मुस्लिम वफादारी पर क्षेत्रीय दलों की लंबरदारी खत्म होने होते देख राहुल गांधी ने अपना दावा पेश कर दिया है. टीएमसी, डीएमके और आरजेडी की पराजय के बाद अब केवल अखिलेश यादव की मुस्लिम वोटो पर लंबरदारी साबित करना बाकी है. दूसरे सारे दावेदार धराशाई हो गए हैं..!!
कांग्रेस के लिए मुस्लिम झुकाव को देखते हुए राहुल गांधी अपनी रणनीति आगे बढ़ा रहे हैं. यूपी में सपा के साथ गठबंधन दोनों की मजबूरी है, लेकिन कांग्रेस अपना अपर हैंड दिखाने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग की राष्ट्रीय बैठक में राहुल गांधी अगर यह कह रहे हैं कि एक साल में मोदी सरकार गिर जाएगी, तो वह मुसलमानों की भावनाओं को भुनाना चाहते हैं. वह यह भी कहते हैं कि अल्पसंख्यक कहकर मुसलमानों की आवाज उठाने से ज्यादा बेहतर है, कि साफ-साफ मुसलमान कहकर उनके साथ खड़े होने की जरूरत है. यह बात सही है कि मुसलमान की जो आबादी है उसके मुताबिक उन्हें अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता है.
इस तरह की मांग पहले से उठती रही है कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं बचे हैं. केंद्र सरकार को अल्पसंख्यक की परिभाषा स्पष्टता के साथ निर्धारित करना चाहिए. अगर जनसंख्या के आधार पर मुसलमान का अल्पसंख्यक दर्जा खत्म हो जाता है, तो उन्हें अल्पसंख्यक के नाते जो विशेष सुविधाएं मिलती है, वह भी खत्म हो जाएंगी.
नेता विपक्ष के नाते राहुल गांधी की यह जिम्मेदारी है कि देश में संविधान के अनुसार अल्पसंख्यक को परिभाषित किया जाए. जिनकी आबादी उस श्रेणी में आती है, केवल उन्हें ही उसमें रखा जाए. राजनीति के लिए मुसलमान कहकर उनकी वफादारी तो बताई जा सकती है लेकिन इससे देश के सामने संवैधानिक समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता है.
राहुल गांधी राजनीति के भविष्यवक्ता बन गए हैं. वह केवल मोदी सरकार के भविष्य को ही देख पा रहे हैं. कांग्रेस के भविष्य को शायद वह नहीं देख पा रहे हैं. उनकी भविष्यवाणी के अनुसार तो अब तक देश में बीजेपी की सरकार होनी ही नहीं चाहिए थी. पहले भी उन्होंने ऐसी ही भविष्यवाणी की थी. राहुल गांधी अपनी बातों से अपनी ही गंभीरता और विश्वसनीयता को समाप्त कर देते हैं. उन पर कोई भरोसा भी करना चाहता है, तो उनकी बातें मुद्दे और भविष्यवाणी सुनकर सरकार के प्रति ना चाहते हुए भी उसका विश्वास बढ़ जाता है.
राहुल गांधी राजनीति में जहां से चले थे आज भी वही खड़े हैं. लोकसभा का चुनाव लड़कर उन्होंने राजनीति में सांसद के रूप में प्रवेश किया था. आज भी वह सांसद ही हैं. जो अपना भविष्य नहीं देख पा रहा है, जिस नेता को कांग्रेस की बर्बादी दिखाई नहीं पड़ रही, है जो कांग्रेस की राज्य सरकारों के अंतर्द्वंद को ही समाप्त नहीं कर पा रहा है.
