राजनीति में गांधीगिरी के लिए मजबूत लीगेसी के साथ उतरा एक नौजवान बाईस सालों से जहां से चला था, वहीं पर खड़ा है. खुद तो आगे नहीं बढ़ पाए लेकिन अपनी राजनीतिक पार्टी की लीगेसी को भी संकट में डालते हुए राहुल गांधी की भाषा शब्दावली यह सोचने के लिए मजबूर कर रही है, कि शायद वह गंभीर संकट में हैं..!!
उनका दर्द गांधीगिरी से गद्दारगिरी तक पहुंच गया है. हाथ में संविधान लेकर देश के पीएम और होम मिनिस्टर को राहुल गांधी गद्दार कह रहे हैं. संविधान उन्हें किसी को ऐसा कहने की इजाजत नहीं देता, लेकिन शायद अब राहुल गांधी कांग्रेस की पुरानी लीगेसी को छोड़कर अपनी नई लीगेसी का यही रास्ता अपनाया है. आर्थिक संकट की वह भविष्यवाणी कर रहे हैं. पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और महंगाई को लेकर जनता के बीच पैनिक फैला रहे हैं.
राहुल गांधी को देश की बर्बादी दिख रही है. देश पर आने वाले तूफान के लिए वह पीएम मोदी और बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. अमेरिका ईरान युद्ध से उत्पन्न विश्वव्यापी संकट से भारत पर होने वाले प्रभाव को समझने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है. जब पेट्रोल डीजल और रसोई गैस दूसरे देशों से हम आयात करते हैं. अब तक की सरकारों ने इसके कोई वैकल्पिक प्रबंध नहीं किए हैं. युद्ध के कारण जब उनकी कमी आ गई है, जब इनके मूल्य बेतहाशा बढ़ रहे हैं. दुनिया के प्रत्येक देश में इनकी कीमतें बढ़ी हैं. भारत में तो फिर भी अभी कम ही कीमतें बढ़ी हैं. हो सकता है कीमतों में और बढ़ोत्तरी करना पड़े. इसमें भी कोई दो राय नहीं है, कि इससे महंगाई बढ़ेगी. फर्टिलाइजर की भी कमी हो सकती है.
सोशल मीडिया के जमाने में दुनिया के किसी कोने में होने वाली घटना से गांव का हर नागरिक अपडेट रहता है. राहुल गांधी के पैनिक फैलाने से उसका नेगेटिव असर तो नहीं होगा लेकिन सरकार के लिए यह पॉजिटिव असर जरूर हो सकता है कि राहुल गांधी जितनी महंगाई की कल्पना कर रहे हैं. जिस तूफान की उम्मीद कर रहे हैं, अगर मोदी सरकार ने कुशल प्रबंधन से उसको थोड़ा बहुत भी नियंत्रित कर लिया तो देश को यह लगेगा कि विपक्ष तो तूफान बता रहा था, लेकिन यह तो छोटी-मोटी आंधी ही थी.
राहुल गांधी ने संसद की सीढ़ियों पर भी कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए पंजाब के सांसद को गद्दार कहकर संबोधित किया था. राहुल गांधी का अब तक का पूरा राजनीतिक इतिहास गांधीगिरी से गद्दारगिरी की कहानी में सिमटा हुआ है.
पीएम बनने का सपना रखना उनका निजी विषय है, लेकिन राजनीति सार्वजनिक है. जब तक कोई इसमें काम कर रहा है तब तक उसे देश के नियम संविधान शिष्टाचार और सदाचार को मानना ही पड़ेगा. राहुल गांधी पहले ऐसे नहीं थे, हर चुनावी हार के बाद उनका फ्रस्ट्रेशन बढ़ता ही दिखाई पड़ता है. वह जितने भी मुद्दे विमर्श के लिए खड़े करते हैं उस पर जनता को भरोसा नहीं होता है. विदेशी कूटनीति पर भी जब वह सरकार के विरोध में उतरते हैं, तब राहुल गांधी की ही प्रतिष्ठा खंडित होती है. राफेल सौदों पर पहले भी उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा दिया था. जिसके लिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त के माफी मांगनी पड़ी थी.
भारत की अर्थव्यवस्था को डेड इकोनामी भी राहुल ने कहा था. एलआईसी डूब जाएगी, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया बर्बाद हो जाएगा, एचएएल को सरकार ने बेच दिया है. उनके सारे नेरेटिव झूठे साबित हुए हैं. जब अमेरिका ईरान युद्ध चालू हुआ था, तभी उन्होंने कहा था पेट्रोल डीजल का संकट आने वाला है, लेकिन अब तक सप्लाई के मामले में तो देश में कोई भी समस्या नहीं आई है. जहां तक कीमत का सवाल है वह तो पूरे देश को पहले से ही अंदाजा था, कि विश्व व्यापी परिस्थितियों में इसका बढना तय है.
राहुल गांधी स्वयं कहते हैं कि उनके खिलाफ तीस से ज्यादा मुकदमे विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं. पीएम को गद्दार कहने पर भी मुकदमा चल सकता है. कई राज्यों में इस पर शिकायत दर्ज हो चुकी है. राहुल गांधी के खिलाफ ज्यादातर मामले मानहानि के हैं. लोगों की मानहानि करना उनकी आदत बन गई है. वह अपने को कानून से ऊपर मानते हैं.
यूपी में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अभी हाल ही में राहुल गांधी की आय से अधिक संपत्ति की जांच करने का आदेश दिया है. उनकी ब्रिटिश नागरिकता और दोहरे पासपोर्ट की जांच भी चल रही है. नेशनल हेराल्ड का मामला तो अलग ही है. उनकी विदेश यात्राओं पर खर्च राशि और राहुल गांधी की टोटल आएपर बीजेपी सवाल उठा चुकी है .
यह जितने भी मामले हैं, अगर इनकी जांच पूरी हो जाती है तो उनके नतीजे राहुल गांधी के लिए संकट पैदा कर सकते हैं. पार्टी के भीतर राहुल गांधी कमजोर होते दिख रहे हैं. सीएम और डिप्टी सीएम के बीच ढाई-ढाई साल का फार्मूला राहुल गांधी ने बनाया लेकिन उसको लागू नहीं करा पाए. हर राज्य में इसको लेकर असंतोष बना हुआ है. केरलम में तो राहुल गांधी अपने चहेते को सीएम नहीं बना पाए. प्रियंका गांधी से परफॉर्मेंस की तुलना में भी राहुल गांधी कमजोर साबित हो रहे हैं.
मोदी विरोध राहुल गांधी की बीमारी बन गया है. असम और बंगाल के परि णामों से राहुल गांधी का फ्रस्ट्रेशन चरम पर पहुंच गया है.
राहुल गांधी की शब्दावली और मुद्दे आत्मघाती बनते जा रहे हैं. सोशल मीडिया प्रोटेस्ट की भाषा में राहुल गांधी बोलते हैं. निराशा की बीमारी अच्छे-अच्छे को बौराने के लिए मजबूर कर देती है. जनता का फैसला तो वर्डिक्ट से ही होगा.भले ही राहुल गांधी का वर्डिक्ट किसी को भी गद्दार साबित करता रहे.