उत्तरदायित्व और उसके अमल में सामंजस्य कम ही देखने को मिलता है. सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार हर व्यक्ति और संस्था अपने दायित्व को अपने हिसाब से पूरा करआत्ममुग्ध हो सकते हैं लेकिन इसका उद्देश्य पूरा हो रहा है या नहीं इस पर जवाबदेही दिखाई नहीं पड़ती..!!
रेरा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यही कहा है. सर्वोच्च अदालत ने इस अथॉरिटी के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा- रेरा को खत्म कर देना चाहिए, यह पीड़ितों के बजाय डिफॉल्टर बिल्डरों की मदद कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट जो कह रहा है वह बिल्डरों की प्रताड़ना के भुक्तभोगी तो कितने दिन से कह रहे थे. न सरकार पर जूं रेंगती है और ना ही बिल्डरों पर कोई फर्क पड़ता है.
रेरा भी चल रहा है, बिल्डरों द्वारा गरीबों के साथ अन्याय भी हो रहा है, रेरा से सवाल करो तो कहते हैं कि उनके पास क्रियान्वित करने का अधिकार नहीं है. प्रश्न केवल रेरा पर ही नहीं बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था में जवाबदेही लगभग गायब सी हो गई है. हर जिम्मेदार दूसरे को इसके लिए दोषी साबित करता है, खुद क्या करता है इस पर उसकी नजर नहीं होती.
व्यवस्था का बीज भले ही देश के महापुरुषों ने सही डाला हो, लेकिन जो वृक्ष दिखाई पड़ रहा है, उसके कांटे अब प्रत्येक नागरिक को चुभने लगे हैं. रेरा अपना दायित्व पूरा नहीं कर रहा है उसे तो खत्म कर सकते हैं, भारतीय संसद क्या कर रही है? संसद के बजट सत्र का नजारा व्यवस्था की ट्रेजेडी ही दिखा रहा है. सदन में जिस तरीके की बातें हो रही हैं वे क्या संसदीय जवाबदेही के अनुरूप हैं?
अभी तो लोकसभा के स्पीकर के खिलाफ ही नो कॉन्फिडेंस आया है, जब स्पीकर पर ही पक्षपात के आरोप हैं तो फिर इस व्यवस्था की जवाबदेही का पालन शुद्ध अंतःकरण के साथ होना कहा जा सकता है.
संविधान का भी राजनीतिक दुरुपयोग करने की कोशिशें दिखाई पड़ती है. कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका अपनी जवाबदेही के प्रति कितनी ईमानदार हैं. यह सब खुली आंखों से दिखता है, लेकिन कोई भी कुछ बोलना नहीं चाहता. सत्ता पक्ष तो सरकार संचालन में व्यस्त हो जाता है, विपक्ष भी सत्ता की आकांक्षा में केवल भौंडा प्रदर्शन कर अपनी जवाबदेही को पूर्ण मान लेता है.
सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और गरिमा न हो, जवाबदेही के प्रति प्रतिबद्धता न हो तो फिर तो जिसके पास भी अधिकार है, वह जो चाहे कर सकता है. सरकार और विपक्ष में जिस तरह नफरत और टकराव का माहौल दिख रहा है वह भी अपने-अपने उत्तरदायित्व का समुचित निर्वहन तो नहीं कहा जाएगा. संसद के संचालन में हर घंटे पब्लिक का करोड़ों रूपया खर्च होता है. इतने खर्च के बाद परिणाम क्या मिलता है?
जिन्होंने रेरा बनाया है, जिन्होंने व्यवस्था को स्थापित किया है, जो कानून बनाने के लिए जिम्मेदार हैं जब उनमें ही जवाबदेही नहीं है तो फिर किसी और सिस्टम में इसकी कल्पना केवल भटकना ही है. इससे वास्तविक बदलाव कुछ भी नहीं होगा. जब रेरा बना था, तो सरकारों ने क्रेडिट लिया था कि इससे आम गरीब लोगों का कल्याण होगा. बिल्डरों की तानाशाही और अराजकता रुकेगी.
अब सुप्रीम कोर्ट कह रहा है कि रेरा अपने उद्देश्य पूरे नहीं कर रहा है इसको तो खत्म ही कर देना चाहिए. रेरा के आधार पर देश की किसी भी व्यवस्था का आंकलन किया जाएगा तो वह फेल ही साबित होगी. यहां तक की न्यायपालिका पर भी सवाल तो खड़े ही होते हैं.
अभी हाल ही में देश के शीर्षस्थ न्यायमूर्तियों ने न्याय व्यवस्था को जनकेंद्रित बनाने के लिए भोपाल में सम्मेलन किया है. इसका मतलब है न्यायमूर्ति स्वयं मानते हैं कि अभी यह व्यवस्था जनकेंद्रित नहीं है. यह सब जानते हैं कि गरीब आदमी सुप्रीम कोर्ट जाने की हिम्मत नहीं कर सकता. वकीलों की फौज बिना धन के किसी को अपने आसपास खड़ा भी नहीं होने देती.
कार्यपालिका में बिना लेनदेन के कुछ भी कराना क्या आसान है? जिस अफसर का और जिस विभाग का जो भी दायित्व है क्या वह पूरा कर रहा है? क्या राज्य सरकार कार्य संचालन नियमों के अनुरूप कर रही है? जितने भर्ती बोर्ड हैं क्या वह सब अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं? पेपर लीक होते हैं, सालों परिणामों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है, सिस्टम में भाई भतीजावाद क्या जवाबदेही पूरा करने का तरीका बन गया है.
रियल स्टेट का क्षेत्र लोगों के जीवन से सीधा जुड़ा हुआ है. मकान एक बुनियादी जरूरत है. इस मामले में सरकारों की प्रयास सीमित होते हैं. निजी क्षेत्र ही रियल स्टेट में अग्रणी भूमिका निभाता है. कोई ऐसा शहर-नगर नहीं होगा जहां बिल्डर की बेईमानी से हजारों लोग पीड़ित भटकते हुए न मिल जाएँ. रेरा का गठन भी इसी समस्या को देखकर किया गया था.
सबसे बड़ी समस्या करप्शन है. जवाबदेही के पद पर बैठा व्यक्ति, विभाग या संस्था में काम करने वाले जिम्मेदार लोग वेतन के अलावा धन उगाही में लग जाते हैं. जब नजरिया यह होगा तो कोई भी संस्था या व्यक्ति अपनी जावाबदेही कैसे पूरा कर सकती है? यह कोई एक संस्था रेरा पर ही लागू नहीं होता. यही तो पूरी सार्वजनिक व्यवस्था का ही चेहरा बन गया है.
रेरा बंद हो या नहीं हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस संस्था द्वारा अपने उद्देश्य नहीं पूरे करने की जो बात कही है वह सभी सार्वजनिक व्यवस्था पर लागू होना जरूरी है. सारे नियम कानून और प्रक्रिया कालांतर में अपने उद्देश्यों से भटक जाती है. नागरिकों को सूचना का अधिकार दिया गया है. इसका भी दुरुपयोग देखने को मिलता है.
व्यवस्था में जिम्मेदार लोगों के आत्म नियंत्रण के बिना न कोई सुधार हो सकता है और न बदलाव. किसी एक पर टिप्पणी किसी सुधार का आधार नहीं बन सकती जब पूरे कुएं में ही भांग घुली है, तो फिर कुएं को ही साफ करना पड़ेगा.