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एजेंडे में नो कॉन्फिडेंस मोशन दूसरे विषय पर करते हंगामा

सार

कांग्रेस के मुद्दों का मजाक कांग्रेस खुद ही बना देती है. बड़े जोर-शोर से लोकसभा स्पीकर के खिलाफ़ कांग्रेस नो कॉन्फिडेंस मोशन लेकर आई. जब सदन के एजेंडे पर चर्चा के लिए यह मोशन आया सरकार तैयार है, आसंदी संकल्प पेश करने का बार-बार आग्रह कर रही है, तो कांग्रेस दूसरे मुद्दे पर हंगामा करने में व्यस्त है..!!

janmat

विस्तार

    कांग्रेस में जब माहौल मजाकिया बना हुआ है, तो कई बार गंभीर नेता भी गंभीर मुद्दों पर मज़ाकिया लहज़े का सहारा लेने लगते हैं. कोई दबाव नहीं था, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रिटायरमेंट प्लान पर एक वीडियो पोस्ट किया. अटकलें चालू हुईं कि शायद वह रिटायरमेंट का सोच रहे हैं. अब वह खुद ही मीडिया के सामने कह रहे हैं कि वे अंतिम सांस तक पार्टी की सेवा करते रहेंगे. उनके बारे में निर्णय एआईसीसी और पीसीसी को लेना है. यह कोई नई बात नहीं है. अब तक भी उनको लेकर जो फैसले हुए थे वह संगठन ने ही लिए थे. 

    राहुल गांधी जिस सदन के सदस्य हैं उसके कस्टोडियन स्पीकर पर ही नो-कॉन्फिडेंस का मोशन मजाक में ला दिया गया. जब स्पीकर ने उसे चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया, जब से वह मोशन आया तब से स्पीकर लोकसभा संचालन नहीं कर रहे हैं. वे अपनी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक नैतिकता साबित करना चाहते हैं, इसीलिए पीठासीन अधिकारी सदन चला रहे हैं. 

    बजट सत्र का दूसरा भाग जब प्रारंभ हुआ, तब पहले दिन ही सदन के एजेंडे में स्पीकर के खिलाफ नो कॉन्फिडेंस मोशन को शामिल किया गया. कांग्रेस उससे भागने लगी. दूसरे मुद्दों पर सदन में हंगामा करने लगी. पूरी कार्यवाही टीवी पर चलती है. पूरा देश देखता है. अगर कांग्रेस को ऐसा लगता है कि नो कॉन्फिडेंस मोशन का उसका मूव सही नहीं है, तो फिर उसे वापस लेने का साहस दिखाना चाहिए. नो कॉन्फिडेंस मोशन पर चर्चा के लिए निर्धारित पहला दिन तो बिना चर्चा के समाप्त हो गया है. अगले दिन भी चर्चा हो पाएगी, इसमें संदेह है. सरकार इसलिए निश्चिंत है कि इस मोशन से ना सरकार को कोई नुकसान है और ना ही स्पीकर पर इसका कोई प्रभाव होगा. कांग्रेस का मोशन कांग्रेस के लिए ही मजाक बन गया है. 

     कांग्रेस में संगठन राहुल गांधी से शुरु और वहीं खत्म होता है. उनकी मंशा ही संगठन का मोटिव होता है. उनकी किचन कैबिनेट में कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं कर सकता कि उनका कोई मूव पार्टी के लिए नुकसानदेह है. राहुल गांधी जितने भी मुद्दे खड़े करते हैं, सब दो-चार दिन चर्चा के बाद मजाक का विषय बन जाते हैं. मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण अभियान को भी कांग्रेस ने जन आंदोलन बनाने का प्रयास किया. जिससे बाद में पीछे हटना पड़ा. बजट सत्र के पहले भाग में जिस पुस्तक को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कांग्रेस द्वारा हंगामा किया गया, उस अप्रकाशित पुस्तक के राहुल गांधी के हाथों तक पहुंचने की वास्तविकता की जांच पुलिस द्वारा की जा रही है. 

