद्दा नहीं बनता जब तक यह सारी सीमाएं ना तोड़ दे. सामान्य रूप से इन सब पर जनभावनाएं स्पष्ट हैं. हर नागरिक सिस्टम में अपने कार्य के लिए भ्रष्टाचार को शिष्टाचार जैसा स्वीकार करने लगा है. आमदनी बढ़ेगी तो महंगाई भी बढ़ेगी. देश की परिस्थितियां भले बदलती रहें लेकिन राजनीति की भाषा आरोप-प्रत्यारोप दशकों से एक स्वरूप में ही चल रहे हैं. उनमें कोई बदलाव नहीं आता. एक ही विषय पर बीजेपी और कांग्रेस दोनों अलग-अलग राज्यों में एक-दूसरे को घेरने में जुट जाती हैं.

    सबसे ताजा उदाहरण बंगाल में मुख्य सचिव की नियुक्ति और केरलम में कांग्रेस के मुख्यमंत्री द्वारा सचिव के पद पर नियुक्ति का है. यह दोनों अधिकारी नए पदों पर आने के पहले अपने-अपने राज्यों में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का दायित्व निभा रहे थे. पहले बंगाल में सरकार बनी तो वहां के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को मुख्य सचिव बना दिया गया. राहुल गांधी ने तुरंत एक पर पोस्ट कर इस नियुक्ति पर सवाल खड़ा किया. उन्होंने कहा भाजपा और ईसी के चोर बाजार में जितनी बड़ी चोरी उतना बड़ा ईनाम. उनका सीधा आरोप मुख्य सचिव बनाए गए अफसर सीईओ के रूप में बीजेपी की वोट चोरी में मदद की और इसका ईनाम उन्हें मुख्य सचिव के पद के रूप में मिला. 

    राहुल गांधी की इस थ्योरी का केरलम में बीजेपी और वामपंथी से जवाब मिला. कांग्रेस के नए मुख्यमंत्री ने वहां सीईओ के रूप में काम कर रहे अफसर को अपना सचिव बनाया. तो वही आरोप बीजेपी ने लगाया कि अफसर को चुनावी चोरी का इनाम दिया गया है. जबकि दोनों अपने-अपने राज्यों के कैडर की सीनियर आईएएस हैं. वरिष्ठता में नियुक्ति की प्रक्रिया में उनको नए पद दिए गए हैं. इसका चुनाव प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है, लेकिन फिर भी दोनों दल एक-दूसरे पर एक जैसा ही आरोप लगा रहे हैं. ऐसा ही महंगाई के मामले में भी हो रहा है.

    यह उसी तरह से है जैसे यूपीए की सरकार में जब पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ीतो तेल कंपनियों को बॉन्ड देकर पैसा जुटाया गया. कीमतें नहीं बढाई गईं. यह रणनीति अंततः देश के लोगों को ही भुगतना पड़ी. उस सरकार के समय भले नहीं इसका असर दिखा लेकिन बाद में डेढ़ लाख करोड़ के बाॉन्ड का तीन लाख करोड़ से ज्यादा भुगतान तेल कंपनियों को करना पड़ा. यह पैसा भी अंततः तेल की कीमतों के रूप में जनता की जेब से ही निकला है.

    आर्थिक नीतियों पर राजनीति नारों में नहीं हो सकती, यह नीति के गुण और दोष पर हो सकती है. यूपीए की सरकार के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह दुनिया के बड़े अर्थशास्त्री थे. उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए जो भी नीति और रणनीति अपनाई उसके कारण भारत की इकोनॉमी का साइज जितना बड़ा हुआ था, वह पिछले एक दशक में दोगुना हो गया है. यह तो नहीं कहा जा सकता, कि नीतियों में गड़बड़ी के कारण अर्थव्यवस्था को कोई नुकसान हुआ है, उसका आकार तो बढ़ा है, प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है. महंगाई की दर भी घटी है. कुछ संकट ऐसे होते हैं जो सरकारों की सीमा और प्रबंधन से ऊपर होते हैं. देश के सामने पैदा हुआ संकट इसी श्रेणी में आता है.

    राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी दल इस संकट को भुनाने के लिए जितनी राजनीति करेंगे, वह उनके खिलाफ ही दूरगामी प्रभाव डालेगा. सोशल मीडिया के जमाने में अंतर्राष्ट्रीय बारीक से बारीक जानकारी गांव-कस्बों तक पहुंचने में देर नहीं लगती है. सबको सब कुछ पता होता है. अडानी-अंबानी को एक आइकन के रूप में पीएम मोदी और सरकार के साथ राहुल गांधी जोड़ते रहे हैं. उनका कोई भी संबोधन बिना इन दोनों नाम के पूरा ही नहीं होता है. अगर नीतिगत स्तर पर उनका कोई फेवर किया जा रहा है, इसमें कोई लेन-देन हो रहा है, तो फिर इसको उजागर करना नेता विपक्ष की नहीं तो किसकी जिम्मेदारी है. सरकारी ठेकों और खरीदी में घोटालों का लंबा इतिहास है, लेकिन इनको उजागर भी किया गया. देश के लोगों में उस पर सरकारों का पतन भी किया. केवल इन पर नारे लगाने से तो कुछ भी नहीं हो सकता. अर्थव्यवस्था फैक्ट्स पर चलती है. उस पर कोई भी सवाल फैक्ट्स के आधार पर ही हो सकता है. 

    महंगाई का बम है, इसको डिफ्यूज़ करने का दम भी भारत ने हमेशा साबित किया है. महंगाई डायन पर राजनीति भी संतुलन से ही हो सकती है. नहीं तो यह डायन किसी को भी डस सकती है. जब देश पर संकट हो, तब देश के साथ खड़े रहना ही राजनीति की पहली शर्त है. कब बोलना, कब चुप रहना यह संतुलन किसी भी नेता की सक्सेस का फार्मूला होता है.