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चिराग से ही संविधान को लगती आग

सार

    पांच राज्यों के चुनाव में संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं की चुनावी भाषा मर्यादाएं तोड़ रही है. शिष्टता की सीमाएं तो पहले ही टूट गई थीं. अब तो गाली पॉलिटिकल कव्वाली बन गई है. संविधान की शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री और मंत्री भी ऐसी भाषा और शब्दों का उपयोग कर रहे हैं, जो लोकतंत्र को शर्मिंदा कर रहा है..!!

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विस्तार

    सुप्रीम कोर्ट को बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी को कोर्ट में बुलाकर डांटना पड़ रहा है. इसके बाद भी राज्य की मशीनरी राजनीतिकरण से बाज नहीं आ पा रही है. जजेस को बंधक बनाया जा रहा है. चुनाव आयोग भले ही कुछ अफसरों का ट्रांसफर कर दे, लेकिन जब पूरी प्रशासनिक हवा ही राजनीतिक प्रदूषण का शिकार हो गई है, तो फिर ऐसी मशीनरी से निष्पक्षता की उम्मीद अब शायद संविधान को भी नहीं बची है.

    बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की पूरी पॉलिटिक्स फायर ब्रांड है. बीजेपी से लड़ते-लड़ते वह अदालत और संविधान से भी लड़ने लगती हैं. संघ और राज्य के संवैधानिक विभाजन की तो वह जरा भी परवाह नहीं करतीं. चुनाव आयोग के खिलाफ़ तो उनका महाभियोग तब तक जारी रहेगा, जब तक चुनाव का परिणाम नहीं आ जाएगा. सारे आरोप चुनाव के बाद अपने आप मर जाएंगे. एसआईआर पर भी हो-हल्ला केवल अपने समर्थक मतों के ध्रुवीकरण के लिए ही किया जा रहा है. अब तो ममता बनर्जी यह भी आरोप लगा रही हैं. कि केंद्रीय सुरक्षाबल राज्य के लोगों के खिलाफ़ काम कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट और कोलकाता हाई कोर्ट को एसआईआर की  प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप करना पड़ा. इसके लिए जजों को लगाना पड़ा. इन जजों के खिलाफ भी आंदोलन किए गए, बंधक बनाया गया. हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मुख्य सचिव जजों को सुरक्षा देने के लिए फोन करते रहे, लेकिन उनका फोन रिसीव नहीं किया गया. 

    यह सब सत्ता पाने के लिए हो रहा है. संविधान के नाम पर शपथ लेकर संविधान और संवैधानिक प्रक्रियाओं की ही धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. अभी तक न्यायालय राजनीति से ऊपर रखा जाता था, लेकिन अब तो उसे भी राजनीति में शामिल करने से गुरेज नहीं किया जाता है.

   असम में भी तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण का खुला खेल चल रहा है. वहां के सीएम की भाषा भी गाली पर उतर आई है. आरोप लोकतांत्रिक हथियार है, लेकिन अगर इसके लिए षडयंत्र का सहारा लिया जाए तो फिर प्रतिक्रिया भी उसी स्तर की होती है. कांग्रेस के मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा ने असम के सीएम की पत्नी के खिलाफ आरोप लगाया तो उन्होंने उसे झूठा बताते हुए पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दी. असम पुलिस पवन खेड़ा के घर पहुंच गई. वह घर पर नहीं मिले लेकिन कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई. असम में चुनावी प्रचार बंद हो गया है. अब तो मतदान होगा. किसका नेरेटिव इफेक्टिव साबित हुआ, यह तो चुनाव परिणाम बताएंगे. 

    कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे अनुभवी राजनेता हैं. वह भी आरएसएस और बीजेपी को जहरीला सांप बता रहे हैं. एक चुनावी सभा में वह कहते हैं कि यहां बहुत सारे मुस्लिम बैठे हैं. कुरान में लिखा है, कि नमाज पढ़ते समय भी अगर कोई जहरीला सांप दिखता है, तो उसे मार देना चाहिए. संघ और भाजपा ऐसे ही सांप हैं. मुसलमान को उसे मारने के लिए नमाज छोड़ना पड़े तो वह भी करना चाहिए. उनकी यह भाषा राजनीतिक कुंठा के साथ ही तुष्टिकरण का प्रयास लग रही है. 

    हिंदुत्व की राजनीति का तो कांग्रेस विरोध करती है. लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए किसी भी सीमा तक जाने से नहीं रुकती है. कांग्रेस का तुष्टिकरण का इतिहास ही उसके वर्तमान का बड़ा कारण दिखता है. इसके बावजूद कांग्रेस इसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है. कोई भी सुधार या चेंज लाने के लिए ना कांग्रेस में कोई चिंतन है और ना ही कोई विचार विनिमय.

    जहां तक संघ और बीजेपी का सवाल है, वर्तमान में दोनों संगठन जिस पावर और सेवा के साथ आगे बढ़ रहे हैं, वह कांग्रेस को पीछे धकेल रहा है. संघ 100 साल का हो गया है. बीजेपी केंद्र और अधिकांश राज्यों में सत्ता में है. बीजेपी जीत का रिकॉर्ड कायम कर रही है तो कांग्रेस हार का रिकॉर्ड बना रही है.

    ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण सभी राज्यों की समस्या है. बंगाल जैसे राज्य जहां दशकों से क्षेत्रीय दलों का कब्जा रहा है, वहां तो राजनीतिक दल और ब्यूरोक्रेसी में अंतर करना कठिन हो गया है. बाम पंथी सरकार के बाद टीएमसी की सरकार ने अपने कामकाज में इस शैली को अपनाया. बंगाल में राष्ट्रीय दलों की सरकार बनना जरूरी हो गया है. यद्यपि इस चुनाव में जो ओपिनियन पोल आ रहे हैं, उसमें भी ममता बनर्जी की टीएमसी को ही आगे बताया जा रहा है. सब यही कह रहे हैं कि एक बार फिर ममता बनर्जी सरकार बन सकती है. वहां सीधी लड़ाई टीएमसी और बीजेपी के बीच में है. 

    मतदाताओं का विभाजन साफ-साफ दिखाई पड़ता है. मुस्लिम ममता के साथ में तो हिंदू मतदाता बीजेपी के पक्ष में खड़े हैं. मुस्लिम वोट बैंक के रूप में काम करते हैं जबकि हिंदू जातियों और अन्य खण्डों में विभाजित है.   

    गाली और नाटकीय हाव-भाव सभाओं में ताली बटोरते हैं. राजनेता अब प्रेरणा स्रोत नहीं रहे. अब तो उनके मर्यादा स्रोत सूखने लगे हैं. राजनेताओं की भाषा और आचरण तभी सुधरेगा, जब ब्यूरोक्रेसी कानून के लिए मजबूती से खड़ी होगी. चुनाव तो नकद पैसे देकर जीते जा सकते हैं लेकिन दिल जीतने वाले नता अब इतिहास का विषय बन गए हैं.