    नीति और विचारधारा पर कांग्रेस में ना कोई सोचता है और ना ही फैसला करता है. राहुल गांधी को जो अच्छा लगता है, वहीं कांग्रेस का फैसला होता है. राज्यसभा निर्वाचन में भी कई नेताओं की निराशा इन शब्दों में सामने आई है. जिससे यही लगता है कि उनकी मेहनत के साथ मजाक हुआ है. राहुल गांधी के सारे नेरेटिव वक्त के साथ गलत साबित हो जाते हैं. अमेरिका के साथ ट्रेड डील में भी ऐसा ही हुआ है. अब तक जो डील फाइनल नहीं हुई है, उसके खिलाफ़ राहुल गांधी भोपाल में किसान महापंचायत कर चुके हैं. फिर उसके बाद उस मुद्दे को भूल गए हैं.

    अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध में कांग्रेस ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, वह पार्टी के साथ एक मजाक जैसा ही है. पार्टी केरल में चुनावी जीत की उम्मीद लगाए बैठी है. ईरान खाड़ी देशों पर हमले कर रहा है. इन देशों में एक करोड़ भारतीय निवास करते हैं और रोजगार करते हैं. कांग्रेस में यही कोई सोचने वाला नहीं है कि खाड़ी देश में रहने वाले अधिकांश मुस्लिम हैं और वह केरल से आते हैं. उनके परिवार केरल में बेचैनी में जी रहे हैं और कांग्रेस खाड़ी देशों पर हमला करने वाले ईरान के साथ खड़ी हुई है. इसके लिए तो कांग्रेस की सर्वोच्च नेता सोनिया गांधी ने बाकायदा अखबारों में आर्टिकल लिखे. इस युद्ध पर मुस्लिम वर्ल्ड विभाजित है, लेकिन कांग्रेस इस विभाजित वर्ल्ड में भी मुस्लिम वोट बैंक की संतुष्टि के लिए ईरान के साथ खड़े होने में अपनी भलाई देख रही है.

    कांग्रेस में वैसे तो सीनियर नेता चुप्पी साधे हुए हैं, कोई भी किसी विषय पर अपने विचारों को राहुल गांधी की मर्जी के साथ मिलने में ही अपना हित मानता है. दिग्विजय सिंह जैसे चतुर पॉलीटिशियन ने अपने रिटायरमेंट प्लान की मैसेजिंग के लिए सोशल मीडिया पोस्ट का उपयोग किया. जब उन्होंने महसूस किया कि मैसेजिंग का वहां कोई मतलब है, जहां उसे गंभीरता के साथ महत्व दिया जाता हो. जहां नेता के पार्टी में योगदान और कुर्बानियों को परखा जाता हो, जहां पार्टी केवल पद तक ही सीमित रह गई हो वहां तो वैचारिक प्रतिबद्धता, सिनियरटी और अनुभव को खास महत्व नहीं मिलता है.

    जब स्पीकर के खिलाफ नो-कॉन्फिडेंस कांग्रेस लाई है तो फिर उस पर खुलकर तथ्यों के साथ चर्चा करना ही चाहिए. कांग्रेस शायद डर रही होगी, कि हर बार की तरह नो-कॉन्फिडेंस मोशन पर भी उसके इतिहास और संस्कार पर ही हमला ना हो जाए. कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि वह विरोधी दल जरूर है, लेकिन भारत में उनसे ज्यादा सरकार किसी पार्टी ने नहीं चलाई है. 

    सरकारें चलाने वाली पार्टी को विरोध की राजनीति गंभीरता और परिपक्वता से ही चलानी पड़ती है. अगर इसमें मजाकिया लहज़ा चलता रहा तो पार्टी ही मजाक का विषय बन जाती है. कांग्रेस के वर्तमान राजनीतिक हालात मज़ाकिया लहजे और मुद्दों की ही सज़ा लगती है।