सौ साल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोच युवा है, कोई भी समाज और संगठन तभी सफल होता है जब वह अपने विचारों को आधुनिकता के साथ गढ़ कर आगे बढ़ता है..!!
आरएसएस आज अपने विस्तार के लिए समाज के सभी आइकन को अपने साथ जोड़ने का काम कर रहा है. हिंदू-हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र के विचार पर खड़ा संघ इसका विस्तार जाति और धर्म से ऊपर मातृभूमि के भौगोलिक आधार पर कर रहा है.
शताब्दी वर्ष में आरएसएस ने माया नगरी मुंबई में फिल्मी जगत की हस्तियों साथ भी संवाद किया. सिनेमा- हीरो और फैशन युवाओं को अट्रैक्ट करता है. मोहन भागवत ने युवाओं में अपने विचार पहुंचाने के लिए इसका भी सदुपयोग कर लिया. सुपरस्टार सलमान खान और अक्षय कुमार जैसे अनेक नायक और नायिकाएं इस संवाद में शामिल हुए.
संघ के विचार और प्रक्रिया आज भी वही है, जो स्थापना के समय था वक़्त के साथ इसके इंप्लीमेंटेशन में बदलाव आते रहे. संघ को हिंदुओं का संगठन माना जाता है. संघ के साथ शुरू से ही विवाद जुड़े हुए थे. कांग्रेस और संघ तो हमेशा आमने-सामने रहे. संघ विरोध की राजनीति नहीं करता. वह अपने वैचारिक विस्तार के लिए सकारात्मक प्रयासों में लगा रहता है. पॉपुलैरिटी उसका लक्ष्य नहीं है. पॉपुलर चेहरों के माध्यम से अपनी बात पहुंचाने का तरीका उसने अपनाया है.
संघ के लिए यह प्रसन्नता की बात हो सकती है कि अब उसके विचारों को मित्रों के साथ उसके विरोधी भी ध्यान से देखने सुनने और समझने की कोशिश कर रहे हैं. हिंदू राष्ट्र पर आए दिन विवादस्पद बयान आते हैं. संघ प्रमुख तो इससे चार कदम आगे कहते हैं कि भारत तो हिंदुओं का राष्ट्र है. भारत की भौगोलिक सीमा में जो भी लोग रहते हैं उनका डीएनए हिंदू है, उनकी पूजा पद्धति अलग हो सकती है लेकिन उनकी मातृ भूमि भारत है और जिनकी मातृभूमि भारत है वे सब हिंदू हैं.
संघ प्रमुख सावरकर को भारत रत्न देने के सवाल पर कहते हैं कि अगर उन्हें यह सम्मान दिया जाता है तो इससे भारत रत्न का ही सम्मान बढ़ेगा. दूसरी तरफ राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस सावरकर के खिलाफ आग उगलने से पीछे नहीं रहती.
यूपी के जौनपुर में देहरी गांव संघ प्रमुख के इन विचारों को जी रहा है. यहाँ के मुस्लिम समुदाय के करीब 25 परिवार ऐसे हैं जो अपने नाम के साथ खान, शेख अंसारी या अहमद टाइटल के बाद दुबे तिवारी लिखते हैं. उनका मानना है कि उनके पूर्वज ब्राह्मण थे, बाद में पूर्वजों ने इस्लाम धर्म अपना लिया. पूजा पद्धति अलग-अलग लेकिन भारत भूमि के प्रति गौरव की भावना यहां के प्रत्येक नागरिक की जीवन पद्धति है. यही जीवन पद्धति हिंदुत्व की जीवन पद्धति है.
सामान्य रूप से मुसलमानों को संघ का विरोधी माना जाता है. संघ लगातार मुसलमानों के बीच अपने विचार को पहुँचाने का प्रयास कर रहा है. किसी संगठन की निंदा और प्रशंसा से ज्यादा उनके विचारों पर विचार करना महत्वपूर्ण होता है. यह बदलाव तो दिखाई पड़ रहा है कि मुस्लिम समाज भी अब संघ के विचारों को समझने की कोशिश कर रहा है.
मुंबई में संघ के कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा सलमान खान के पहुंचने की रही. सलमान सुपरस्टार होने के नाते युवाओं के आइकॉन हैं. इसलिए संघ के बारे में उनकी समझ और विवेक में स्पष्टता निश्चित रूप से बहुत सारे युवाओं को प्रेरित करेगी.
संघ के बारे में जो भी भ्रांतियां बनी हुई थी उनका भी मोहन भागवत स्पष्टीकरण दे रहे है. जब उनसे पूछा गया कि ब्राह्मण ही क्यों सर संघचालक बनता है तब उन्होंने कहा कि ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है. जब संघ ने अपना काम प्रारंभ किया था तो वह ब्राह्मण बस्ती थी तो ब्राह्मण नेतृत्व कर रहा था. अब जब संघ का भौगोलिक विस्तार हो रहा है तो कोई भी संघ का सरसंचालक हो सकता है. शर्त केवल यह है कि हिंदू ही सरसंचालक बन सकता है. संघ में नियुक्ति की प्रक्रिया में निवृत होने वाला सर संघसंचालक ही अगले उत्तराधिकारी का नाम प्रस्तावित करता है. यह योग्यता पर आधारित है.
संघ ऐसा संगठन है जिसको मित्रों से ज्यादा उसके विरोधी ट्रैक करते हैं. जो संगठन विचारों संस्कारों एकता और संस्कारों पर जीता है अगर उसके विचारों को समझा जाएगा तब तो तटस्थता के साथ आलोचना हो सकती है. निंदा और प्रशंसा का तो कोई मतलब वैसे भी नहीं होता. सबसे महत्वपूर्ण है कि विचारों को समझा जाए. अगर विरोधी भी अब संघ के विचारों को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर तो संघ का भविष्य और विस्तार रोका नहीं जा सकता है.
संघ देश की समस्याओं और जरूरतों पर जमीनी स्तर से फीडबैक एकत्र करता है. समाज के लिए जरूरी मुद्दों पर वह विभिन्न माध्यमों से सरकारों को अवगत कराता है. केवल बीजेपी ही नहीं दूसरे दलों को भी समाज से जुड़े हुए बताने में संघ परहेज नहीं करता. अगर किसी का नजरिया संघ को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता.
भौगोलिक स्तर पर विभिन्न देशों के रहने वाले एक खास समुदाय के रूप में माने और पहचाने जाते हैं. चाहे पारसी हो ईसाई हो मुसलमान हो यहूदी हो सबके अपने-अपने देश है. उस देश में रहने वाले लोग इसी संस्कृति और पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन समुदायों का वह देश है.
भारत हिंदू संस्कृति का देश है. मज़हब अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन मातृभूमि और उसकी संस्कृति एक ही है. इस विचार को अगर सभी समुदाय आत्मसात कर सकेंगे तो न केवल धार्मिक विवाद कम होंगे बल्कि देश की एकता-अखंडता और विकास की गति भी तेज होगी.
संघ ना प्रतिस्पर्धा के लिए काम करता है ना पापुलैरिटी उसका लक्ष्य है. समाज की एकता-अखंडता और मातृभूमि की वंदना उसका ध्येय है. कोई जाति धर्म या राजनीतिक दल इसके इतर कैसे सोच या काम कर सकता है.