अमेरिका में बैठकर एक राजनीतिक कार्यकर्ता द्वारा मजाक, व्यंग्य और नाखुशी के रूप में सोशल मीडिया पर बनाई गई कॉकरोच जनता पार्टी राजनीति का शिकार हो गई है..!!
इसमें नेता, एनजीओ और एक्टिविस्ट भी खुल कर राय दे रहे हैं. इंस्टाग्राम पर इसके करोड़ों फॉलोअर हो गए हैं. एक्स पर तो इसके अकाउंट को बैन कर दिया गया है. इसे सीजेपी भी कहा जा रहा है. इतने कम समय में इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से ज्यादा फॉलोअर बनने की सनसनी देश में पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक विमर्श में बदल गया है.
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि जितने भी फॉलोअर हैं उसमें लगभग आधे पाकिस्तान से हैं. एक तिहाई बांग्लादेश से हैं. बाकी अमेरिका और दूसरे देशों के फॉलोअर हैं. इसमें भारत के लगभग दस प्रतिशत फॉलोअर बताए जाते हैं.
सोशल मीडिया के फॉलोअर ऑरिजनल हैं या फेक हैं यह तो साबित करना मुश्किल है, लेकिन फॉलोवर देश के किस कोने से हैं ,यह तो हर अकाउंट में जांचा जा सकता है. भारत की राजनीति में वैचारिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच चुका है.
राजनीति में हिंदुत्व की विचारधारा का प्रतिनिधित्व बीजेपी कर रही है. उसके विरोधी सभी दल बीजेपी की विचारधारा को कम्युनल बताते हैं और खुद को सेकुलर साबित करते हैं. Gen-Z को सरकार के खिलाफ भड़काने के प्रयास देश में भी कम नहीं किए जाते हैं. जब नेपाल में Gen-Z विद्रोह बढ़ा था, तब विपक्षी नेताओं के सोशल मीडिया पोस्टों का अध्ययन किया जाएगा तो उसमें साफ यही संदेश है कि भारत में भी जल्दी सरकार के खिलाफ युवा सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं. इस दौरान राहुल गांधी ने तो यहां तक कहा था, कि पीएम नरेंद्र मोदी घर से नहीं निकल पाएंगे. देश का Gen-Z उन्हें डंडे मारेगा.
दूसरे दलों के नेता भी Gen-Z के असंतोष को भड़काने में पीछे नहीं रहे. जब विषय वैचारिक विरोध का है तो फिर तो सरकार और सिस्टम की अच्छाई या खराबी मायने नहीं रखती है. जो वैचारिक समर्थन करता है उसे सरकार के सिस्टम की खराबी नहीं दिखेगी और जो हिंदुत्व का विरोधी है उसे सरकार में खराबी के अलावा कोई अच्छाई नहीं दिखेगी. हर मोर्चे पर यही हो रहा है. नेपाल में Gen-Z आंदोलन के बाद देश में हुए चुनाव के परिणाम इसके विपरीत संदेश दे रहे हैं. अब तो यह लगने लगा है, कि पीएम मोदी और बीजेपी की सरकारों के जो भी वैचारिक विरोधी हैं, वह गुण दोष पर नहीं बल्कि विरोध के लिए ही विरोध में खड़े हो जाते हैं. डेमोक्रेसी में विरोध एक आंतरिक सुधार की प्रक्रिया का मजबूत हिस्सा है.
देश में समस्याओं की कमी नहीं है. युवाओं में सिस्टम से नाराजगी भी है. पढ़ाई-लिखाई और रोजगार की समस्याएं सतत बनी रहती हैं. पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं में निराशा बढाई है. नीट का पेपर लीक होने से सरकार की छवि प्रभावित हुई है. सभी राज्यों में नौकरियों के लिए युवा सड़क पर उतरते हैं. समस्याएं तो हैं यह नहीं कहा जा सकता कि लोगों में सरकार को लेकर नाराजगी नहीं है. लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है, कि जो भी समस्याएं हैं उनके समाधान की आशा भी बीजेपी की सरकारों से ही की जा रही है.
लोग अनुभव के आधार पर अपनी राय कायम करते हैं. हिंदू मुस्लिम की राजनीति तो खुले तौर पर बंटी हुई है. हिंदुओं में जाति की राजनीति भी सभी दलों के एजेंडे में है. इकोनामिक इंडिकेटर्स अभी भी कांग्रेस की सरकारों से बेहतर अर्थव्यवस्था का ही इशारा कर रहे हैं. विश्व व्यापी संकट के दौर में पेट्रोल, डीजल और महंगाई का संकट बढ़ता दिखाई पड़ रहा है. यह सब अपनी जगह है लेकिन भारत की राजनीति और विदेशी साजिश का बहुत पुराना सिलसिला है, जो लगातार जारी है.
कॉकरोच जनता पार्टी अमेरिका में एक ऐसे व्यक्ति ने बनाई है जो पहले आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़ा रहा है. इस टीम में ऐसे भी लोग शामिल बताए जाते हैं, जो कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम से जुड़े हुए हैं. भारत में राजनीतिक हालात दूसरे देशों से अलग हैं. डेमोक्रेसी यहां भी जड़ों में है. आज भी देश में वन पार्टी रूल नहीं है. कई राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं.
राजनीति में हिंदुत्व की विचारधारा का विरोध आजादी के बाद से ही शुरु हो गया था. कई बार किसी विषय का प्रबल विरोध उसकी प्रगति का मजबूत आधार बन जाती है. राजनीति में हिंदुत्व ऐसा ही साबित हो रहा है.
भारत में जो भी मुद्दे राजनीतिक क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चा में रहते हैं, उसमें आधे से ज्यादा विदेश से शुरु होते हैं. हिंडनवर्ग रिपोर्ट की सनसनी भी कॉकरोच जनता पार्टी जैसी फैलाई गई थी. इसका नेतृत्व तो राहुल गांधी कर रहे थे. सीजेपी में तो उनकी कोई सीधी भूमिका नहीं दिखाई पड़ रही है. लेकिन सोशल मीडिया में फॉलोअर्स की राजनीति तो बिना सामने आए भी की जा सकती है.अगर इस पार्टी के नाम को सीजेपी से पहचाना जाए तो इसे कॉकरोच जनता पार्टी या कांग्रेस जनता पार्टी दोनों कहा जा सकता है.
जिस भी राजनीतिक दल ने अपनी सरकार में सिस्टम के भीतर कॉकरोच जैसी गंदगी पैदा की, उन्हें सत्ता से उतरना पड़ा है. भारत में राजनीतिक बदलाव का लंबा इतिहास है. यहां प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को चुनाव हारना पड़ता है. बंगाल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इसी चुनाव में अपनी सीटें नहीं बचा पाए. यह सारे नेता सोशल मीडिया पर प्रोटेस्ट में किसी से कम नहीं थे, लेकिन जनता ने उनके परफॉर्मेंस को आंकने में कोई भूल नहीं की.
कॉकरोच जनता पार्टी केवल इंस्टाग्राम पर एक वर्चुअल प्रोटेस्ट का एहसास बनकर ही रह जाएगी. सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई की टिप्पणी के बाद कॉकरोच शब्द एकदम वायरल हुआ.
परसेप्शन वॉर में परफॉर्मेंस हमेशा जीतता है. वर्चुअल प्रोटेस्ट मानसिक जुगाली से ज्यादा कुछ नहीं है. सीजेपी की हकीकत भी यही साबित करेगी. विदेश प्रायोजित प्रोटेस्ट भारत का वास्तविक विमर्श बदल नहीं सकता है.