अभी ताजा द्वंद कर्नाटक में चल रहा है. केंद्र की सरकार गिरेगी या नहीं गिरेगी लेकिन अगर कर्नाटक में सही फैसला नहीं लिया गया तो वहां कांग्रेस जरूर गिर जाएगी. कर्नाटक के सीएम और डिप्टी सीएम दोनों को कांग्रेस हाई कमान ने तलब किया है. राहुल गांधी ने ही चुनाव बाद सीएम के पद पर विवाद को टालने के लिए ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला दिया था. अब राहुल गांधी इसे लागू नहीं करवा पा रहे हैं. अब हालात ऐसे बन गए हैं, कि जो भी फैसला होगा उसमें नुकसान कांग्रेस पार्टी का ही होगा.
बीजेपी कांग्रेस को मुस्लिम लीगी माओवादी कांग्रेस कहती है. मुस्लिम लोग की एप्रोच अब धीरे-धीरे स्थापित हो रहा है. केरल में तो कांग्रेस मुस्लिमलीग के साथ गठबंधन के कारण जीत सकी. असम में भी कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम समुदाय से आते हैं. अब राहुल गांधी इसे मुस्लिम वोट बैंक की कांग्रेस में वापसी के रूप में देख रहे हैं. इसीलिए मुस्लिम वफादारी के प्रति ज्यादा आक्रामक अप्रोच अपनाने की कांग्रेस कार्यकर्ताओं से अपील कर रहे हैं.
बीजेपी मुस्लिम वोटो की तलबगार नहीं है. इस वोट बैंक के लिए कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों में हमेशा रस्साकसी चलती रहती है. मुस्लिम पहले कांग्रेस के साथ ही थे. बाबरी विध्वंश के बाद यह धारा बदली. क्षेत्रीय दलों ने अलग-अलग राज्यों में मुस्लिम वोट पर कब्जा किया. अब यह सारे क्षेत्रीय दल धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं. आखिरी किला उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी लड़ रही है.
राष्ट्रीय संकट में भी कांग्रेस अपना भविष्य तलाश रही है. विश्व व्यापी संकट के कारण पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं. निश्चित रूप से इससे महंगाई बढ़ेगी. युद्ध के कारण जो संकट बढ़ा है, वह कब खत्म होगा, यह भी भरोसे से नहीं कहा जा सकता है.
कॉकरोच जनता पार्टी के सोशल मीडिया पर जो भरपूर समर्थन मिलता दिख रहा है, वह वर्चुअल है, एक्चुअल नहीं है. यह एक तरफ जहां सरकार के लिए चिंता का कारण है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की असफलता भी इसमें दिखती है. कांग्रेस सोशल मीडिया पर बीजेपी से ज्यादा सक्रिय दिखाई पड़ती है. इसके बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी एक सप्ताह में जिस पापुलैरिटी पर पहुंच गई है. इतने फॉलोअर राहुल गांधी के दो दशकों में भी नहीं बन पाए हैं. कॉकरोच जनता पार्टी से बीजेपी को एक फायदा जरूर होता दिख रहा है. भारत की जन भावनाओं को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, वह सब सोशल मीडिया की जंग में छिप रहे हैं.
राहुल गांधी राजनीति करना तो सीख गए हैं, लेकिन उनकी शब्दावली और मुद्दे आत्मघाती ज्यादा साबित हो रहे हैं. जब महंगाई सबसे बड़ा देश का मुद्दा बन रहा है, तो फिर राहुल गांधी द्वारा पीएम को गद्दार कहकर नई बहस खड़ी करने की कोई आवश्यकता नहीं थी. इससे सरकार को ही लाभ होता है.
अन्ना आंदोलन को जो महत्व मिला था वह उनकी क्रेडिबिलिटी का ही परिणाम है. जब नेता की क्रेडिबिलिटी ही नहीं बनेगी तो फिर उसके मुद्दे भी मरते जाएंगे. मुस्लिम वोट बैंक पर कांग्रेस की कोशिशें निश्चित सही दिशा में दिखती हैं. लेकिन इसकी प्रतिक्रिया उसकी हार सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगी.
कांग्रेस हर पैंतरा आजमा रही है. जमीन पर संगठन उसकी बड़ी कमजोरी है. राहुल संगठन का भविष्य देख पाते तो अब तक तो उनकी मुराद पूरी हो सकती थी.