भारत में वंदे मातरम पर विवाद कल्पना से परे है. राष्ट्र की वंदना को बुतपरस्ती समझना न केवल अव्यवहारिक है बल्कि खुद के जीवन अस्तित्व को नकारना है. वंदे मातरम पर संसद में भी बहस हो चुकी है. इस पर कांग्रेस का धर्मसंकट बढ़ता ही जा रहा है..!!
अब इंदौर में एक मुस्लिम महिला पार्षद ने परिषद की बैठक में वंदे मातरम गायन से इनकार कर दिया. इस पर कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठीं. बीजेपी तो इस मामले में खुलकर सक्रिय हो गई है. निजी धर्म अपनी जगह है लेकिन यह राष्ट्र धर्म से ऊपर नहीं हो सकता. बहुत सारे प्रगतिशील मुसलमान वंदे मातरम राष्ट्रगीत के गायन से सहमत हैं लेकिन कुछ इसके विरोध में भी हैं. वंदे मातरम के डेढ़ सौ साल पूर्ण होने पर केंद्र की सरकार ने राष्ट्रगीत के सभी छंदों को गाना अनिवार्य बनाया है. इसके बाद इसे इस्लाम के विरुद्ध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया गया है.
निजी आस्था और राष्ट्रीय आस्था में कोई टकराव नहीं है लेकिन निश्चित ही राष्ट्रीय आस्था सबसे ऊपर है. राष्ट्रगीत वंदे मातरम जो आजादी के समय राष्ट्रीय उद्घोष था, जो पहली बार कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में ही गाया गया. पहली बार में सभी छंदों को गया. फिर इसे इस्लाम विरोधी मानकर दो छंदों तक सीमित कर दिया गया.
अब देश में जो सरकार है वह पूर्ण छंदो वाले वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करती है. उसके गाने को अनिवार्य करने का निर्णय करती है. सरकारी समारोह और स्कूलों में इसे गाने की व्यवस्था करती है. यह तो नहीं कहा जा सकता, कि सरकार को ऐसा करने का अधिकार नहीं है. पहले भी कांग्रेस की सरकारों ने बहुत सारे ऐसे बदलाव संविधान और व्यवस्था में किए हैं, जो मूल रूप से संविधान में नहीं थे. धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद पहली बार इमरजेंसी में संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए. यह बदलाव उस सरकार का अधिकार था अब जो बदलाव हो रहे हैं वह इस सरकार के अधिकार हैं.
अब सवाल यही है कि देश संविधान के मुताबिक चलेगा या धर्म के आधार पर. कोई वंदे मातरम गाए या नहीं गाए, यह उसकी निजी आस्था हो सकती है, लेकिन जो सार्वजनिक जीवन में सार्वजनिक पदों पर काम कर रहे हैं उनको तो संविधान की सार्वजनिक व्यवस्था को ही मान्य करना पड़ेगा.
क्योंकि वंदे मातरम को अनिवार्य करने को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया हुआ है. इस पर फैसला आएगा. भारत फिर एक बार धर्म के आधार पर विभाजन की उसी सोच के पास पहुंच गया है, जिसके आधार पर देश का बंटवारा हुआ था. देश की संवैधानिक व्यवस्था बहुमत से सरकार बनाने और चलाने का अवसर देती है. बहुमत से बनी सरकार को संविधान के मुताबिक जन भावनाओं के अनुरूप काम करने की पूरी स्वतंत्रता है. किसी भी संवैधानिक कदम का धार्मिक सोच के आधार पर विरोध संविधान का ही विरोध कहा जाएगा.
वंदे मातरम कभी कांग्रेस का उद्घोष था. अब कांग्रेस इसी उद्घोष पर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है. राष्ट्र आम सहमति की अपेक्षा करता है, लेकिन राजनीति विवाद में अपना लाभ देखती है. बहुमत और अल्पमत विभाजन पर टिका हुआ है. इसलिए राजनीतिक दल विभाजन को ही अपना लक्ष्य मानते हैं. वंदे मातरम के पूर्ण छंदों को इस्लाम के खिलाफ माना जा रहा है. इसमें भी कट्टर और प्रगतिशील विचार अलग-अलग हैं.
कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक के सहारे अपनी राजनीति को आगे बढ़ाती है. वोट बैंक की मजबूरी के कारण वंदे मातरम पर विवाद कांग्रेस का अंतर्नाद बन गया है. यह मामला बढ़ता ही जाएगा. बहुमत से बनी सरकार की भावनाएं वंदे मातरम के साथ हैं. कांग्रेस राजनीति तो बहुमत की करना चाहती है, लेकिन वोट बैंक की मजबूरी में बहुमत की भावनाओं से दूरी बनाती है.
वंदे मातरम पर विवाद कांग्रेस को राम मंदिर आंदोलन जैसा ही राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है. अयोध्या में भव्य राम मंदिर से पूरा देश खुशी मना रहा है. लेकिन राजनीतिक कारणों से कांग्रेस के बड़े नेता अभी भी राम मंदिर से दूरी बनाए हुए हैं. जो राष्ट्रीय अस्तित्व के मुद्दे हैं उस पर तो कोई दो पक्ष हो ही नहीं सकते हैं. अगर सभी राजनीतिक दल ऐसे मुद्दों पर एक मत में आगे बढ़ें तो शायद उन मुद्दों पर विरोध की सोच भी बदल जाए.
कांग्रेस तो मुस्लिम तुष्टिकरण का कोई भी अवसर छोड़ना नहीं चाहती है. संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण प्रतिबंधित है, लेकिन फिर भी मुस्लिम आरक्षण की बातें कांग्रेस में उठाई जाती हैं. कांग्रेस शासित राज्यों में उस पर अमल करने की भी कोशिश होती है. फिर अदालतों से रोक लग जाती है. अब तो ओबीसी कोटे में मुस्लिम जातियों को ज्यादा से ज्यादा डालकर आरक्षण देने पर भी कांग्रेस आगे बढ़ती जा रही है.
वंदे मातरम विवाद का विषय नहीं है, यह राष्ट्र के प्रति देशवासियों की भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है. इसको धर्म से जोड़ना ही गलत है. इस पर राजनीति स्वीकार नहीं हो सकती. कांग्रेस का कोई भी अनुयाई या कार्यकर्ता अगर वंदे मातरम गाने से इनकार करता है, तो इसका राजनीतिक खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ेगा. मध्य प्रदेश में इंदौर की घटना पर जिस तरह से कांग्रेस के भीतर से विरोध की आवाजें आ रही हैं, उससे यहीं लगता है कि वंदे मातरम पर कांग्रेस में अंदरूनी विवाद भड़क सकता है.
वैचारिक भटकाव के कारण कांग्रेस पहले भी राजनीतिक नुकसान उठाती रही है. वंदे मातरम तो राष्ट्रीय अस्तित्व का विषय है, जो कांग्रेस देश को आजादी दिलाने का दावा करती है, उसमें अगर वंदेमातरम पर विवाद खड़ा किया जाता है, तो फिर कांग्रेस अपने अस्तित्व से ही खिलवाड़ करेगी.
राष्ट्रीय अस्तित्व से ऊपर वोट बैंक नहीं हो सकता है. वोट बैंक का वंदे मातरम पर अंतर्नाद कांग्रेस का नाद नहीं बन जाए, इस पर कांग्रेस को सतर्क और सजग रहने की आवश्यकता है.